बी के झा – एनएसके विशेष
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नई दिल्ली/आजमगढ़, 12 अक्टूबर
उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावों की सियासी बिसात बिछने के साथ ही राजनीतिक दलों ने अपने-अपने मुद्दों और रणनीतियों को धार देना शुरू कर दिया है। इसी क्रम में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने आजमगढ़ की चुनावी रैली से भाजपा, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर निशाना साधते हुए चुनाव आयोग की भूमिका पर भी तीखा कटाक्ष किया। जेवर एयरपोर्ट के नामकरण का हवाला देते हुए उन्होंने तंज कसा कि चुनाव आयोग का नाम बदलकर ‘प्रधानमंत्री जिताओ कमीशन’ रख देना चाहिए।
ओवैसी का यह बयान केवल एक राजनीतिक व्यंग्य नहीं, बल्कि चुनावी निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे सवालों की कड़ी के रूप में भी देखा जा रहा है। हालांकि, चुनाव आयोग को लेकर लगाए गए राजनीतिक आरोपों के बीच संस्था की निष्पक्षता का आकलन तथ्यों और उसके फैसलों के आधार पर किया जाना जरूरी है।
चुनाव आयोग पर कटाक्ष, नामकरण को बनाया सियासी हथियार
आजमगढ़ के अमौड़ा मोहिउद्दीनपुर में आयोजित रैली में ओवैसी ने चुनाव आयोग पर निशाना साधने के लिए नाम बदलने के मुद्दे को राजनीतिक व्यंग्य का हथियार बनाया। उनका कटाक्ष ऐसे समय में आया है, जब उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची, चुनावी प्रतिनिधित्व और विभिन्न राजनीतिक दलों की रणनीतियां चर्चा के केंद्र में हैं।ओवैसी ने लोगों से अपील की कि वे केवल चुनावी नारों तक सीमित न रहें, बल्कि अपने मताधिकार की सुरक्षा के लिए भी जागरूक हों। उन्होंने मतदाताओं से सूची में अपना नाम जांचने और नाम नहीं होने पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत फॉर्म-6 भरकर पंजीकरण कराने को कहा।
उनका संदेश साफ था—चुनावी राजनीति में हिस्सेदारी का पहला कदम मतदाता बनना है। लेकिन इस अपील के साथ ओवैसी ने अपनी पार्टी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी जाहिर की। उन्होंने कहा कि AIMIM उत्तर प्रदेश में केवल सत्ता हासिल करने नहीं, बल्कि लोगों को नेतृत्व का अवसर देने के उद्देश्य से काम कर रही है।
योगी सरकार पर हमला, एयरपोर्ट और विश्वविद्यालय का उठाया मुद्दा
ओवैसी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार पर हमला बोलते हुए विकास परियोजनाओं और शिक्षा से जुड़े मुद्दे उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्ष 2024 में 108 करोड़ रुपये की लागत से बनाया गया एक एयरपोर्ट आठ महीने के भीतर बंद हो गया। उन्होंने करीब 900 करोड़ रुपये की लागत से विश्वविद्यालय बनाए जाने का जिक्र करते हुए छात्रवृत्ति नहीं मिलने का भी दावा किया।इन आरोपों के जरिए AIMIM प्रमुख ने सरकार की विकास संबंधी प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करने की कोशिश की। उनका निशाना उन परियोजनाओं पर था, जिनकी लागत और उनके वास्तविक लाभ के बीच अंतर होने का आरोप वे लगा रहे थे।हालांकि, एयरपोर्ट की लागत, उसके बंद होने की अवधि और छात्रवृत्ति से संबंधित दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। सरकार की ओर से इन विशिष्ट आरोपों पर प्रतिक्रिया उपलब्ध होने पर उसका पक्ष भी इस बहस का अहम हिस्सा होगा।
अखिलेश यादव को घेरा, शिब्ली कॉलेज को विश्वविद्यालय बनाने पर सवाल
ओवैसी ने समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव को भी निशाने पर लिया। उन्होंने सवाल उठाया कि सपा की सरकार के दौरान शिब्ली कॉलेज को विश्वविद्यालय का दर्जा क्यों नहीं दिया गया।उन्होंने आजमगढ़ में सपा के दो सांसदों, दस विधायकों, जिला पंचायत अध्यक्ष और चेयरमैन जैसे जनप्रतिनिधियों का उल्लेख करते हुए दावा किया कि पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बावजूद जिले को विकास के मामले में अपेक्षित लाभ नहीं मिला।ओवैसी ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव मुसलमानों से वोट तो मांगते हैं, लेकिन उनके अधिकारों और समस्याओं की बात आने पर अपेक्षित मजबूती से आवाज नहीं उठाते।
इस बयान के जरिए AIMIM प्रमुख ने सपा के सामने एक सीधा राजनीतिक सवाल खड़ा करने की कोशिश की—क्या मुस्लिम मतदाताओं को केवल चुनावी समर्थन देने तक सीमित रहना चाहिए, या उन्हें स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व और निर्णय लेने में भी भागीदारी मिलनी चाहिए?
