ताइवान या अरुणाचल? चीन की अगली चाल पर बढ़ी हलचल, ‘फाइव फिंगर’ रणनीति पर फिर छिड़ी बहस; रक्षा विशेषज्ञ बोले— घबराहट नहीं, रणनीतिक सतर्कता ज़रूरी

बी.के. झा

नई दिल्ली/बीजिंग | 13 अगस्त

पूर्वी लद्दाख के बाद अब अरुणाचल प्रदेश एक बार फिर भारत-चीन सीमा विवाद के केंद्र में आ गया है। अरुणाचल प्रदेश की पीपुल्स पार्टी (PPA) की फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी ने दावा किया है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने अपर सुबनसिरी जिले के ताक्सिंग सेक्टर में भारतीय गश्ती दलों की गतिविधियों को सीमित करने की कोशिश की है तथा पारंपरिक चरागाहों और शिकार क्षेत्रों पर धीरे-धीरे अपना प्रभाव बढ़ाया है।

हालांकि इन दावों का भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान ने खंडन किया है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) का सीमांकन स्पष्ट न होने के कारण दोनों देशों की गश्ती टीमें कभी-कभी आमने-सामने आती हैं, लेकिन स्थापित सैन्य प्रोटोकॉल के तहत स्थिति को शांतिपूर्वक सुलझा लिया जाता है। सेना और ITBP पूरी तरह सतर्क हैं तथा सीमा पर भारत की स्थिति मजबूत बनी हुई है।

PPA रिपोर्ट में क्या दावा किया गया?

PPA की चार सदस्यीय समिति ने जुलाई में ताक्सिंग, माज़ा और गैलेमो क्षेत्र का दौरा कर स्थानीय ग्रामीणों, बुद्धिजीवियों और सुरक्षा अधिकारियों से बातचीत की। रिपोर्ट में दावा किया गया कि ‘शेरा-5’ नामक भारतीय पेट्रोलिंग पॉइंट पर 2023 के बाद भारतीय गश्त नियमित रूप से नहीं पहुंच सकी और PLA ने वहां अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश की।रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ‘नांगा पहाड़’ जैसे पारंपरिक चरागाह क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों की आवाजाही घटने से चीन को सामरिक लाभ मिल सकता है।

महत्वपूर्ण:

इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और भारतीय एजेंसियों ने इन्हें प्रमाणित नहीं माना है।

आखिर क्या है ‘फाइव फिंगर’ सिद्धांत?

चीन की कथित ‘फाइव फिंगर’ अवधारणा एक भू-राजनीतिक विचार के रूप में चर्चा में रहती है। इसके अनुसार तिब्बत को ‘हथेली’ और नेपाल, भूटान, सिक्किम, लद्दाख तथा अरुणाचल प्रदेश को पाँच उंगलियों के रूप में देखा जाता है। इतिहासकारों का कहना है कि यह अवधारणा अक्सर सामरिक विमर्श में उद्धृत होती है, लेकिन इसे वर्तमान चीन सरकार की औपचारिक नीति के रूप में प्रमाणित नहीं माना जाता।

क्या ताइवान से पहले चीन भारत की ओर बढ़ेगा?

सोशल मीडिया पर कुछ भू-राजनीतिक विश्लेषकों ने दावा किया है कि चीन ताइवान की बजाय पहले भारत के उत्तर-पूर्व में सीमित तनाव पैदा कर सकता है। उनका तर्क है कि घरेलू आर्थिक दबाव और राष्ट्रवादी राजनीति बीजिंग को सीमित सीमा विवाद की ओर धकेल सकती है।

लेकिन भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी एवं चीन मामलों के विशेषज्ञ कर्नल (सेवानिवृत्त) जे.एस. सोढ़ी इससे सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार चीन की दीर्घकालिक सैन्य तैयारी का केंद्र ताइवान है और अरुणाचल में बड़े सैन्य अभियान की संभावना तब तक कम है, जब तक उसकी सामरिक आधारभूत परियोजनाएं पूरी नहीं हो जातीं।

रक्षा विशेषज्ञों का विश्लेषण

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि तीन परियोजनाएं विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं—- मेडोग जलविद्युत परियोजना (तिब्बत)- शिनजियांग–तिब्बत रेलवे- ग्वादर से शिनजियांग तक रणनीतिक संपर्क गलियारा विशेषज्ञों के अनुसार इन परियोजनाओं के पूर्ण होने के बाद ही चीन की सैन्य रसद क्षमता उल्लेखनीय रूप से मजबूत होगी। इसलिए वर्तमान समय में अधिक संभावना सीमित सीमा दबाव, साइबर गतिविधियों और मनोवैज्ञानिक रणनीति की मानी जाती है, न कि व्यापक युद्ध की।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों की टिप्पणी

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चीन की सीमा रणनीति अक्सर “सलामी स्लाइसिंग” यानी छोटे-छोटे कदमों के माध्यम से सामरिक लाभ लेने की अवधारणा से जोड़ी जाती है। उनका कहना है कि भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल सैन्य नहीं, बल्कि सीमा क्षेत्रों में सड़क, संचार, जनसंख्या और स्थानीय समुदायों की मजबूत उपस्थिति बनाए रखना भी है।

विश्लेषकों के अनुसार, “अरुणाचल की सुरक्षा केवल सैनिक चौकियों से नहीं, बल्कि सीमावर्ती गांवों के विकास, आधारभूत ढांचे और स्थानीय लोगों के विश्वास से भी तय होगी।

”केंद्र सरकार का रुख

भारत सरकार लगातार स्पष्ट कर चुकी है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय का आधिकारिक रुख है कि LAC पर शांति बनाए रखने के साथ-साथ भारत अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

आधिकारिक सूत्रों ने PPA रिपोर्ट में लगाए गए दावों को सनसनीखेज बताते हुए कहा है कि सीमा पर सेना और ITBP की निगरानी तथा गश्त नियमित रूप से जारी है।

विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया

विपक्षी दलों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर सरकार को संसद और देश के सामने पारदर्शी जानकारी रखनी चाहिए। साथ ही उन्होंने सीमा क्षेत्रों में आधारभूत ढांचे, स्थानीय आबादी की सुरक्षा और सैनिकों के संसाधनों को और मजबूत करने पर जोर दिया है।हालांकि इस विशेष रिपोर्ट पर किसी प्रमुख विपक्षी दल का विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

निष्कर्ष

अरुणाचल को लेकर सामने आए दावे और उनके खंडन ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत-चीन सीमा केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि रणनीतिक, कूटनीतिक और मनोवैज्ञानिक प्रतिस्पर्धा का भी क्षेत्र है।

विशेषज्ञों की राय में फिलहाल सबसे जरूरी है— तथ्यों पर आधारित आकलन, सीमा पर निरंतर सतर्कता और अफवाहों से अधिक आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा।

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