100% टैरिफ की तलवार और मोदी-ट्रंप की ‘डील’: नवारो बोले—दोनों नेता सुलझा लेंगे विवाद, लेकिन असली परीक्षा भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली/वॉशिंगटन, 12 अगस्त

अमेरिका और भारत के रिश्तों में व्यापार, रूस और कच्चे तेल का सवाल एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिकी सीनेट द्वारा रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का रास्ता खोलने वाले विधेयक को मंजूरी दिए जाने के बाद भारत पर दबाव बढ़ा है। लेकिन इसी तनाव के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वरिष्ठ सलाहकार पीटर नवारो का बयान कूटनीतिक तापमान कुछ कम करता दिखाई दे रहा है।

नवारो ने कहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बहुत अच्छे कामकाजी संबंध हैं और रूस से तेल खरीदने को लेकर पैदा हुआ व्यापारिक विवाद दोनों नेता मिलकर सुलझा लेंगे। उन्होंने संकेत दिया कि वह दोनों नेताओं के बीच होने वाली बातचीत में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते और मामले को मोदी-ट्रंप के स्तर पर सुलझने देना चाहिए।लेकिन सवाल केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत केमिस्ट्री का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता किए बिना अमेरिकी दबाव को टाल पाएगा?

100 प्रतिशत टैरिफ अभी लगा नहीं है, लेकिन खतरा वास्तविक है

यहां सबसे पहले एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है। अमेरिका ने भारत पर अभी 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं किया है। अमेरिकी सीनेट ने 7 अगस्त को Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 को 86-11 के भारी बहुमत से पारित किया है। विधेयक में अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीदने वाले देशों के उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है। अब इस विधेयक की आगे की संसदीय प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।अर्थात headline में भले ही ‘100 प्रतिशत टैरिफ’ सुनाई दे रहा हो, लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि 100 प्रतिशत शुल्क लगाने का अधिकार प्रस्तावित है, स्वतः लागू होने वाला टैरिफ नहीं।यही अंतर भारत के लिए कूटनीतिक गुंजाइश पैदा करता है।

नवारो का बयान क्यों महत्वपूर्ण है?

पीटर नवारो लंबे समय से भारत की रूस से तेल खरीद को लेकर आलोचनात्मक रुख रखते रहे हैं। ऐसे में उनका यह कहना कि मोदी और ट्रंप के बीच अच्छे संबंध हैं और दोनों इस मुद्दे को सुलझा लेंगे, अमेरिकी प्रशासन के भीतर कम से कम बातचीत के रास्ते खुले होने का संकेत माना जा सकता है।राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में इसका अर्थ यह भी निकाला जा रहा है कि वॉशिंगटन इस मुद्दे को केवल दंडात्मक आर्थिक कार्रवाई के रूप में नहीं, बल्कि बातचीत के लिए leverage के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है।

दूसरे शब्दों में—अमेरिका के हाथ में टैरिफ का हथियार है, लेकिन फिलहाल बातचीत का दरवाजा बंद नहीं हुआ है।

भारत के लिए मामला सिर्फ रूस का तेल नहीं, ऊर्जा सुरक्षा का है

भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में जहां भी कीमत, उपलब्धता और आपूर्ति की बेहतर शर्तें मिलती हैं, भारत के लिए वहां से तेल खरीदना आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है।विदेश मंत्रालय पहले ही कह चुका है कि भारत प्रस्तावित अमेरिकी कानून पर नजर रख रहा है और उसकी तेल खरीद नीति विभिन्न स्रोतों से ऊर्जा प्राप्त करने पर आधारित है। जुलाई में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था कि सरकार घटनाक्रम पर करीबी नजर रख रही है।

यही भारत की मूल दलील है—ऊर्जा खरीद किसी तीसरे देश की विदेश नीति का विस्तार नहीं, बल्कि भारत की अपनी ऊर्जा जरूरतों का प्रश्न है।

अमेरिका का तर्क भी कम गंभीर नहीं

वॉशिंगटन का तर्क है कि रूस से तेल और गैस खरीदने वाले बड़े देश मॉस्को के ऊर्जा राजस्व को बनाए रखने में मदद करते हैं और इससे यूक्रेन युद्ध के लिए रूस की वित्तीय क्षमता मजबूत होती है।सीनेट से पारित विधेयक इसी सोच पर आधारित है। इसमें रूस के अलावा ईरान से जुड़े प्रतिबंधों और रूसी ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव बढ़ाने के उपाय भी शामिल हैं। अमेरिकी सांसदों का उद्देश्य रूस के ऊर्जा राजस्व पर चोट करना है।यानी वॉशिंगटन की नजर में यह सिर्फ भारत-अमेरिका व्यापार विवाद नहीं है; यह रूस-यूक्रेन युद्ध की भू-राजनीति से जुड़ा हुआ मामला है।

