ट्रंप परिवार से जुड़े Powerus की भारत में एंटी-ड्रोन डील: Guardian-1 से पाकिस्तान तक, रक्षा कारोबार के बीच उठे कई सवाल

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली,‌21 सितंबर

ड्रोन युद्ध अब आधुनिक रक्षा रणनीति का एक निर्णायक हिस्सा बन चुका है। यूक्रेन से लेकर पश्चिम एशिया तक कम लागत वाले ड्रोन ने महंगी सैन्य प्रणालियों के सामने नई चुनौती खड़ी की है। इसी बदलते युद्धक्षेत्र के बीच भारत में एक ऐसी एंटी-ड्रोन डील सामने आई है, जिसके कारोबारी रिश्ते सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बेटों से जुड़े निवेश तक पहुंचते हैं।अमेरिकी ऑटोनॉमस सिस्टम कंपनी Powerus ने भारतीय रक्षा कंपनी पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजीज के साथ भारत में अपने Guardian-1 Interceptor की मैन्युफैक्चरिंग और कमर्शियलाइजेशन के लिए एक्सक्लूसिव लाइसेंसिंग समझौता किया है। यह समझौता जून 2026 में हुआ था और इसके तहत भारत में Guardian इंटरसेप्टर उत्पादों के निर्माण और बिक्री का विशेष अधिकार पारस डिफेंस को दिया गया है।

अमेरिकी नियामकीय फाइलिंग में भी इस लाइसेंसिंग समझौते की पुष्टि की गई है।लेकिन इस कहानी का दूसरा सिरा और भी महत्वपूर्ण है। इसी Powerus ने सितंबर में पाकिस्तान की सेना के साथ ड्रोन और अनमैन्ड एरियल सिस्टम से जुड़ा समझौता किया है। कंपनी के मुताबिक उसे पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय से एक शुरुआती ऑर्डर भी मिला है, हालांकि उसकी रकम और खरीदे जाने वाले विशिष्ट सिस्टम का विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है।

Guardian-1 आखिर है क्या?

Powerus के मुताबिक Guardian-1 एक हाई-स्पीड, बैटरी से चलने वाला काउंटर-ड्रोन इंटरसेप्टर है। इसका उद्देश्य कम लागत वाले हवाई हमलों को रोकना है।कंपनी इसे ऐसे वन-वे अटैक ड्रोन के खिलाफ डिजाइन किया गया सिस्टम बताती है, जिनमें Shahed-136 और Geran-2 जैसे ड्रोन शामिल हैं। Powerus ने Guardian-1 और इसके उन्नत Guardian-2 इंटरसेप्टर को 2026 में पेश किया था।यानी यह महंगे मिसाइल सिस्टम से हर छोटे ड्रोन को निशाना बनाने के बजाय अपेक्षाकृत कम लागत वाले इंटरसेप्टर के जरिए ड्रोन खतरे से निपटने की अवधारणा पर आधारित है।

पारस डिफेंस को क्या मिला?

Powerus की सहायक कंपनी Tandem Defense LLC और पारस डिफेंस के बीच हुए समझौते के तहत भारतीय कंपनी को भारत में Guardian इंटरसेप्टर तकनीक के निर्माण और व्यावसायीकरण का एक्सक्लूसिव लाइसेंस मिला है।इसके बदले Powerus को लाइसेंस फीस और भारत में बिक्री से होने वाले नेट प्रॉफिट का हिस्सा मिलेगा। उपलब्ध नियामकीय जानकारी के अनुसार यह लाइसेंस भारत के भीतर निर्माण और कमर्शियलाइजेशन के लिए है।यहां एक अहम बात समझना जरूरी है—लाइसेंसिंग समझौता होने का अर्थ यह नहीं है कि भारतीय सेना ने Guardian-1 को अपने बेड़े में शामिल करने का फैसला कर लिया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इस सिस्टम के लिए अभी भारतीय सशस्त्र बलों की ओर से कोई ऑर्डर सामने नहीं आया है।और फिर पाकिस्तान से आई खबर…भारत में Guardian-1 की लाइसेंसिंग डील जून में हुई। इसके कुछ महीने बाद Powerus पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग को लेकर सुर्खियों में आ गई।

