भारत-कनाडा रिश्तों में बड़ा मोड़! दिसंबर में कनाडा जाएंगे मोदी? कार्नी के बयान ने बढ़ाई हलचल, क्या अब व्यापार समझौते पर लगेगी मुहर? पीयूष गोयल ने अगले 90 दिनों को बताया निर्णायक

बी. के. झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 23 सितंबर

कभी कूटनीतिक तनाव, आरोप-प्रत्यारोप और ठंडे पड़े रिश्तों के कारण सुर्खियों में रहा भारत-कनाडा संबंध अब एक नए मोड़ पर दिखाई दे रहा है। करीब तीन साल पहले जिस रिश्ते में राजनीतिक अविश्वास ने व्यापारिक बातचीत तक को प्रभावित कर दिया था, वही रिश्ता अब व्यापार, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, तकनीक और रणनीतिक साझेदारी की नई जमीन तलाश रहा है।

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने 23 सितंबर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिसंबर के आसपास कनाडा का दौरा कर सकते हैं। कार्नी ने भारत के साथ व्यापार वार्ता में ‘अच्छी प्रगति’ का हवाला देते हुए कहा कि दोनों देश साल के अंत तक व्यापार समझौते तक पहुंचने की दिशा में काम कर रहे हैं। उन्होंने मोदी की मेजबानी की उम्मीद भी जताई।

हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी की कनाडा यात्रा की भारत सरकार की ओर से अभी औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए इसे फिलहाल संभावित दौरे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।लेकिन कार्नी का बयान महज एक संभावित यात्रा की सूचना नहीं है। इसके पीछे पिछले कुछ महीनों में भारत-कनाडा संबंधों में आए व्यापक बदलाव की कहानी छिपी है।

निज्जर विवाद से व्यापारिक साझेदारी तक—रिश्ता कैसे बदला?

भारत और कनाडा के रिश्ते 2023 में उस समय गंभीर तनाव में पहुंच गए थे, जब तत्कालीन कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने कनाडा में हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारतीय एजेंटों की संभावित भूमिका के आरोप लगाए थे। भारत ने इन आरोपों को खारिज किया था और दोनों देशों के संबंधों में भारी तनाव पैदा हुआ।इस तनाव का असर राजनयिक संपर्क से लेकर व्यापार वार्ता तक दिखाई दिया।अब तस्वीर बदल रही है।2025 में दोनों देशों के बीच संपर्क फिर बढ़ा और 2026 में कार्नी की भारत यात्रा के दौरान रिश्तों को नए सिरे से आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया। मार्च में मोदी और कार्नी ने व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, प्रतिभा, नवाचार और AI जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई थी। दोनों नेताओं ने व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते यानी CEPA की बातचीत तेज करने और इसे 2026 में पूरा करने का लक्ष्य भी रखा था।यानी अब भारत-कनाडा रिश्तों का नया अध्याय राजनीतिक आरोपों से ज्यादा आर्थिक हितों के इर्द-गिर्द लिखा जा रहा है।

कार्नी ने क्या कहा और क्यों महत्वपूर्ण है उनका बयान?

कार्नी ने भारत के साथ रिश्ते को कई स्तरों पर महत्वपूर्ण बताया—लोगों के बीच संपर्क, सुरक्षा, व्यापार और अर्थव्यवस्था।उनका कहना है कि दोनों देशों की व्यापार वार्ता अच्छी दिशा में आगे बढ़ रही है और मोदी दिसंबर के आसपास कनाडा आ सकते हैं।यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देश CEPA वार्ता को तेज करने पर सहमत हुए हैं।यानी मोदी की संभावित यात्रा और व्यापार वार्ता—दोनों घटनाएं एक-दूसरे से अलग नहीं दिखतीं।

यदि बातचीत समय पर आगे बढ़ती है तो दिसंबर तक राजनीतिक नेतृत्व के स्तर पर किसी बड़े आर्थिक समझौते को अंतिम रूप देने का प्रयास हो सकता है। लेकिन समझौता अभी हुआ नहीं है और वार्ता में कई संवेदनशील मुद्दे बाकी हो सकते हैं।