यह मुद्दा पूर्वांचल की राजनीति में खास महत्व रखता है, जहां मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन कई निर्वाचन क्षेत्रों में चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। ओवैसी इसी संभावित राजनीतिक जमीन पर अपनी पार्टी का विस्तार करना चाहते हैं।
योगी संभल से लड़ें, अखिलेश गोरखपुर से आएं; ओवैसी की चुनौती
रैली के दौरान ओवैसी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के बीच एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने की चर्चा का उल्लेख करते हुए दोनों नेताओं को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि योगी संभल से और अखिलेश गोरखपुर से चुनाव लड़कर दिखाएं।यह चुनौती राजनीतिक बयानबाजी के लिहाज से भले ही आकर्षक हो, लेकिन इसके पीछे ओवैसी की रणनीति को समझना भी जरूरी है। दोनों प्रमुख नेताओं को उनके पारंपरिक राजनीतिक प्रभाव वाले क्षेत्रों से बाहर मुकाबले की चुनौती देकर उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी एक दल या नेता का प्रभाव निर्विवाद नहीं माना जाना चाहिए।
फिलहाल, इस बयान को चुनावी चुनौती के रूप में ही देखा जाना चाहिए। दोनों नेताओं के बीच ऐसे किसी मुकाबले की आधिकारिक घोषणा का अर्थ इससे नहीं निकलता।
पूर्वांचल पर नजर, AIMIM की अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश
आजमगढ़ की रैली को केवल एक स्थानीय जनसभा के रूप में देखना अधूरा होगा। इससे पहले श्रावस्ती और बहराइच जैसे क्षेत्रों में सभाओं के जरिए ओवैसी अपनी पार्टी की मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश कर चुके हैं। अब पूर्वांचल में उनकी सक्रियता इस बात का संकेत देती है कि AIMIM उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहती है।ओवैसी की रणनीति के केंद्र में मुस्लिम मतदाताओं के बीच स्वतंत्र नेतृत्व की मांग, शिक्षा और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे तथा भाजपा और सपा-कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक विकल्प पेश करने की कोशिश शामिल दिखाई देती है। हालांकि, इन मुद्दों को जनसमर्थन में बदल पाना पार्टी के सामने बड़ी चुनौती होगी।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस जैसे दलों की अपनी सामाजिक और संगठनात्मक पकड़ रही है। ऐसे परिदृश्य में AIMIM के लिए केवल भाषणों से आगे बढ़कर बूथ स्तर पर संगठन खड़ा करना, स्थानीय नेतृत्व तैयार करना और मतदाताओं का भरोसा हासिल करना निर्णायक होगा।
सवाल सिर्फ वोट का नहीं, नेतृत्व की हिस्सेदारी का भी
ओवैसी की आजमगढ़ रैली ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक पुरानी बहस को फिर सामने ला दिया है—क्या मुस्लिम मतदाता बड़े राजनीतिक दलों के चुनावी समीकरणों का हिस्सा बने रहेंगे, या अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान के आधार पर नया विकल्प तलाशेंगे?
AIMIM प्रमुख इसी सवाल को अपनी राजनीति का आधार बनाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर, सपा और कांग्रेस जैसे दलों के लिए चुनौती यह है कि वे अपने समर्थक वर्गों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अधिकारों से जुड़े सवालों का किस तरह जवाब देते हैं।
भाजपा के लिए भी ऐसी सभाएं विपक्षी दलों की चुनावी रणनीति और सामाजिक समीकरणों को समझने का संकेत देती हैं। लेकिन अंततः राजनीतिक दावों, आरोपों और चुनौतियों का वास्तविक मूल्यांकन जनता के अनुभव, उम्मीदवारों की विश्वसनीयता, विकास के रिकॉर्ड और चुनावी परिणामों से ही होगा।
आजमगढ़ से ओवैसी ने अपना संदेश दे दिया है।
अब देखना होगा कि ‘प्रधानमंत्री जिताओ कमीशन’ वाला तंज और स्वतंत्र मुस्लिम नेतृत्व का उनका राजनीतिक नारा पूर्वांचल में कितनी जमीन हासिल कर पाता है।
फिलहाल, उनकी सक्रियता ने उत्तर प्रदेश की चुनावी बहस में एक नया कोण जरूर जोड़ दिया है।
