Bengaluru; इस्लाम सबसे श्रेष्ठ’ पर कर्नाटक की सियासत में संग्राम, सफाई से भी नहीं थमा विवाद; सवाल—धर्म की तारीफ या वोट की राजनीति?

बी के झा

NSK news Ind

बेंगलुरु/कोप्पल, 31 अगस्त

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार एक बार फिर धर्म और राजनीति के उस संवेदनशील चौराहे पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां एक मंत्री का धार्मिक वक्तव्य महज व्यक्तिगत आस्था का बयान नहीं रह जाता, बल्कि उसकी राजनीतिक व्याख्या शुरू हो जाती है।

उच्च शिक्षा मंत्री बसवराज रायरेड्डी के ‘इस्लाम सभी धर्मों से श्रेष्ठ है’ वाले बयान ने कर्नाटक की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। दिलचस्प बात यह है कि बयान सामने आने के बाद मंत्री ने सफाई भी दे दी, लेकिन सवाल अब भी वहीं है—क्या यह महज धार्मिक सद्भाव की अपील थी या शब्दों के चयन ने राजनीतिक मर्यादा की सीमा पार कर दी?

कोप्पल जिले के कुकनूर में मुस्लिम समुदाय के सामूहिक विवाह कार्यक्रम को संबोधित करते हुए रायरेड्डी ने इस्लाम को महान, वैज्ञानिक और मानवता को बढ़ावा देने वाला धर्म बताया। उन्होंने कुरान का अध्ययन करने की इच्छा जताई और हज पर जाने की अपनी इच्छा का भी उल्लेख किया। उन्होंने यह भी कहा कि वे सामान्यतः मठों और मंदिरों में ज्यादा नहीं जाते।

उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने इस्लाम को दूसरे धर्मों से श्रेष्ठ बताने वाला वाक्य भी कहा। यही एक वाक्य अब पूरे विवाद का केंद्र बन गया है।-

मंत्री का तर्क—‘मैंने किसी धर्म को छोटा नहीं बताया

’विवाद बढ़ने के बाद रायरेड्डी ने अपने बयान का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने किसी दूसरे धर्म को कमतर नहीं बताया। उनका कहना है कि उन्होंने इस्लाम के कुछ अच्छे मूल्यों और विचारों की प्रशंसा की थी और सभी धर्मों को महान माना है। यानी मंत्री का बचाव मूलतः ‘तुलना’ और ‘प्रशंसा’ के बीच अंतर पर टिका है।

लेकिन राजनीतिक विवाद में समस्या यहीं पैदा होती है। यदि कोई व्यक्ति कहे कि किसी धर्म में मानवता, अनुशासन और अच्छे मूल्य हैं तो यह धार्मिक प्रशंसा हो सकती है। मगर जब सार्वजनिक पद पर बैठा व्यक्ति उसी धर्म को ‘दूसरे धर्मों से श्रेष्ठ’ बताता है, तो श्रोता स्वाभाविक रूप से इसकी तुलना बाकी धर्मों से करता है।यही कारण है कि रायरेड्डी की सफाई ने विवाद को समाप्त करने के बजाय एक नया प्रश्न पैदा कर दिया है—

क्या सार्वजनिक जीवन में शब्दों का चयन भी उतना ही महत्वपूर्ण नहीं है जितनी वक्ता की मंशा?

बीजेपी का हमला—‘माफी मांगिए या मंत्रिमंडल से हटाइए

’विपक्ष ने इस बयान को हाथोंहाथ राजनीतिक मुद्दा बना लिया है। कर्नाटक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक ने रायरेड्डी से बयान वापस लेने और हिंदू समाज से माफी मांगने की मांग की है। उन्होंने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार से भी कहा है कि यदि मंत्री माफी नहीं मांगते तो उन्हें मंत्रिमंडल से हटाया जाए।

बीजेपी का राजनीतिक तर्क सीधा है—यदि सरकार ‘सर्वधर्म सम्मान’ की बात करती है तो किसी एक धर्म को दूसरे धर्मों से श्रेष्ठ बताने वाले बयान को सामान्य नहीं माना जा सकता।बीजेपी ने इसे सनातन धर्म को कमतर दिखाने की कोशिश के रूप में पेश किया है और कांग्रेस पर तुष्टीकरण की राजनीति के आरोप लगाए हैं। यहां बीजेपी के लिए राजनीतिक अवसर भी साफ दिखाई देता है।

कर्नाटक जैसे धार्मिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील राज्य में कांग्रेस सरकार के किसी मंत्री का ऐसा बयान विपक्ष के लिए ‘कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता बनाम कथित अल्पसंख्यक तुष्टीकरण’ का नैरेटिव खड़ा करने का अवसर देता है।

