बी के झा
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नई दिल्ली, 25 सितंबर
देश की चुनाव व्यवस्था को लेकर सियासी घमासान अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां सवाल सिर्फ विपक्ष के आरोपों का नहीं बल्कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और जनता के भरोसे का भी बन गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए चुनाव प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ियों के आरोप लगाए हैं। वहीं कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने भी CEC के इस्तीफे की मांग करते हुए आंदोलन की चेतावनी दी है।
इसी बीच केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की टिप्पणी ने इस पूरे विवाद को एक अलग राजनीतिक आयाम दे दिया है। उन्होंने विपक्ष के आरोपों पर सीधे फैसला सुनाने के बजाय चुनाव आयोग को ही जनता के सामने अपना पक्ष मजबूती से रखने की नसीहत दी।
चिराग का संदेश साफ था—राजनीतिक दल आरोप लगाते रहेंगे, लेकिन यदि चुनाव प्रक्रिया को लेकर आम मतदाता के मन में संदेह पैदा हो रहा है तो उसे दूर करने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है।
चिराग बोले—विपक्ष क्या कहता है, उससे फर्क नहीं… लेकिन जनता का भरोसा जरूरी
चिराग पासवान ने कहा कि विपक्ष क्या कहता है, इससे उन्हें फर्क नहीं पड़ता क्योंकि राजनीति करना विपक्ष का काम है। लेकिन यदि चुनाव प्रक्रिया को लेकर जनता के मन में किसी प्रकार का संदेह पैदा होता है तो यह उचित स्थिति नहीं है।उन्होंने कहा कि ऐसे समय में चुनाव आयोग और विशेष रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त को मजबूती से अपना पक्ष रखना चाहिए, ताकि लोगों के मन में चुनावी प्रक्रिया को लेकर कोई संशय न रहे।
चिराग की इस टिप्पणी को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने राहुल गांधी के CEC के इस्तीफे की मांग का समर्थन नहीं किया, लेकिन चुनाव आयोग से सवालों का स्पष्ट जवाब देने की आवश्यकता पर जोर जरूर दिया।
यानी सियासी बहस के बीच चिराग ने एक अहम सवाल सामने रखा है—यदि चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं तो उन्हें जवाब देकर शांत कौन करेगा?
राहुल गांधी का हमला—CEC इस्तीफा दें और ‘सरकारी गवाह’ बनें
राहुल गांधी ने 24 सितंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव व्यवस्था को लेकर अपने आरोपों को और तीखा किया। उन्होंने दावा किया कि चुनावी प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ियां हुई हैं और 2024 के लोकसभा चुनाव की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए।राहुल ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा देने और कथित चुनावी गड़बड़ियों से संबंधित जानकारी सामने लाने के लिए ‘सरकारी गवाह’ बनने की अपील की।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और CEC ज्ञानेश कुमार पर भी गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए।राहुल गांधी ने यह भी कहा कि यदि वोट की व्यवस्था कमजोर होती है तो उसका असर संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं तक पहुंचता है। उनके भाषण का केंद्रीय तर्क यही रहा कि ‘वोट चोरी’ के बाद कानून और संस्थाओं पर भी असर पड़ सकता है।
हालांकि, 2024 लोकसभा चुनाव को लेकर राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोप राजनीतिक दावे हैं। उनके समर्थन में जिन विशिष्ट दावों का उल्लेख किया गया है, उनकी स्वतंत्र न्यायिक पुष्टि को अलग से देखा जाना जरूरी है।
संधू और विवेक जोशी की आपत्तियों का मुद्दा भी गरम
विवाद का एक बड़ा आधार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा चुनावी प्रक्रिया के कुछ पहलुओं पर दर्ज की गई कथित आपत्तियां हैं।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार SIR से संबंधित फैसलों और मतदाता सूची से जुड़े कुछ कदमों पर रिकॉर्ड में आपत्तियां दर्ज की थीं।लेकिन चुनाव आयोग ने इन मतभेदों को किसी संस्थागत टूट या विभाजन के रूप में स्वीकार नहीं किया।
आयोग ने कहा कि अलग-अलग विचार, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच किसी भी संस्था की निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं तथा SIR से जुड़े निर्णयों सहित आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
यहीं से बहस और गंभीर हो जाती है।अगर आपत्तियां दर्ज हुईं तो उन पर क्या विचार हुआ?
किस आपत्ति को स्वीकार किया गया और किसे खारिज?
