बी के झा
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पटना, 21 सितंबर
बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण कभी सिर्फ सामाजिक पहचान का सवाल नहीं रहे। कई बार यही समीकरण सत्ता की चाबी, गठबंधन की दिशा और चुनावी रणनीति तय करते रहे हैं। पटना के बापू सभागार में आयोजित लव-कुश प्रतिभा सम्मान समारोह में रविवार को ऐसा ही एक राजनीतिक संदेश सुनाई दिया, जिसने बिहार की बदलती सियासत पर नई बहस छेड़ दी।राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने मंच से कहा—’हम एक हैं तो सेफ हैं, बंटेंगे तो कटेंगे।’
साथ ही उन्होंने आपसी मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाने की सलाह दी। उसी मंच पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार, ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार और विज्ञान एवं प्रावैधिकी मंत्री शीला कुमारी जैसे नेता मौजूद थे। सवाल यही है—कुशवाहा को ‘एकजुटता’ की यह भाषा अभी क्यों जरूरी लगी?
‘लव-कुश’ के मंच पर निकला बड़ा राजनीतिक संदेश
कुशवाहा ने लव-कुश राजनीति को केवल कुर्मी और कुशवाहा समाज तक सीमित मानने से इनकार करते हुए इसे पिछड़े और शोषित तबकों के लिए व्यापक छतरी के रूप में पेश किया। उनका कहना था कि नीतीश कुमार ने विभिन्न सामाजिक समूहों को जोड़कर इस राजनीतिक समीकरण को मजबूत किया।लेकिन उनका सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला वाक्य था—’हम एक हैं तो सेफ हैं, बंटेंगे तो कटेंगे।’कुशवाहा ने साथ ही साफ किया कि यदि समाज में कोई मतभेद है तो उसे आपस में बैठकर बातचीत से सुलझाना चाहिए।
यानी संदेश का दूसरा हिस्सा टकराव नहीं, बल्कि संगठन के भीतर संवाद था।राजनीतिक तौर पर देखें तो यह बयान ऐसे समय आया है जब बिहार में विधान परिषद की चार स्नातक और चार शिक्षक सीटों समेत आठ सीटों के चुनाव की राजनीतिक हलचल तेज है। इन सीटों पर जन सुराज ने भी उम्मीदवार उतारने की तैयारी तेज की है और मुख्यधारा के दलों के भीतर भी तालमेल तथा टिकट को लेकर हलचल की खबरें हैं।इसलिए कुशवाहा के बयान को केवल सामाजिक समारोह की अपील मानना एक दृष्टिकोण हो सकता है; लेकिन उसके राजनीतिक समय को नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है।
1994 की ‘लव-कुश’ राजनीति से 2026 का नया अध्याय
बिहार की राजनीति में कुर्मी-कुशवाहा यानी ‘लव-कुश’ सामाजिक समीकरण का राजनीतिक इतिहास पुराना है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी समारोह में 1992, 1993 और 1994 के कुर्मी चेतना रैली और कुशवाहा सम्मेलन का संदर्भ दिया और बताया कि आगे दोनों समाजों ने मिलकर लव-कुश सम्मेलन का स्वरूप लिया।यही वह दौर था जब पिछड़ी जातियों के भीतर नए राजनीतिक नेतृत्व और प्रतिनिधित्व की मांग तेज हुई।बाद की राजनीति में नीतीश कुमार का उभार इसी सामाजिक पुनर्संयोजन के बड़े अध्यायों में गिना गया।
आज तस्वीर बदल चुकी है। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से हट चुके हैं और बीजेपी के सम्राट चौधरी बिहार के मुख्यमंत्री हैं। ऐसे में लव-कुश राजनीति के पुराने सामाजिक आधार को नए सत्ता-समीकरण के साथ जोड़कर देखना स्वाभाविक है।इंडियन एक्सप्रेस ने भी हाल की बिहार राजनीति में सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद त्रिवेणी संघ से जुड़े सामाजिक समीकरणों के राजनीतिक महत्व को रेखांकित किया है।
मंच पर निशांत कुमार की मौजूदगी क्यों महत्वपूर्ण?