–कांग्रेस के लिए असली चुनौती—बयान नहीं, संदेश

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि रायरेड्डी किस धर्म को अच्छा मानते हैं। किसी भी व्यक्ति को किसी धर्म के सिद्धांत पसंद हो सकते हैं। संविधान नागरिक को अपने धर्म को मानने और उसके बारे में विचार रखने की स्वतंत्रता देता है।

संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 धार्मिक स्वतंत्रता का ढांचा निर्धारित करते हैं और भारत की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करती है। आधिकारिक संवैधानिक सामग्री में भी यह स्पष्ट किया गया है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है और धार्मिक स्वतंत्रता सभी को समान रूप से प्राप्त है।

लेकिन मंत्री व्यक्तिगत नागरिक नहीं, सरकार के प्रतिनिधि भी होते हैं।यही अंतर इस विवाद को राजनीतिक बनाता है।एक मंत्री का किसी धर्म के अच्छे सिद्धांतों की प्रशंसा करना एक बात है और सार्वजनिक मंच से उसे दूसरे धर्मों से श्रेष्ठ बताना दूसरी बात।

राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यही इस विवाद की सबसे महत्वपूर्ण परत है।

–हिंदू संगठनों के लिए मुद्दा—आस्था के सम्मान का या राजनीतिक संतुलन का?

हिंदू संगठनों की संभावित आपत्ति को केवल ‘इस्लाम विरोध’ के चश्मे से देखना भी उचित नहीं होगा। मूल प्रश्न यह है कि क्या किसी निर्वाचित सरकार का मंत्री धार्मिक तुलना में किसी एक धर्म को श्रेष्ठ बताने की सार्वजनिक भाषा इस्तेमाल कर सकता है?

विश्व हिंदू परिषद और अन्य हिंदू संगठनों की ओर से यदि इस बयान पर औपचारिक प्रतिक्रिया आती है तो उसका केंद्रीय सवाल यही होना स्वाभाविक होगा कि सरकार सभी धर्मों को समान सम्मान देने की संवैधानिक भावना को कैसे बनाए रखेगी।

वहीं हिन्दू धर्माचार्यों और संत समाज के लिए यह विवाद और भी संवेदनशील हो सकता है, क्योंकि ‘मंदिर और मठों में न जाने’ जैसी टिप्पणी को केवल व्यक्तिगत पसंद मानने और सार्वजनिक मंच पर धार्मिक संस्थाओं के प्रति नकारात्मक संदेश के रूप में देखने के बीच बड़ा अंतर है।

हालांकि, इस समय उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों में VHP या किसी प्रमुख अखिल भारतीय हिंदू धार्मिक संगठन की विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया स्पष्ट रूप से सामने नहीं आई है। इसलिए उनके नाम से कोई काल्पनिक बयान जोड़ना पत्रकारिता की दृष्टि से उचित नहीं होगा।

मुस्लिम समाज के सामने भी सवाल—क्या धर्म को राजनीतिक मंच का विषय बनाया जाए?

इस विवाद का दूसरा पहलू मुस्लिम समाज और मुस्लिम संगठनों से जुड़ा है।रायरेड्डी ने इस्लाम की अच्छाइयों, कुरान के अध्ययन और मानवता की बात की है। इसे मुस्लिम समाज का एक वर्ग स्वाभाविक रूप से सकारात्मक वक्तव्य मान सकता है। कार्यक्रम भी मुस्लिम समुदाय के सामूहिक विवाह से जुड़ा था और वहां मंत्री का संबोधन उसी सामाजिक संदर्भ में था। लेकिन मुस्लिम बुद्धिजीवियों और मौलानाओं के लिए भी एक गंभीर सवाल है—

क्या किसी धर्म की महानता राजनीतिक मंच से घोषित करना उस धर्म के हित में है?

