जिसके नाम जमीन, उसी को PM किसान का लाभ; फार्मर आईडी नहीं बनी तो पीएम किसान समेत कई योजनाओं का लाभ हो सकता है बंद, 85.53 लाख लाभुकों में अब तक 53.45 लाख की ही बनी पहचान

बी के झा

पटना, 3 सितंबर

बिहार के किसानों के लिए खेती-किसानी से जुड़ी सरकारी योजनाओं का लाभ लेना आने वाले दिनों में आसान नहीं, बल्कि पहचान के एक नए दस्तावेज पर निर्भर हो सकता है। केंद्र सरकार की ओर से फार्मर आईडी यानी किसान की विशिष्ट डिजिटल पहचान को योजनाओं से जोड़ने की कवायद तेज कर दी गई है।

सबसे बड़ी चिंता उन किसानों को लेकर है, जिनके नाम खेती की जमीन दर्ज नहीं है या जिनकी फार्मर आईडी अभी तक नहीं बन सकी है।

पीएम किसान सम्मान निधि को लेकर भी व्यवस्था स्पष्ट की जा रही है कि लाभ उसी किसान को मिलेगा, जिसके नाम जमीन के कागजात दर्ज हैं। एक ही परिवार में पति-पत्नी दोनों अलग-अलग इस योजना की राशि नहीं ले सकेंगे।

वहीं आयकरदाता किसानों को योजना के दायरे से बाहर रखा गया है। ऐसे में फार्मर आईडी की अनिवार्यता बिहार के उन लाखों किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है, जो जमीन पर खेती तो करते हैं, लेकिन जमीन उनके नाम पर दर्ज नहीं है।

32 लाख से ज्यादा किसान अभी पहचान से बाहर

बिहार में पहले चरण में पीएम किसान सम्मान निधि के 85.53 लाख लाभुकों की फार्मर आईडी तैयार की जानी है। इनमें से 53.45 लाख किसानों की आईडी बन चुकी है, जबकि करीब 32 लाख किसानों की पहचान अभी पूरी नहीं हुई है। यही वह बड़ा वर्ग है, जिसके सामने भविष्य में सरकारी कृषि योजनाओं का लाभ गंवाने का खतरा पैदा हो सकता है।सरकार की ओर से तीन बार विशेष अभियान चलाए जाने के बावजूद फार्मर आईडी बनाने की प्रक्रिया अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकी है।

इसकी सबसे बड़ी वजह किसानों के नाम जमीन का दर्ज नहीं होना बताई जा रही है। बड़ी संख्या में किसान ऐसे हैं, जो खेती तो कर रहे हैं, लेकिन जमीन अब भी पिता, दादा या परिवार के किसी अन्य सदस्य के नाम पर है।

बिहार की खेती में बटाईदार सबसे बड़ी कड़ी

फार्मर आईडी की अनिवार्यता का सबसे ज्यादा असर बटाईदार किसानों पर पड़ने की आशंका है। बिहार में खेती का बड़ा हिस्सा ऐसे किसानों के सहारे चलता है, जिनके पास अपनी जमीन नहीं है, लेकिन वे दूसरों की जमीन पर खेती करते हैं।

अखिल भारतीय किसान महासभा के राज्य सचिव उमेश सिंह का कहना है कि बिहार में करीब 79 फीसदी किसान बटाईदार हैं। उनके मुताबिक, कई किसानों के पास खेती करने की जमीन है, लेकिन वह उनके पिता या दादा के नाम पर दर्ज है। ऐसे में केवल जमीन के कागजात के आधार पर फार्मर आईडी बनाने की व्यवस्था वास्तविक खेती करने वाले किसानों को ही योजनाओं से बाहर कर सकती है।

उनका कहना है कि बटाईदार किसानों की भी फार्मर आईडी बनाई जानी चाहिए, ताकि जमीन पर पसीना बहाने वाला किसान सरकारी योजनाओं से वंचित न हो।

फार्मर आईडी क्यों बन रही है अहम?

आने वाले समय में खाद, बीज और कृषि से जुड़ी कई सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए फार्मर आईडी महत्वपूर्ण दस्तावेज बन सकती है। इसका इस्तेमाल कई योजनाओं में किसान की पहचान और पात्रता तय करने के लिए किया जाएगा।फार्मर आईडी बनने के बाद किसान को प्रमुख रूप से इन योजनाओं का लाभ लेने में सुविधा होगी—-

पीएम किसान सम्मान निधि

किसान क्रेडिट कार्ड

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना

केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न कृषि योजनाएं

कैसे बनेगी फार्मर आईडी?

बिहार फार्मर रजिस्ट्री पोर्टल के माध्यम से किसान अपनी डिजिटल पहचान बना सकते हैं। इसके लिए मोबाइल से लिंक आधार कार्ड, मोबाइल नंबर और ओटीपी सत्यापन के साथ जमीन से जुड़े दस्तावेज या जमाबंदी की जानकारी जरूरी होगी।

सबसे अहम शर्त यह है कि खेती की जमीन किसान के अपने नाम पर दर्ज हो।यही शर्त अब सबसे बड़ी अड़चन बनकर सामने आ रही है।

करीब दो करोड़ किसान पहले से पंजीकृत

कृषि विभाग के पोर्टल पर करीब दो करोड़ रैयत और गैर-रैयत किसान पंजीकृत हैं। इनमें जमीन के मालिक किसान यानी रैयत के साथ-साथ बटाई पर खेती करने वाले गैर-रैयत किसान भी शामिल हैं। लेकिन फार्मर रजिस्ट्री की प्रक्रिया जमीन के स्वामित्व से जुड़ने के कारण बटाईदारों और परिवार के दूसरे सदस्यों के सामने अलग तरह की समस्या खड़ी हो रही है।

सवाल सिर्फ आईडी का नहीं, किसान की पहचान का है

सरकार के लिए फार्मर आईडी कृषि योजनाओं में पारदर्शिता लाने और फर्जी लाभुकों को हटाने का माध्यम हो सकती है। लेकिन बिहार जैसे राज्य में जहां खेती की जमीन का स्वामित्व और वास्तविक खेती करने वाला व्यक्ति अक्सर अलग-अलग होते हैं, वहां केवल जमीन के कागजात को किसान की अंतिम पहचान मानना विवाद खड़ा कर सकता है।

जिसके नाम जमीन है, उसे किसान मानना आसान है; लेकिन जो उस जमीन पर फसल उगाता है, उसके अधिकार की पहचान करना असली चुनौती है।

अगर फार्मर आईडी की व्यवस्था में बटाईदारों, संयुक्त परिवारों और पुश्तैनी जमीन पर खेती करने वाले किसानों के लिए अलग व्यवस्था नहीं की गई, तो कागज पर किसानों की पहचान जरूर साफ हो जाएगी,

लेकिन खेत में मेहनत करने वाले हजारों-लाखों किसानों के हाथ सरकारी मदद से खाली रह सकते हैं।

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