बी के झा
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लखनऊ, 26 सितंबर
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राज्यसभा चुनाव महज उच्च सदन की सीटों का चुनाव नहीं रह गया है। 16 अक्टूबर को होने वाला मतदान विधानसभा के भीतर दलों की मौजूदा ताकत, गठबंधन की एकजुटता और विधायकों के बीच राजनीतिक पकड़ का एक अहम परीक्षण भी बनने जा रहा है।
चुनाव आयोग ने यूपी की 10 राज्यसभा सीटों के लिए मतदान की तारीख 16 अक्टूबर तय की है। मौजूदा विधानसभा में 397 प्रभावी विधायक हैं और एक सीट के लिए 37 प्रथम वरीयता वोटों का कोटा बनता है।इसी गणित के बीच समाजवादी पार्टी अब सिर्फ दो उम्मीदवार उतारकर संतुष्ट होने के बजाय तीसरे प्रत्याशी को मैदान में उतारने पर भी विचार कर रही है।
सूत्रों के मुताबिक, अगर अखिलेश यादव तीसरा दांव चलने का फैसला करते हैं तो उम्मीदवार का सामाजिक समीकरण बेहद महत्वपूर्ण होगा। चर्चा है कि पार्टी दलित या अति पिछड़े वर्ग के किसी चेहरे पर दांव लगा सकती है।यानी राज्यसभा की एक सीट के बहाने सपा 2027 की सामाजिक राजनीति का भी संदेश देने की कोशिश कर सकती है।
37 वोट का गणित और सपा की ‘बची हुई ताकत’
मौजूदा विधानसभा संख्या के मुताबिक भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के पास 294 विधायक हैं, जबकि सपा के 101 और कांग्रेस के 2 विधायक हैं। इसके अलावा जनसत्ता दल के दो विधायक भी हैं।37 वोट के कोटे के हिसाब से सपा के 101 विधायक अपने दम पर दो उम्मीदवारों को राज्यसभा भेजने की स्थिति में हैं। दो उम्मीदवारों के लिए 74 वोट खर्च करने के बाद पार्टी के पास 27 प्रथम वरीयता वोट बचेंगे।अगर कांग्रेस के दो विधायकों का समर्थन भी उसके साथ रहता है तो विपक्षी खेमे की संख्या 103 तक पहुंच सकती है। ऐसे में तीसरे उम्मीदवार के लिए सपा के पास शुरुआती वोट तो होंगे, लेकिन 37 के आंकड़े तक पहुंचने के लिए उसे अतिरिक्त समर्थन जुटाना ही पड़ेगा।
यहीं से शुरू होती है असली राजनीतिक कहानी।
तीसरा उम्मीदवार यानी सीधे आखिरी सीट की लड़ाई
राज्यसभा चुनाव में अगर सपा तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो मुकाबला केवल उम्मीदवारों की संख्या का नहीं रहेगा।मौजूदा संख्या-बल के आधार पर एनडीए आठ सीटों और सपा दो सीटों की स्थिति में दिखाई दे रही है।लेकिन सपा अगर तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतारती है तो 10वीं सीट पर सीधा मुकाबला बन सकता है।इसके लिए अखिलेश यादव को अपने खेमे के बाहर भी वोट जुटाने होंगे। यही वह जगह है जहां राज्यसभा चुनाव की राजनीति विधानसभा चुनाव से अलग हो जाती है।यहां केवल जनसभा, नारा या जातीय समीकरण पर्याप्त नहीं होता—हर विधायक का वोट और उसकी पहली वरीयता निर्णायक हो सकती है।
दलित या अति पिछड़ा चेहरा क्यों?
तीसरे उम्मीदवार के लिए दलित या अति पिछड़ा चेहरा चुनने की चर्चा को केवल राज्यसभा की सीट के रूप में देखना अधूरा होगा।सपा पिछले कुछ समय से पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक गठजोड़ के जरिए अपने राजनीतिक आधार को विस्तार देने की कोशिश करती रही है।ऐसे में अगर पार्टी तीसरे उम्मीदवार के लिए किसी दलित या अति पिछड़े चेहरे का चुनाव करती है तो संदेश साफ होगा—सपा राज्यसभा की एक अतिरिक्त सीट के साथ 2027 की सामाजिक इंजीनियरिंग का भी नया अध्याय खोलना चाहती है।
यह फैसला उन वर्गों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संदेश देने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
BJP के लिए भी आसान नहीं होगी रणनीति?
एनडीए के पास मौजूदा विधानसभा गणित में पर्याप्त संख्या है और आठ सीटों पर उसका दावा मजबूत है।लेकिन अगर सपा तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो भाजपा के सामने भी अपनी रणनीति को लेकर अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होगी।क्योंकि मुकाबला तब उस सीट के लिए होगा जिसके लिए दोनों खेमों को अपने अतिरिक्त वोटों का अधिकतम इस्तेमाल करना होगा।
सपा को जहां अपने सभी विधायकों को एकजुट रखना होगा, वहीं एनडीए भी विपक्षी खेमे में सेंध की संभावनाओं पर नजर रख सकता है।
2024 की कहानी फिर दोहराएगी या बदलेगा गणित?