क्योंकि धर्म की प्रतिष्ठा केवल राजनीतिक प्रशंसा से नहीं बढ़ती। बल्कि जब कोई नेता किसी धर्म को बाकी धर्मों से ऊपर बताता है तो इससे सामाजिक ध्रुवीकरण का खतरा बढ़ सकता है।

धर्मों के बीच संवाद का बेहतर रास्ता यह है कि कहा जाए—हर धर्म में मानवता, नैतिकता और सदाचार के मूल्य हैं और समाज को उनसे सीखना चाहिए।रायरेड्डी ने अपने मूल भाषण में इसी विचार को भी व्यक्त किया था, लेकिन ‘इस्लाम श्रेष्ठ’ वाला वाक्य उस व्यापक संदेश पर भारी पड़ गया।

यतिंद्र सिद्धारमैया ने किया रायरेड्डी का समर्थन

इस विवाद में कांग्रेस खेमे से एक महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया भी सामने आई है। रिपोर्टों के अनुसार कर्नाटक के मंत्री यतिंद्र सिद्धारमैया ने रायरेड्डी की प्रशंसा की और कहा कि धर्मों के बीच विवाद पैदा कर राजनीतिक लाभ नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने सभी धर्मों के बीच सद्भाव की बात की। यह प्रतिक्रिया कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक बचाव रेखा तैयार करती है—

बयान को धार्मिक श्रेष्ठता के बजाय अंतरधार्मिक समझ और सद्भाव के संदर्भ में देखने की कोशिश।लेकिन यही वह जगह है जहां कांग्रेस नेतृत्व को सावधानी बरतनी होगी। यदि पार्टी पूरी तरह चुप रहती है तो बीजेपी को हमला करने का अवसर मिलेगा। और यदि पार्टी मंत्री के शब्दों का खुलकर बचाव करती है तो विपक्ष इसे ‘तुष्टीकरण’ के नैरेटिव में बदल सकता है।-

कानून की नजर में क्या स्थिति है?

यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है।किसी धर्म की प्रशंसा करना अपने आप में अपराध नहीं है। भारत का संविधान व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता देता है। लेकिन सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के बयान का मूल्यांकन केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता से नहीं, बल्कि उसके प्रभाव और परिस्थितियों के आधार पर राजनीतिक तथा कानूनी स्तर पर किया जा सकता है।

इस मामले में उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर फिलहाल ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया है कि रायरेड्डी के खिलाफ किसी अदालत ने कोई कानूनी दोष तय किया हो या केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कोई कार्रवाई घोषित की हो। इसलिए इसे सीधे ‘कानूनी अपराध’ कहना अतिशयोक्ति होगी।

असल विवाद अभी मुख्यतः राजनीतिक, संवैधानिक मर्यादा और सामाजिक संवेदनशीलता का है।

–-केंद्रीय गृह मंत्रालय की भूमिका पर भी नजर

इस पूरे विवाद में फिलहाल उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों में केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से कोई अलग आधिकारिक प्रतिक्रिया या कार्रवाई सामने नहीं आई है।और यह स्वाभाविक भी है। किसी राज्य के मंत्री का विवादित बयान सामने आ जाना अपने आप में केंद्रीय गृह मंत्रालय के हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता।

कानून-व्यवस्था या किसी विशिष्ट कानूनी उल्लंघन की स्थिति में संबंधित राज्य की पुलिस और प्रशासन की भूमिका पहले आती है।इसलिए इस समय केंद्रीय गृह मंत्रालय की प्रतिक्रिया के नाम पर कोई बयान जोड़ना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।-कांग्रेस हाईकमान के लिए भी यह ‘छोटा विवाद’ नहीं

कर्नाटक में कांग्रेस के लिए यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी पहले से ही धर्म और राजनीति के सवाल पर बीजेपी के हमलों का सामना करती रही है।रायरेड्डी का बयान यदि केवल ‘इस्लाम महान है’ तक सीमित होता तो उसे धार्मिक सद्भाव के भाषण के रूप में बचाया जा सकता था।

लेकिन ‘अन्य धर्मों से श्रेष्ठ’ वाला भाव राजनीतिक विवाद को जन्म देता है।यही कारण है कि कांग्रेस हाईकमान के सामने दोहरी चुनौती है—

पहली, मुस्लिम समुदाय को यह संदेश देना कि कांग्रेस धार्मिक सम्मान और अल्पसंख्यक अधिकारों के पक्ष में है।

दूसरी, हिंदू समाज को यह भरोसा दिलाना कि किसी धर्म को दूसरे से ऊपर रखकर राज्य की धर्मनिरपेक्षता को कमजोर नहीं किया जाएगा।

कांग्रेस के लिए संतुलन की राजनीति का असली इम्तिहान यहीं है।-

क्या यह ‘वोट बैंक’ की राजनीति है?