इस कार्यक्रम की एक अहम तस्वीर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और नीतीश कुमार के बेटे एवं मंत्री निशांत कुमार की एक साथ मौजूदगी भी रही।निशांत कुमार ने अपने संबोधन में 2005 के बाद बिहार में हुए विकास का उल्लेख किया और कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सभी वर्गों को साथ लेकर चलने का काम किया। उन्होंने लव-कुश समाज की विशिष्ट पहचान और विभिन्न क्षेत्रों में उसकी उपलब्धियों का भी उल्लेख किया।यह सिर्फ किसी एक परिवार या एक नेता की मौजूदगी का मामला नहीं है। राजनीतिक संकेत के स्तर पर देखें तो मंच पर सम्राट चौधरी—निशांत कुमार—उपेंद्र कुशवाहा की मौजूदगी पुराने सामाजिक आधार और मौजूदा NDA सत्ता-समीकरण के बीच एक दृश्य राजनीतिक सेतु बनाती दिखाई दी। हालांकि इसे किसी भावी नेतृत्व समीकरण का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी।
सम्राट चौधरी का ‘पांच पांडव’ फॉर्मूला
कुशवाहा के ‘एक हैं तो सेफ हैं’ संदेश के बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपनी बात को सीधे NDA की एकजुटता से जोड़ दिया।उन्होंने 2010, 2020 और 2025 के चुनावी आंकड़ों का उदाहरण देते हुए कहा कि जब सहयोगी दल एक साथ थे तो NDA ने बेहतर प्रदर्शन किया और जब अलग-अलग लड़े तो संख्या कम हुई। 2025 के संदर्भ में उन्होंने BJP, JDU, LJP(R), RLM और HAM को ‘पांच पांडव’ बताया और कहा कि वे सभी को साथ लेकर चलेंगे।यहां मंच का संदेश दो स्तरों पर पढ़ा जा सकता है—
कुशवाहा का संदेश: सामाजिक एकजुटता।
सम्राट का संदेश: गठबंधन की एकजुटता।
यानी एक ही मंच पर सामाजिक समीकरण और राजनीतिक गठबंधन का गणित एक-दूसरे से जुड़ता दिखाई दिया।
कांग्रेस ने उठाया ‘बाकी जातियों’ का सवाल
सम्राट चौधरी के लव-कुश समाज को बिहार की समृद्धि का रास्ता खोलने वाला बताते हुए दिए गए बयान पर कांग्रेस प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने आपत्ति जताई।उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार की समृद्धि में दलित, ईबीसी, ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत, कायस्थ और अन्य समुदायों का भी योगदान है और किसी एक सामाजिक समूह को इस तरह केंद्र में रखना सामाजिक समरसता के लिए उचित नहीं है।
यह प्रतिक्रिया बिहार की राजनीति के दूसरे पहलू को सामने लाती है।यदि कोई सामाजिक संगठन अपनी पहचान और प्रतिनिधित्व की बात करता है तो उसे सामाजिक अधिकार की अभिव्यक्ति कहा जा सकता है। लेकिन जब वही भाषा सत्ता और शासन के संदर्भ में आती है, तो सवाल उठता है कि क्या विकास का राजनीतिक मॉडल किसी एक सामाजिक समीकरण के इर्द-गिर्द परिभाषित होना चाहिए या सभी जातियों और समुदायों के समान प्रतिनिधित्व के आधार पर?
मुस्लिम संगठनों और मौलानाओं की भूमिका क्या?