सपा के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक संदर्भ 2024 का राज्यसभा चुनाव है।उस समय सपा ने तीसरे उम्मीदवार के रूप में आलोक रंजन को मैदान में उतारा था, लेकिन पार्टी के कुछ विधायकों की क्रॉस वोटिंग के बाद भाजपा के संजय सेठ ने जीत हासिल की थी।इस बार परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन उस घटना की राजनीतिक स्मृति अभी ताजा है।इसलिए तीसरा उम्मीदवार उतारने से पहले अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल 37 वोट जुटाना नहीं, बल्कि अपने विधायकों को एकजुट रखना भी होगी।
क्रॉस वोटिंग पर रहेगी दोनों खेमों की नजर
राज्यसभा चुनाव सामान्य चुनावों की तरह गुप्त मतदान से नहीं होता। इसमें निर्वाचित विधायक पार्टी द्वारा अधिकृत एजेंट को अपना मत दिखाते हैं और दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधानों से जुड़े राजनीतिक प्रभाव भी यहां महत्वपूर्ण होते हैं।इसी वजह से ऐसे चुनावों में उम्मीदवार के चयन से लेकर मतदान के दिन तक विधायकों की राजनीतिक निष्ठा और रणनीति पर खास नजर रहती है।सपा यदि तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो उसे अपने 101 विधायकों के साथ कांग्रेस के दो विधायकों का समर्थन बनाए रखने के अलावा अतिरिक्त विधायकों का भरोसा हासिल करना होगा।
BSP के लिए भी बड़ा झटका
इस चुनाव का एक और बड़ा राजनीतिक पहलू बहुजन समाज पार्टी की राज्यसभा मौजूदगी से जुड़ा है।यूपी विधानसभा में बसपा का कोई विधायक नहीं है और उसका मौजूदा राज्यसभा कार्यकाल भी समाप्त होने जा रहा है। मौजूदा संख्या-बल के आधार पर बसपा के लिए इस चुनाव में अपना उम्मीदवार जिताना संभव नहीं दिख रहा है।ऐसे में अगर सपा दलित चेहरे को तीसरे उम्मीदवार के रूप में सामने लाती है तो राज्यसभा चुनाव के राजनीतिक संदेश का एक पहलू बसपा के पारंपरिक सामाजिक आधार से भी जुड़ सकता है।
हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि ऐसा उम्मीदवार दलित मतदाताओं पर कितना प्रभाव डालेगा—यह पूरी तरह राजनीतिक परिस्थितियों और उम्मीदवार की स्वीकार्यता पर निर्भर करेगा।
एनएसके विश्लेषण:
25-27 वोटों का सवाल नहीं, 2027 के संदेश का खेल
उत्तर प्रदेश का राज्यसभा चुनाव इस बार संख्या बल से शुरू होकर सामाजिक समीकरण तक पहुंच रहा है।37 वोट एक सीट का कोटा है।
सपा दो सीटों के लिए पर्याप्त संख्या रखती है।
तीसरी सीट के लिए उसे अतिरिक्त समर्थन चाहिए।
यहीं अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक फैसला है—क्या पार्टी सुरक्षित दो सीटों तक सीमित रहे या तीसरा उम्मीदवार उतारकर मुकाबले को रोचक बनाए?
अगर तीसरा उम्मीदवार दलित या अति पिछड़ा चेहरा होता है तो यह केवल राज्यसभा का टिकट नहीं होगा। यह 2027 के लिए एक राजनीतिक संदेश भी होगा कि सपा अपने पीडीए विस्तार को केवल भाषणों तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि उच्च सदन में प्रतिनिधित्व के सवाल से भी जोड़ना चाहती है।
लेकिन तीसरा दांव जोखिम से खाली नहीं है।एक तरफ अतिरिक्त सीट की राजनीतिक संभावना, दूसरी तरफ वोटों के बिखरने और पिछले राज्यसभा चुनाव जैसी क्रॉस वोटिंग का खतरा।
इसलिए 16 अक्टूबर का चुनाव सिर्फ यह नहीं बताएगा कि राज्यसभा में कौन जाएगा।यह यह भी दिखाएगा कि लखनऊ की विधानसभा में किस दल का गणित कितना मजबूत है और 2027 की बड़ी सियासी लड़ाई से पहले कौन अपने विधायकों को एकजुट रखने की कितनी क्षमता रखता है।
और अगर अखिलेश सचमुच दलित या अति पिछड़े चेहरे के साथ तीसरा दांव चलते हैं, तो राज्यसभा का यह चुनाव सीट से ज्यादा संदेश की राजनीति बन सकता है।