भारत के सामने तीन रास्ते

अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत के सामने मोटे तौर पर तीन विकल्प हैं।

पहला—अमेरिका से समझौता

भारत रूस से तेल खरीद में कुछ समायोजन कर सकता है और बदले में अमेरिकी बाजार तक अपनी पहुंच सुरक्षित करने की कोशिश कर सकता है।

दूसरा—रूस से खरीद जारी रखते हुए बातचीत

भारत यह तर्क दे सकता है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार ऊर्जा खरीद जारी रखेगा, लेकिन अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को भी मजबूत रखना चाहता है।

तीसरा—तेल आपूर्ति में व्यापक diversification

भारत रूस के साथ-साथ मध्य-पूर्व, अमेरिका, अफ्रीका और अन्य स्रोतों से आयात का संतुलन बढ़ा सकता है।तीसरा विकल्प भारत को किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता से बचाता है, लेकिन सस्ते रूसी कच्चे तेल से मिलने वाले संभावित आर्थिक लाभ को प्रभावित कर सकता है।

100% टैरिफ का असर हुआ तो सबसे पहले किस पर पड़ेगा?

यहां एक और आर्थिक तथ्य समझना जरूरी है। अमेरिकी टैरिफ सीधे भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमत पर 100 प्रतिशत शुल्क नहीं लगाता। टैरिफ मुख्यतः अमेरिकी बाजार में जाने वाले भारतीय उत्पादों को महंगा बनाता है।इसका असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ सकता है—विशेषकर उन क्षेत्रों पर जहां अमेरिकी बाजार महत्वपूर्ण है। यदि शुल्क बहुत ऊंचा होता है तो भारतीय उत्पादों की अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता घट सकती है।इससे निर्यात, उत्पादन, रोजगार और विदेशी मुद्रा आय पर दबाव आने की आशंका होगी।

दूसरी ओर, अमेरिका के लिए भी इसका उलटा असर हो सकता है। अमेरिकी आयातकों को भारतीय सामान महंगा मिल सकता है और उन्हें वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता तलाशने पड़ सकते हैं। अमेरिकी संसद में भी राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ अधिकार देने को लेकर चिंता सामने आई है; कुछ सांसदों ने अमेरिकी उपभोक्ताओं पर संभावित महंगाई और राष्ट्रपति को अत्यधिक अधिकार मिलने पर सवाल उठाए हैं।

शिक्षाविदों की नजर में असली लड़ाई ‘तेल’ से आगे की है

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के शिक्षाविदों के दृष्टिकोण से देखें तो यह विवाद तेल से कहीं बड़ा है।भारत पिछले कई वर्षों से ऐसी विदेश नीति पर जोर देता रहा है जिसमें अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी हो, रूस के साथ पारंपरिक संबंध बने रहें और पश्चिम एशिया समेत अन्य शक्तियों के साथ भी स्वतंत्र संबंध कायम रहें।इसे ही रणनीतिक स्वायत्तता की नीति कहा जा सकता है।यदि भारत केवल अमेरिकी दबाव में रूस से ऊर्जा संबंधों को अचानक बदलता है तो यह भविष्य में अन्य शक्तियों के लिए भी एक संदेश होगा कि आर्थिक दबाव के जरिए भारत की विदेश नीति को प्रभावित किया जा सकता है।लेकिन यदि भारत पूरी तरह टकराव का रास्ता चुनता है तो अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यातकों को आर्थिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

इसलिए मोदी सरकार की चुनौती है—न झुकना, न अनावश्यक टकराव करना।

राजनीतिक विश्लेषण: मोदी-ट्रंप की व्यक्तिगत दोस्ती कितनी कारगर?

यहीं नवारो का बयान सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।ट्रंप और मोदी के बीच व्यक्तिगत संवाद और राजनीतिक संबंध निश्चित रूप से कूटनीतिक पूंजी हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यापार केवल व्यक्तिगत रिश्तों से नहीं चलता। अमेरिका में कांग्रेस की भूमिका है, वहां उद्योग समूह हैं, चुनावी राजनीति है और रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़ी रणनीतिक प्राथमिकताएं हैं।इसलिए मोदी-ट्रंप की दोस्ती विवाद को कम करने में मदद कर सकती है, लेकिन यह अपने आप 100 प्रतिशत टैरिफ के खतरे को समाप्त नहीं कर देती। नवारो का बयान इसी अंतर को स्पष्ट करता है—दरवाजा बातचीत के लिए खुला है, लेकिन अमेरिकी दबाव की नीति भी मेज पर मौजूद है।