इस विशेष समारोह में मुस्लिम संगठनों या प्रमुख मौलानाओं की कोई ऐसी प्रत्यक्ष, सत्यापित प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है जिसे इस खबर में उनके आधिकारिक बयान के रूप में जोड़ा जा सके। इसलिए उनके नाम से प्रतिक्रिया देना उचित नहीं होगा।लेकिन राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर एक अहम सवाल जरूर है—बिहार की कोई भी सामाजिक-राजनीतिक रणनीति जब जातीय पहचान के आधार पर मजबूत होती है, तब उसका असर केवल संबंधित जातियों तक सीमित नहीं रहता। मुस्लिम, दलित, ईबीसी, आदिवासी और अन्य सामाजिक समूह भी यह देखते हैं कि नई राजनीतिक संरचना में उनकी हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व किस रूप में परिभाषित हो रहा है।
यही वजह है कि ‘लव-कुश’ जैसे सामाजिक राजनीतिक विमर्श का अगला सवाल स्वाभाविक रूप से ‘सबको साथ’ की परिभाषा पर पहुंचता है।
शिक्षाविदों और कानूनविदों के लिए बड़ा सवाल
शिक्षा और कानून के नजरिए से देखें तो जातीय पहचान भारतीय लोकतंत्र का सामाजिक तथ्य है, लेकिन संवैधानिक शासन का आधार नागरिकों की समानता और अधिकार हैं।इसलिए विशेषज्ञ विमर्श में सवाल यह होना चाहिए कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व की सामाजिक मांग और संवैधानिक समानता के बीच संतुलन कैसे कायम हो।
कानूनविदों के नजरिए से भी किसी सामाजिक समूह का राजनीतिक रूप से संगठित होना अपने आप में असंवैधानिक नहीं है। असली कसौटी यह है कि सत्ता में आने के बाद शासन की नीतियां सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार, अवसर और कानून के समान अनुप्रयोग को कैसे सुनिश्चित करती हैं।यानी ‘हम एक हैं’ राजनीतिक संगठन का संदेश हो सकता है, लेकिन शासन का संवैधानिक सिद्धांत इससे व्यापक होता है।
समाजसेवी संगठनों की नजर से असली मुद्दा
समाजसेवी संस्थाओं के लिए जातीय एकता से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि इस एकता का लाभ जमीन पर किसे मिलता है।
क्या युवाओं को रोजगार मिलेगा?
क्या शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति सुधरेगी?
क्या पिछड़े और वंचित वर्गों को वास्तविक आर्थिक अवसर मिलेंगे?
क्या सरकारी योजनाओं का लाभ जातीय पहचान से ऊपर उठकर सबसे जरूरतमंद तक पहुंचेगा?
यही वे सवाल हैं जो किसी भी ‘सामाजिक समीकरण’ को चुनावी नारे से आगे ले जाकर शासन की कसौटी पर खड़ा करते हैं।
प्रशांत किशोर फैक्टर और आठ MLC सीटों का गणित
बिहार की मौजूदा राजनीतिक तस्वीर में एक और महत्वपूर्ण तत्व प्रशांत किशोर की जन सुराज है। पार्टी ने विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित किए हैं। आठ सीटों की यह लड़ाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल नवंबर में समाप्त हो रहा है।ऐसे में लव-कुश जैसे सामाजिक नेटवर्क की राजनीतिक सक्रियता और विभिन्न दलों का अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने का प्रयास चुनावी राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।लेकिन यह कहना कि कुशवाहा का बयान सीधे प्रशांत किशोर के डर से आया, उपलब्ध तथ्यों से साबित नहीं होता। इसे राजनीतिक संदर्भ में उठी एक संभावित व्याख्या के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
एन एस के विश्लेषण:
‘बंटेंगे तो कटेंगे’ का असली अर्थ क्या?
उपेंद्र कुशवाहा का ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ वाला वाक्य पहली नजर में एक सामाजिक एकता का संदेश है। लेकिन बिहार की राजनीति में शब्द अक्सर अपने शब्दार्थ से ज्यादा राजनीतिक अर्थ लेकर चलते हैं।यहां एक तरफ लव-कुश सामाजिक पहचान है,
दूसरी तरफ NDA के पांच दलों की एकजुटता,
तीसरी तरफ आठ विधान परिषद सीटों का चुनावी संघर्ष और चौथी तरफ प्रशांत किशोर की जन सुराज की नई राजनीतिक चुनौती।
इन चारों को एक साथ रखकर देखें तो पटना के मंच की तस्वीर महज सम्मान समारोह की नहीं रह जाती।यह उस बिहार की तस्वीर है जहां पुराने सामाजिक समीकरण नए राजनीतिक गठबंधनों के साथ अपना स्थान तलाश रहे हैं।
कुशवाहा ने कहा—’एक हैं तो सेफ हैं।’सम्राट चौधरी ने कहा—’पांच पांडव साथ हैं।’और विपक्ष ने सवाल उठाया—बिहार की बाकी जातियों और समुदायों का स्थान कहां है?
यही तीन पंक्तियां फिलहाल बिहार की सामाजिक इंजीनियरिंग की तीन अलग-अलग तस्वीरें पेश करती हैं।
अब असली परीक्षा चुनावी मंच पर नहीं, जनता के बीच होगी—जहां जातीय पहचान के साथ रोजगार, शिक्षा, विकास, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के सवाल भी वोट की कसौटी बनेंगे।
