छह साल बाद खुला अफजाल अंसारी का लखनऊ वाला बंगला; गैंगस्टर एक्ट में कुर्क डालीबाग की 6,700 वर्गफुट की कोठी वापस, नगर निगम ने सौंपी चाबी; स्पेशल कोर्ट के बाद हाईकोर्ट की प्रक्रिया से मिली राहत, योगी सरकार की ‘माफिया नीति’ पर उठे सियासी सवाल

बी के झा

NSK news Ind

लखनऊ, 3 सितंबर

कभी उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की ‘माफिया के खिलाफ कार्रवाई’ का प्रतीक बनी लखनऊ के डालीबाग की एक आलीशान कोठी बुधवार को फिर अंसारी परिवार के कब्जे में लौट आई। समाजवादी पार्टी के गाजीपुर सांसद अफजाल अंसारी अपनी दोनों बेटियों के साथ जब इस बंगले पर पहुंचे तो वर्षों से बंद पड़े मकान का दरवाजा खुला और परिवार ने राहत की सांस ली। लखनऊ नगर निगम ने गाजीपुर के जिलाधिकारी के आदेश के बाद संपत्ति की चाबी परिवार को सौंप दी।

करीब 6,700 वर्गफुट में बनी यह संपत्ति अफजाल अंसारी की पत्नी फरहत अंसारी के नाम दर्ज है। गैंगस्टर एक्ट के तहत इसे कुर्क कर लंबे समय तक नगर निगम की निगरानी में रखा गया था। अब अदालतों की प्रक्रिया से गुजरने के बाद कुर्की समाप्त हुई और प्रशासन को संपत्ति वापस करनी पड़ी।

आरोप से अदालत तक… और फिर संपत्ति की वापसी

इस कहानी का सबसे अहम पहलू सिर्फ बंगले की चाबी लौटना नहीं, बल्कि वह लंबी कानूनी लड़ाई है जिसके बाद प्रशासन को अपना कदम पीछे खींचना पड़ा।गाजीपुर के मुहम्मदाबाद थाने में दर्ज गैंगस्टर एक्ट के मुकदमे के आधार पर तत्कालीन जिलाधिकारी ने 23 अक्टूबर 2022 को इस संपत्ति को बेनामी मानते हुए कुर्क करने का आदेश दिया था।

प्रशासन का आरोप था कि संपत्ति संगठित अपराध से अर्जित धन से वर्ष 1998 में पत्नी फरहत अंसारी के नाम हासिल की गई थी। कुर्की के बाद इसकी देखरेख लखनऊ नगर निगम को सौंप दी गई।लेकिन अंसारी परिवार ने इस कार्रवाई को अदालत में चुनौती दी। मामला जिला जज कोर्ट से होते हुए एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट तक पहुंचा।

7 अप्रैल 2025 को स्पेशल कोर्ट ने कुर्की आदेश रद्द करते हुए संपत्ति को मुक्त करने का आदेश दिया। शासन ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 7 अगस्त 2026 को मामले का पांच सप्ताह में निस्तारण करने का निर्देश दिया।इसी क्रम में गाजीपुर के जिलाधिकारी अनुपम शुक्ला ने 18 अगस्त 2026 को कुर्की समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया।

आदेश था, लेकिन चाबी में देरी… फिर पहुंची अवमानना तक बात

कानून की लड़ाई का अगला अध्याय प्रशासनिक कार्रवाई में देरी से जुड़ा रहा। आदेश के बावजूद संपत्ति का वास्तविक कब्जा और चाबी लौटाने की प्रक्रिया तत्काल पूरी नहीं हुई तो अंसारी पक्ष ने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की।इसके बाद प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई तेज हुई और बुधवार को नगर निगम की ओर से परिवार को चाबी सौंप दी गई। मौके पर नगर निगम के अधिकारी और गाजीपुर प्रशासन की टीम भी मौजूद रही।

बंगले का रास्ता भी बना ‘सरकारी कार्रवाई’ की कहानी का हिस्सा

बंगला वापस मिला, लेकिन उसमें प्रवेश करना भी आसान नहीं था।जब कोठी सील की गई थी, तब उसका मुख्य प्रवेश डालीबाग की ओर था। इस बीच आसपास की जमीन पर बनी सरदार वल्लभभाई पटेल आवासीय योजना की बाउंड्री के कारण पुराना मुख्य गेट घिर गया। रिपोर्टों के मुताबिक इस योजना में 72 फ्लैट बनाए गए हैं।ऐसे में मुख्य गेट से बिना निर्माण हटाए प्रवेश संभव नहीं था। प्रशासन ने पीछे हैदर कैनाल बंधे की ओर बने गेट से परिवार को कब्जा दिलाया और वहां जमा मलबा भी साफ कराया गया।

योगी सरकार की माफिया नीति के बीच आया अदालत का फैसला

इस घटनाक्रम को सिर्फ एक संपत्ति विवाद मानकर छोड़ देना उत्तर प्रदेश की राजनीति की तस्वीर को अधूरा छोड़ देगा।मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने पिछले वर्षों में संगठित अपराध और माफिया नेटवर्क से जुड़ी संपत्तियों पर कुर्की और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को अपनी कानून-व्यवस्था की नीति के प्रमुख हिस्से के तौर पर पेश किया है। मुख्तार अंसारी परिवार की संपत्तियां भी इसी अभियान के केंद्र में रही हैं।

लखनऊ में परिवार से जुड़ी कई संपत्तियों पर पहले प्रशासनिक कार्रवाई हो चुकी है।ऐसे में अब अदालत की प्रक्रिया के बाद अफजाल अंसारी की पत्नी के नाम दर्ज इस संपत्ति का वापस मिलना सरकार के लिए राजनीतिक रूप से असहज सवाल जरूर खड़ा करता है—

क्या माफिया के खिलाफ कार्रवाई में जल्दबाजी हुई थी, या अदालत में टिक सकने वाले ठोस सबूतों की कसौटी अलग थी?

