बी. के. झा
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हरिद्वार, 7 अक्टूबर
हरिद्वार में अर्धकुंभ-2027 की तैयारियां अब कागजों से निकलकर जमीन पर उतरने लगी हैं। इसी क्रम में ऊपरी गंगनहर को करीब 18 दिनों तक बंद रखने का फैसला तैयारियों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश के सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग ने 20/21 अक्टूबर 2026 की मध्यरात्रि से 7/8 नवंबर 2026 की मध्यरात्रि तक ऊपरी गंगनहर की वार्षिक बंदी को मंजूरी दी है।यह बंदी केवल नहर की नियमित मरम्मत तक सीमित नहीं रहने वाली। इस दौरान नहर की मरम्मत, पुनर्स्थापना, सुदृढ़ीकरण और अन्य आवश्यक अनुरक्षण कार्यों के साथ हरिद्वार में अर्धकुंभ के लिए प्रस्तावित घाटों के निर्माण को भी गति देने की तैयारी है।
पानी रुका तो निर्माण को मिलेगी रफ्तार
ऊपरी गंगनहर में पानी का प्रवाह रहने के कारण कई ऐसे निर्माण और तकनीकी कार्य होते हैं जिन्हें सुरक्षित और प्रभावी ढंग से पूरा करना मुश्किल होता है। यही वजह है कि नहरबंदी की अवधि को निर्माण एजेंसियों के लिए एक महत्वपूर्ण ‘वर्क विंडो’ के तौर पर देखा जा रहा है।मेला प्रशासन ने संबंधित विभागों और एजेंसियों को निर्देशित किया है कि इस सीमित अवधि का अधिकतम उपयोग किया जाए। जरूरत पड़ने पर दिन-रात काम करके प्रस्तावित कार्यों को समय पर पूरा करने की तैयारी है।
अर्धकुंभ जैसा विशाल धार्मिक आयोजन केवल आस्था का पर्व नहीं होता, बल्कि यह प्रशासनिक क्षमता, आधारभूत ढांचे और आपदा प्रबंधन की भी बड़ी परीक्षा होता है। ऐसे में गंगातट पर घाटों का निर्माण और मौजूदा ढांचे का सुदृढ़ीकरण सीधे तौर पर श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा से जुड़ा विषय है।
18 दिन की बंदी क्यों है महत्वपूर्ण?
ऊपरी गंगनहर की बंदी की अवधि भले ही लगभग 18 दिन की हो, लेकिन इस दौरान होने वाले काम का असर लंबे समय तक दिखाई दे सकता है। नहर के किनारे निर्माण, तटों का सुदृढ़ीकरण, मरम्मत और अन्य तकनीकी कार्यों को पानी के दबाव के बिना पूरा करने का अवसर मिलेगा।यही वजह है कि प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल काम शुरू करना नहीं, बल्कि काम को तय समयसीमा में गुणवत्ता के साथ पूरा करना है।
अर्धकुंभ 2027 में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं के हरिद्वार पहुंचने की संभावना है। ऐसे में घाटों की क्षमता, पहुंच मार्ग, सुरक्षा व्यवस्था और स्वच्छता जैसे मुद्दे अभी से प्रशासन की प्राथमिकताओं में हैं।
किसानों के लिए बंदी की दूसरी तस्वीर
जहां एक ओर नहरबंदी को निर्माण कार्यों के लिए जरूरी माना जा रहा है, वहीं इसकी दूसरी तस्वीर भी है—सिंचाई।ऊपरी गंगनहर से जुड़े सिंचाई तंत्र पर निर्भर किसानों के लिए नहर में पानी का प्रवाह रुकना परेशानी का कारण बन सकता है। खासकर रबी सीजन की तैयारी के दौरान पानी की उपलब्धता कृषि व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण होती है।इसलिए प्रशासन के सामने चुनौती दोहरी है—एक तरफ अर्धकुंभ से जुड़े जरूरी निर्माण कार्यों को समय पर पूरा करना और दूसरी तरफ नहरबंदी से प्रभावित होने वाले किसानों के हितों का ध्यान रखना।यही वह बिंदु है जहां किसी भी बड़े विकास आयोजन की असली परीक्षा होती है।
निर्माण की गति और आम आदमी की जरूरत—दोनों के बीच संतुलन कितना बेहतर बनाया जाता है, यही प्रशासन की सफलता का पैमाना होगा।
अर्धकुंभ से पहले बुनियादी ढांचे की बड़ी परीक्षा
हरिद्वार का अर्धकुंभ केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड के लिए बड़े पैमाने पर पर्यटन, परिवहन, स्वास्थ्य, स्वच्छता और सुरक्षा व्यवस्था की परीक्षा भी है।श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने के साथ घाटों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। इसलिए नए घाटों का निर्माण केवल सौंदर्यीकरण का विषय नहीं है। इसका सीधा संबंध भीड़ प्रबंधन और श्रद्धालुओं की सुरक्षा से है।गंगातट पर व्यवस्थित घाट होने से स्नान क्षेत्रों को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। इससे प्रशासन को भीड़ को अलग-अलग हिस्सों में बांटने और आपात स्थिति में निकासी व्यवस्था बनाने में मदद मिल सकती है।
सवाल सिर्फ निर्माण का नहीं, गुणवत्ता का भी
अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि नहरबंदी की इस सीमित अवधि का कितना प्रभावी इस्तेमाल किया जाता है।
क्या सभी प्रस्तावित काम तय समय में पूरे होंगे?
क्या निर्माण की गुणवत्ता लंबे समय तक टिकाऊ होगी?
क्या घाटों को भविष्य की भीड़ को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जाएगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या अर्धकुंभ के नाम पर होने वाले निर्माण में सुरक्षा, पर्यावरण और स्थानीय जरूरतों को बराबर महत्व मिलेगा?
इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में सामने आएंगे।
गंगनहर बंदी से निकलेगा अर्धकुंभ का रोडमैप
दरअसल, ऊपरी गंगनहर की यह बंदी अर्धकुंभ 2027 की तैयारियों की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। प्रशासन के पास लगभग 18 दिनों की सीमित अवधि होगी, जिसमें कई ऐसे काम किए जाने हैं जो पानी का प्रवाह बंद होने के बाद ही बेहतर तरीके से संभव होंगे।एक तरफ मशीनें गंगातट पर विकास का नया ढांचा तैयार करेंगी, दूसरी तरफ किसानों की निगाह नहर के पानी पर रहेगी।
यही इस पूरी कवायद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है—हरिद्वार को अर्धकुंभ के लिए तैयार करना जरूरी है, लेकिन उस तैयारी का लाभ तभी सार्थक होगा जब विकास के साथ स्थानीय जरूरतों और किसानों के हितों का संतुलन भी बना रहे।
अर्धकुंभ 2027 अभी दूर दिखाई देता है, लेकिन उसकी तैयारियों की घड़ी शुरू हो चुकी है।
ऊपरी गंगनहर की 18 दिन की बंदी उसी तैयारी का पहला बड़ा इम्तिहान है।
बी. के. झा
एनएसके (NSK)