पीयूष गोयल ने भी दिया था बड़ा संकेत

कार्नी के बयान से कुछ दिन पहले केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भारत-कनाडा व्यापार वार्ता को तेज करने की जानकारी दी थी।गोयल के अनुसार दोनों देशों के बीच CEPA पर चौथे दौर की बातचीत पूरी हो चुकी है और पांचवां दौर 5 अक्टूबर से शुरू होगा। उन्होंने कहा कि बातचीत की गति बढ़ रही है और अगले 90 दिन भारत-कनाडा संबंधों के लिए ‘बहुत महत्वपूर्ण’ हो सकते हैं।यहां एक महत्वपूर्ण बात है—भारत और कनाडा अब केवल वार्ता जारी रखने की बात नहीं कर रहे, बल्कि वार्ता की रफ्तार बढ़ाने की बात कर रहे हैं। यही बदलाव इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संकेत है।

एक दशक पुरानी व्यापार डील, लेकिन मंजिल अब भी दूर

भारत और कनाडा के बीच व्यापक व्यापार समझौते की कोशिश कोई नई कहानी नहीं है।दोनों देशों ने मार्च 2022 में CEPA के लिए औपचारिक बातचीत फिर शुरू की थी। इसके साथ अंतरिम समझौते के रूप में Early Progress Trade Agreement पर भी काम किया गया।2022 और 2023 में नौ दौर की बातचीत हुई, लेकिन अगस्त 2023 में दोनों देशों के रिश्तों में आए तनाव के बीच प्रक्रिया रुक गई।अब बातचीत नए सिरे से आगे बढ़ रही है। सितंबर 2026 में चौथा दौर पूरा होने के बाद दोनों पक्षों ने प्रक्रिया तेज करने पर सहमति जताई है। पांचवां दौर 5 अक्टूबर से प्रस्तावित है।इसलिए दिसंबर तक समझौता होने की संभावना को लेकर उत्साह जरूर है, लेकिन व्यापार समझौते का अंतिम परिणाम अभी वार्ता की मेज पर ही है।

भारत को कनाडा से क्या चाहिए?

भारत-कनाडा व्यापार संबंध केवल वस्तुओं के आयात-निर्यात तक सीमित नहीं हैं।भारत के लिए कनाडा ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, शिक्षा, निवेश और तकनीक के लिहाज से महत्वपूर्ण है।हाल की बातचीत में ऊर्जा सहयोग और महत्वपूर्ण खनिजों को भी महत्व मिला है। कनाडा के व्यापार मंत्री मनिंदर सिद्धू ने कहा था कि दोनों देश CEPA को वर्ष के अंत तक पूरा करने को लेकर आशावादी हैं। भारत की कंपनियां कनाडा में LNG, महत्वपूर्ण खनिज और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में अवसर तलाश रही हैं।ऐसे में भारत के लिए कनाडा केवल एक निर्यात बाजार नहीं है।वह ऊर्जा और संसाधन सुरक्षा की बदलती वैश्विक रणनीति में भी महत्वपूर्ण साझेदार बन सकता है।

कनाडा को भारत की जरूरत क्यों बढ़ी?

कनाडा के लिए भारत का महत्व दूसरी तरफ से भी बढ़ रहा है।भारत दुनिया की बड़ी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में है। कनाडा अपनी अर्थव्यवस्था और व्यापारिक साझेदारियों में विविधता चाहता है।ऐसे में भारत के साथ व्यापार बढ़ाना कनाडा के लिए अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता के बीच एक अतिरिक्त आर्थिक विकल्प भी प्रदान कर सकता है।कनाडा और अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों में हाल के वर्षों में तनाव और अनिश्चितता बढ़ी है। इसी दौर में ओटावा यूरोप और एशिया के साथ अपने आर्थिक संबंधों को व्यापक करने की कोशिश कर रहा है।इस संदर्भ में भारत-कनाडा CEPA का महत्व दोनों देशों की सामान्य व्यापार नीति से कहीं आगे जाता है।

मोदी की कनाडा यात्रा हुई तो क्या बदलेगा?

अगर दिसंबर में मोदी की कनाडा यात्रा होती है तो यह कई वर्षों बाद रिश्तों में आए बदलाव का बड़ा राजनीतिक संकेत होगी।मार्च में कार्नी भारत आए थे और जून में G7 शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की मुलाकात भी हुई। उस बैठक में दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों में सकारात्मक गति और आर्थिक सहयोग की प्रगति पर संतोष व्यक्त किया था।ऐसे में दिसंबर की संभावित यात्रा दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क की निरंतरता को दिखाएगी।लेकिन यात्रा का सबसे बड़ा महत्व इस बात से तय होगा कि उसके साथ कौन-से ठोस समझौते सामने आते हैं।

CEPA में सबसे बड़ी परीक्षा क्या होगी?