यहां यह समझना जरूरी है कि संपत्ति की वापसी को अदालत द्वारा अफजाल अंसारी या उनके परिवार को आपराधिक मामलों में ‘क्लीन चिट’ दिए जाने के रूप में स्वतः नहीं पढ़ा जाना चाहिए। इस मामले में अदालतों के आदेश विशेष रूप से संबंधित संपत्ति की कुर्की और उसकी वैधानिकता से जुड़े हैं।

अफजाल अंसारी बोले—कानून का राज है

संपत्तियों की रिहाई के बाद अफजाल अंसारी ने अगस्त में कहा था कि देश में कानून का राज है और न्यायिक आदेश के कारण उनकी कुर्क संपत्तियां मुक्त हुई हैं। उन्होंने दावा किया था कि जिस मामले के आधार पर संपत्ति कुर्क की गई थी, उसमें निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट ने रद्द किया और सुप्रीम कोर्ट ने भी उस फैसले को बरकरार रखा।

अफजाल का यह बयान इस पूरे घटनाक्रम की राजनीतिक व्याख्या की दिशा भी तय करता है। उनके लिए यह सिर्फ संपत्ति की वापसी नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहे उस आरोप-प्रत्यारोप का जवाब है जिसमें वह योगी सरकार पर राजनीतिक कार्रवाई का आरोप लगाते रहे हैं।

सपा के लिए राजनीतिक संदेश क्या?

समाजवादी पार्टी के लिए यह घटनाक्रम दो स्तरों पर महत्वपूर्ण है।

पहला, पार्टी इसे न्यायिक प्रक्रिया की जीत के तौर पर पेश कर सकती है।

दूसरा, यह योगी सरकार की उस नीति पर राजनीतिक सवाल उठाने का अवसर देता है जिसके तहत माफिया और अपराध से जुड़ी संपत्तियों पर कठोर कार्रवाई की गई। हालांकि, सपा की ओर से इस विशेष बंगले की चाबी लौटाए जाने पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसलिए पार्टी के नाम से कोई ऐसा बयान जोड़ना उचित नहीं होगा जो आधिकारिक रूप से सामने नहीं आया।

राजनीतिक विश्लेषण: असली लड़ाई ‘बंगले’ की नहीं, नैरेटिव की है

राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में इस घटनाक्रम का महत्व संपत्ति की कीमत या उसके क्षेत्रफल से कहीं ज्यादा है।एक तरफ योगी सरकार का वह नैरेटिव है जिसमें अपराध और माफिया के आर्थिक साम्राज्य पर चोट को कानून-व्यवस्था की बड़ी उपलब्धि बताया गया। दूसरी तरफ अदालत की प्रक्रिया है, जिसने एक खास संपत्ति की कुर्की को खत्म कर दिया।यही वह बिंदु है जहां राजनीति और कानून अलग-अलग रास्तों पर दिखाई देते हैं।

सरकार समर्थक पक्ष का तर्क होगा कि कार्रवाई उस समय उपलब्ध प्रशासनिक और कानूनी आधार पर की गई थी और अदालत के आदेश का सम्मान करते हुए संपत्ति वापस कर दी गई।

विपक्ष इसे इस सवाल से जोड़ सकता है कि यदि अंततः संपत्ति मुक्त करनी पड़ी तो शुरुआती कार्रवाई की कानूनी मजबूती कितनी थी।

कानूनविदों के नजरिए से सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि कुर्की करना भी कानून के तहत प्रक्रिया है और कुर्की समाप्त कर संपत्ति वापस करना भी उसी न्यायिक-प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है। इसलिए किसी एक आदेश को राजनीतिक जीत या हार का अंतिम प्रमाण मानना कानूनी तस्वीर को सरल बना देना होगा।

छह साल की बंद कोठी से फिर खुले दरवाजे तक

डालीबाग की यह कोठी अब सिर्फ एक मकान नहीं रह गई है। यह उत्तर प्रदेश की राजनीति में माफिया कार्रवाई, संपत्ति कुर्की, न्यायिक समीक्षा और सत्ता-विपक्ष के नैरेटिव के टकराव का प्रतीक बन चुकी है।बुधवार को जब अफजाल अंसारी अपनी बेटियों के साथ बंगले पर पहुंचे और वर्षों से बंद पड़े परिसर की सफाई शुरू हुई, तो तस्वीर बदल चुकी थी।

जिस संपत्ति पर कभी सरकारी सील थी, वहां अब परिवार का कब्जा है।लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।अब सवाल यह है कि क्या अदालत के आदेश से संपत्ति की वापसी के बाद इस पूरे प्रकरण की राजनीतिक व्याख्या भी बदलेगी?

योगी सरकार के लिए यह सवाल रहेगा कि उसकी माफिया विरोधी कार्रवाई अदालत की कसौटी पर कितनी मजबूत है,

जबकि अफजाल अंसारी और समाजवादी पार्टी के लिए यह दावा करने का मौका है कि कानून की प्रक्रिया ने उनके पक्ष को राहत दी।

यानी डालीबाग की कोठी की चाबी भले अंसारी परिवार के हाथ में पहुंच गई हो, लेकिन इसकी राजनीतिक चाबी अभी भी उत्तर प्रदेश की सत्ता और विपक्ष के बीच घूम रही है।

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