क्या संबंधित रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जा सकते हैं?
और मतदाता सूची में बदलाव की पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है?
इन सवालों का विस्तृत जवाब चुनाव आयोग की ओर से सामने आना इस विवाद को समझने में महत्वपूर्ण होगा।
अभिजीत दिपके ने CEC को दिया अल्टीमेटम
दूसरी तरफ CJP संस्थापक अभिजीत दिपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन का ऐलान किया है।CJP ने 24 सितंबर को CEC को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया था और इस्तीफा नहीं होने पर देशव्यापी आंदोलन तथा ‘जंतर-मंतर 2.0’ की चेतावनी दी थी।
संगठन ने SIR पर रोक, मतदाता सूची से हटाए गए नामों को लेकर जांच और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में बदलाव समेत कई मांगें रखी हैं।
25 सितंबर की रिपोर्टों के मुताबिक CJP ने 2 अक्टूबर से देशव्यापी प्रदर्शन शुरू करने की भी घोषणा की है, यदि तय समयसीमा में CEC इस्तीफा नहीं देते।
‘अगर चुनाव फिक्स है तो विपक्ष उसमें हिस्सा क्यों लेता है?’
दिपके ने विपक्षी दलों के सामने भी बड़ा सवाल रखा है। उनका कहना है कि यदि विपक्ष वास्तव में मानता है कि चुनावी प्रक्रिया में धांधली हो रही है तो उसे ऐसे चुनावों में हिस्सा लेने के औचित्य पर विचार करना चाहिए।उनका तर्क है कि कथित रूप से ‘फिक्स’ चुनाव में लगातार भागीदारी उस व्यवस्था को वैधता देने जैसी स्थिति पैदा कर सकती है।
दिपके ने चुनाव की तुलना फिक्स क्रिकेट मैच से करते हुए दावा किया कि किसी कथित तौर पर तय मुकाबले में कुछ जीत विपक्ष को केवल मुकाबला वास्तविक दिखाने के लिए दी जा सकती हैं।
यह दिपके की राजनीतिक उपमा और आरोप है—चुनावी प्रक्रिया के बारे में स्थापित तथ्य नहीं।
चिराग की बात ने बहस को एक नए सवाल तक पहुंचाया
इस पूरे विवाद में चिराग पासवान की टिप्पणी सबसे अलग इसलिए दिखाई देती है क्योंकि उन्होंने न तो राहुल गांधी के आरोपों को स्वीकार किया और न ही उन्हें खारिज करने भर तक बात सीमित रखी।उन्होंने सीधे चुनाव आयोग की जवाबदेही की ओर इशारा किया।
यानी सवाल अब यह भी है कि—क्या चुनाव आयोग को आरोपों का जवाब देने के लिए और अधिक सार्वजनिक जानकारी देनी चाहिए?
क्या SIR से जुड़े विवादित निर्णयों और आपत्तियों का रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए?
क्या मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया को लेकर जनता को और विस्तृत जानकारी मिलनी चाहिए?
और क्या राजनीतिक आरोपों से अलग स्वतंत्र तथ्य-जांच की कोई व्यवस्था इन विवादों को खत्म कर सकती है?
इन सवालों के जवाब किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि दस्तावेजों, चुनावी रिकॉर्ड, कानूनी प्रक्रिया और पारदर्शी संस्थागत जांच से मिलने चाहिए।
अब गेंद चुनाव आयोग के पाले में
राहुल गांधी इस्तीफा मांग रहे हैं।
अभिजीत दिपके आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं।
विपक्ष चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठा रहा है।
और सत्ता पक्ष के केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान भी यह कह रहे हैं कि जनता के मन में चुनाव प्रक्रिया को लेकर संदेह नहीं रहना चाहिए और आयोग को मजबूती से अपना पक्ष रखना चाहिए।
यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है।
चुनाव सिर्फ मतपत्र या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग की प्रक्रिया नहीं—यह जनता के विश्वास का संवैधानिक तंत्र है।
आरोप लगना लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा है।
आरोपों की पुष्टि या खंडन का रास्ता प्रमाण और संस्थागत जांच से निकलता है।
इसलिए आने वाले दिनों में सबसे ज्यादा नजर इस बात पर होगी कि चुनाव आयोग इन सवालों का कितना विस्तृत, तथ्यात्मक और सार्वजनिक जवाब देता है।
क्योंकि लोकतंत्र में सवालों से संस्था कमजोर नहीं होती—सवालों का जवाब न मिलने से भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