भारत सरकार की रणनीति: टकराव नहीं, लेकिन राष्ट्रीय हित से समझौता भी नहीं

नई दिल्ली की अब तक की सार्वजनिक स्थिति सावधानीपूर्ण रही है। विदेश मंत्रालय ने प्रस्तावित अमेरिकी कानून पर नजर रखने की बात कही है और ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण पर जोर दिया है।इससे सरकार की संभावित रणनीति का अंदाजा लगाया जा सकता है—वाशिंगटन से बातचीत जारी रखना, अमेरिकी बाजार को महत्व देना और साथ ही ऊर्जा सुरक्षा को किसी एक देश की शर्तों से नहीं बांधना।यह नीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत-अमेरिका संबंध अब सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं हैं। रक्षा, तकनीक, सेमीकंडक्टर, हिंद-प्रशांत, क्वाड और चीन से जुड़ी रणनीतिक चिंताएं भी दोनों देशों के रिश्तों का हिस्सा हैं।

विपक्ष के लिए मौका, लेकिन चुनौती भी

यह मुद्दा भारतीय विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का स्वाभाविक अवसर है। विपक्ष सरकार से पूछ सकता है कि यदि अमेरिका भारत पर इतना बड़ा शुल्क लगाने की स्थिति में पहुंच गया है तो मोदी सरकार की व्यापार कूटनीति कितनी प्रभावी रही।दूसरी ओर सरकार विपक्ष से यह सवाल पूछ सकती है कि क्या भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा किसी विदेशी शक्ति के निर्देश पर तय करनी चाहिए?

हालांकि उपलब्ध ताजा रिपोर्टों में इस नए 100 प्रतिशत टैरिफ विधेयक पर प्रमुख भारतीय विपक्षी दलों की फिलहाल अभी कोई ऐसी नई, विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है जिसे इस खबर में तथ्य के रूप में जोड़ा जा सके। इसलिए राजनीतिक दलों के नाम से काल्पनिक बयान देना उचित नहीं होगा।

लेकिन राजनीतिक बहस की असली रेखा साफ है—सरकार इसे रणनीतिक स्वायत्तता का प्रश्न बनाएगी, जबकि विपक्ष आर्थिक कूटनीति और निर्यात हितों पर जवाब मांगेगा।

‘अमेरिका बनाम रूस’ नहीं, भारत के हित बनाम दबाव की राजनीति

भारत के लिए सबसे समझदार रास्ता किसी एक खेमे में खड़ा होना नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेना है।रूस भारत का पुराना रणनीतिक साझेदार है। अमेरिका आज भारत का महत्वपूर्ण व्यापारिक और रणनीतिक साझेदार है। चीन अलग भू-राजनीतिक चुनौती है। पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए निर्णायक है।ऐसे में नई दिल्ली के लिए किसी एक शक्ति के साथ पूर्ण निर्भरता उसकी विदेश नीति को सीमित कर सकती है।यही कारण है कि 100 प्रतिशत टैरिफ की धमकी को केवल भारत-अमेरिका व्यापार विवाद के रूप में देखना अधूरा होगा। यह नई विश्व व्यवस्था में भारत की bargaining power की परीक्षा भी है।

अब गेंद मोदी और ट्रंप के पाले में

पीटर नवारो ने भले ही कहा हो कि मोदी और ट्रंप इस समस्या को सुलझा लेंगे, लेकिन आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि यह भरोसा कितना वास्तविक साबित होता है।अमेरिका के पास टैरिफ का दबाव है। भारत के पास विशाल बाजार, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और बहु-ध्रुवीय विदेश नीति का विकल्प है।

रूस के पास ऊर्जा है। चीन भी रूसी ऊर्जा का बड़ा खरीदार है।इस पूरी शतरंज में भारत को सबसे बड़ा लाभ तभी मिलेगा जब वह भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय आर्थिक गणित और रणनीतिक धैर्य के साथ आगे बढ़े।

नवारो का संदेश फिलहाल तनाव के बीच संवाद की उम्मीद जगाता है—लेकिन 100 प्रतिशत टैरिफ की तलवार अभी म्यान में गई नहीं है। असली कूटनीतिक बाजी अब इस बात की है कि मोदी और ट्रंप व्यक्तिगत रिश्तों को कितनी दूर तक राष्ट्रीय हितों के टकराव को संभालने के औजार में बदल पाते हैं।

और शायद यही इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी विडंबना है—दोनों नेताओं के संबंध अच्छे हैं, लेकिन दोनों देशों के हित हमेशा एक जैसे नहीं होते।

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