बीजेपी इस बयान को वोट बैंक की राजनीति से जोड़ रही है। लेकिन केवल एक बयान के आधार पर यह निष्कर्ष निकाल देना कि मंत्री ने निश्चित रूप से वोटों के लिए ऐसा कहा, राजनीतिक आरोप तो हो सकता है, प्रमाणित तथ्य नहीं।

हां, राजनीतिक समय और मंच जरूर सवाल खड़े करते हैं।मुस्लिम समुदाय के सामूहिक विवाह कार्यक्रम में मुस्लिम धार्मिक भावनाओं से जुड़े विषय पर बोलते हुए मंत्री ने इस्लाम की प्रशंसा की। ऐसी सभा में राजनीतिक नेता अक्सर अपने श्रोताओं के धार्मिक-सामाजिक संदर्भ के अनुरूप भाषण देते हैं। लेकिन यही रणनीति तब उलटी पड़ सकती है जब भाषण का कोई हिस्सा पूरे राज्य के राजनीतिक विमर्श का विषय बन जाए।

इस मामले में यही हुआ है।

सबसे बड़ा सवाल—क्या सफाई पर्याप्त है?

रायरेड्डी ने कहा है कि उन्होंने किसी धर्म को कमतर नहीं बताया और सभी धर्म महान हैं। यह सफाई राजनीतिक नुकसान को सीमित करने की कोशिश के तौर पर देखी जा सकती है। लेकिन एक राजनीतिक विश्लेषण में सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि क्या बाद की सफाई मूल बयान के प्रभाव को पूरी तरह मिटा सकती है?

राजनीति में शब्द वापस लेना आसान है, लेकिन उनके पैदा किए गए राजनीतिक अर्थ को वापस लेना मुश्किल।यदि मंत्री का आशय वास्तव में केवल इस्लाम के मानवीय और नैतिक मूल्यों की प्रशंसा करना था, तो भविष्य में उन्हें अधिक स्पष्ट और संतुलित शब्दों का इस्तेमाल करना होगा।

असल लड़ाई इस्लाम बनाम हिंदू धर्म की नहीं

इस पूरे विवाद का सबसे खतरनाक पहलू यही होगा कि इसे ‘इस्लाम बनाम सनातन’ बना दिया जाए।

भारत की शक्ति ही इस बात में है कि यहां करोड़ों लोग अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के साथ रहते हैं।

संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है और राज्य से धार्मिक निष्पक्षता की अपेक्षा करता है। इसलिए बहस का सही प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि कौन-सा धर्म श्रेष्ठ है?

सही प्रश्न यह है—क्या सत्ता में बैठे व्यक्ति को किसी एक धर्म को दूसरे से श्रेष्ठ बताने वाली भाषा इस्तेमाल करनी चाहिए?

और इसका राजनीतिक उत्तर शायद यही है कि धर्म की अच्छाइयों की प्रशंसा कीजिए, लेकिन धर्मों की रैंकिंग मत कीजिए।

निष्कर्ष: एक वाक्य ने बदल दिया पूरे भाषण का अर्थ

बसवराज रायरेड्डी का पूरा भाषण पढ़ने पर उसमें धार्मिक सद्भाव, कट्टरता से बचने और सभी धर्मों के अच्छे सिद्धांत अपनाने की बातें भी दिखाई देती हैं।

लेकिन राजनीति में अक्सर पूरा भाषण नहीं, एक सबसे विवादित वाक्य जनता की स्मृति में रहता है।

रायरेड्डी के मामले में वही वाक्य है—‘

इस्लाम दूसरे धर्मों से श्रेष्ठ है।’अब मंत्री सफाई दे रहे हैं कि उन्होंने किसी धर्म को छोटा नहीं बताया।

कांग्रेस समर्थक इसे संदर्भ से काटकर पेश किया गया बयान बता सकते हैं।

बीजेपी इसे सनातन धर्म के अपमान और तुष्टीकरण का उदाहरण बना रही है।

हिंदू संगठन इसे धार्मिक समानता के सवाल से जोड़ सकते हैं, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे इस्लाम की सकारात्मक छवि पेश करने वाला वक्तव्य मान सकता है।

लेकिन लोकतंत्र के लिए सबसे स्वस्थ रास्ता इन दोनों ध्रुवों के बीच है—

न धर्म की राजनीति, न धर्म का अपमान; न किसी आस्था को श्रेष्ठ बताने की होड़, न किसी आस्था को नीचा दिखाने की कोशिश।

क्योंकि मंत्री किसी एक समुदाय के नहीं होते। वे पूरे राज्य की जनता के प्रतिनिधि होते हैं।और यही कारण है कि रायरेड्डी की सफाई के बाद भी यह विवाद समाप्त नहीं हुआ है—

बल्कि अब यह कर्नाटक कांग्रेस सरकार की धर्मनिरपेक्षता, राजनीतिक भाषा और ‘सर्वधर्म सम्मान’ की कसौटी बन गया है।

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