व्यापार समझौते में केवल राजनीतिक सहमति काफी नहीं होती।दोनों देशों को वस्तुओं, सेवाओं, निवेश, बाजार पहुंच, कृषि, औद्योगिक उत्पादों और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों पर समझौता करना होगा।यानी अंतिम चरण में पहुंचते ही बातचीत आसान होने के बजाय कई मामलों में कठिन भी हो सकती है।क्योंकि हर देश अपने घरेलू उद्योग और संवेदनशील आर्थिक क्षेत्रों के हितों की रक्षा करेगा।यही वजह है कि पीयूष गोयल का ‘अगले 90 दिन’ वाला संकेत महत्वपूर्ण है।

इस अवधि में बातचीत की रफ्तार के साथ-साथ कठिन मुद्दों पर वास्तविक समझौते की क्षमता भी परखी जाएगी।

रिश्तों में सिर्फ व्यापार नहीं, सुरक्षा भी महत्वपूर्ण

भारत-कनाडा संबंधों में सुरक्षा एक संवेदनशील मुद्दा रहा है।2023 के विवाद ने यह दिखाया कि सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दे किस तरह पूरे द्विपक्षीय रिश्ते को प्रभावित कर सकते हैं।कार्नी ने भी भारत के साथ संबंधों के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सुरक्षा का उल्लेख किया है।इसलिए नए रिश्ते की नींव सिर्फ CEPA पर नहीं टिकेगी।दोनों देशों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सुरक्षा संबंधी चिंताओं, प्रवासी भारतीय समुदाय से जुड़े मुद्दों और कानून के सवालों पर संवाद बना रहे।

मोदी-कार्नी के सामने तीन बड़ी मेजें

दिसंबर में यदि दोनों नेताओं की मुलाकात होती है तो उनके सामने मोटे तौर पर तीन बड़े एजेंडे होंगे

पहला—व्यापार: क्या CEPA को वर्ष के अंत तक अंतिम रूप दिया जा सकता है?

दूसरा—ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिज:क्या दोनों देश LNG, परमाणु ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों में दीर्घकालिक सहयोग बढ़ा सकते हैं?

तीसरा—सुरक्षा और विश्वास:क्या 2023 के विवाद की छाया से बाहर निकलकर ऐसा तंत्र बनाया जा सकता है जिसमें संवेदनशील मुद्दों पर सीधे संवाद कायम रहे?

एन एस के विश्लेषण:

रिश्ते लौटे हैं, लेकिन भरोसे की असली परीक्षा अभी बाकी

भारत और कनाडा के बीच मौजूदा घटनाक्रम को सिर्फ ‘दोस्ती की वापसी’ कहना शायद जल्दबाजी होगी।तस्वीर अधिक जटिल है।दोनों देशों के आर्थिक हित उन्हें एक-दूसरे के करीब ला रहे हैं।

कनाडा को भारत जैसे बड़े बाजार और निवेश साझेदार की जरूरत है। भारत को कनाडा से ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, निवेश और बाजार के अवसर मिलते हैं।लेकिन दूसरी तरफ 2023 का कूटनीतिक विवाद अभी भी दोनों देशों के रिश्तों के इतिहास का हिस्सा है।इसलिए अब असली चुनौती रिश्तों को फिर से शुरू करना नहीं, बल्कि उन्हें संस्थागत और स्थायी आधार देना है।

अगर दिसंबर तक CEPA पर सहमति बनती है, मोदी की संभावित कनाडा यात्रा होती है और ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज तथा सुरक्षा सहयोग में ठोस प्रगति होती है तो भारत-कनाडा संबंध एक नए चरण में प्रवेश कर सकते हैं।लेकिन यदि व्यापार वार्ता कठिन मुद्दों पर अटकती है, तो केवल नेताओं की मुलाकात से संबंधों की दिशा स्थायी रूप से बदलना मुश्किल होगा।

यही वजह है कि 5 अक्टूबर से शुरू होने वाली पांचवीं दौर की वार्ता पर अब निगाहें रहेंगी।

कभी निज्जर विवाद के कारण भारत-कनाडा संबंधों की खबर दुनिया भर में राजनीतिक टकराव के रूप में सुर्खियां बनी थी।

अब वही दो देश व्यापार समझौते, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग की भाषा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।

दिसंबर तक तस्वीर कितनी बदलती है, इसका जवाब किसी बयान से नहीं—वार्ता की मेज पर होने वाले वास्तविक समझौतों से मिलेगा।

और शायद यही भारत-कनाडा रिश्तों के इस नए अध्याय की सबसे बड़ी कसौटी होगी।

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