सितंबर में Powerus के सह-संस्थापक ब्रेट वेलिकोविच के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से मुलाकात की। पाकिस्तान की सैन्य सूचना शाखा के मुताबिक बातचीत में रक्षा खरीद, उत्पादन और दीर्घकालिक क्षमता निर्माण पर चर्चा हुई। Powerus ने इसके बाद पाकिस्तान के साथ एक समझौते और शुरुआती ड्रोन ऑर्डर की घोषणा की।Powerus ने जिस खास सिस्टम की पाकिस्तान को आपूर्ति की जाएगी उसका नाम सार्वजनिक नहीं किया है। हालांकि उसकी रिलीज में Guardian-2 की तस्वीर दिखाई गई थी, जो Guardian श्रृंखला का अधिक उन्नत संस्करण है।

असली राजनीतिक और कारोबारी सवाल यहां से शुरू होते हैंPowerus कोई सामान्य कारोबारी कंपनी नहीं रह गई है। मार्च 2026 में Powerus और Nasdaq-listed Aureus Greenway Holdings के विलय की घोषणा हुई थी। नियामकीय दस्तावेजों के अनुसार डोनाल्ड ट्रंप जूनियर और एरिक ट्रंप American Venture Partners के जरिए संयुक्त कंपनी के उल्लेखनीय निवेशकों में शामिल हैं।

यही कड़ी इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ एक सामान्य रक्षा-तकनीकी समझौते से आगे ले जाती है।कंपनी का कहना है कि ट्रंप परिवार का Powerus के संचालन या उसके कारोबारी फैसलों पर नियंत्रण नहीं है। Powerus के अधिकारियों ने भी पहले कहा है कि कंपनी का फोकस तकनीक और रक्षा जरूरतों पर है, राजनीति पर नहीं।लेकिन अमेरिका में इस कारोबारी रिश्ते को लेकर सवाल पहले ही उठ चुके हैं।अमेरिकी सीनेट में डेमोक्रेटिक सांसद एलिजाबेथ वॉरेन ने रक्षा विभाग से Powerus से जुड़े सरकारी कॉन्ट्रैक्ट और संभावित हितों के टकराव को लेकर सवाल पूछे हैं।

अमेरिकी कांग्रेस के अन्य डेमोक्रेटिक सांसदों ने भी Powerus और ट्रंप परिवार से जुड़े रक्षा कारोबार की जांच तथा procurement safeguards पर सवाल उठाए हैं।अमेरिकी सरकार की खरीद प्रक्रिया में निष्पक्षता और हितों के टकराव पर सवाल उठाने वाले विशेषज्ञों में Washington University School of Law की सरकारी नैतिकता विशेषज्ञ कैथलीन क्लार्क भी शामिल रही हैं। वहीं पूर्व व्हाइट हाउस एथिक्स वकील रिचर्ड पेंटर ने ट्रंप परिवार की रक्षा कारोबार में हिस्सेदारी को लेकर सार्वजनिक रूप से गंभीर नैतिक सवाल उठाए हैं।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये अमेरिकी राजनीतिक और नैतिकता संबंधी आलोचनाएं हैं; इनसे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि भारत-पारस डिफेंस समझौते में कोई अनियमितता हुई है।

भारत के लिए रणनीतिक महत्व क्या?

भारत पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन और काउंटर-ड्रोन तकनीक पर तेजी से ध्यान दे रहा है। सीमा क्षेत्रों, सैन्य प्रतिष्ठानों, हवाई अड्डों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा में छोटे ड्रोन तेजी से चुनौती बन रहे हैं।ऐसे में Guardian-1 जैसी इंटरसेप्टर तकनीक का भारत में स्थानीय निर्माण एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध करा सकता है।इसके दो संभावित फायदे हैं—पहला, विदेशी तकनीक का स्थानीय निर्माण और सपोर्ट इकोसिस्टम विकसित होना; दूसरा, भारत में पहले से मौजूद एंटी-ड्रोन क्षमताओं के साथ नई इंटरसेप्टर तकनीक को जोड़ना।लेकिन असली सवाल यह होगा कि यह तकनीक भारतीय परिस्थितियों में कितनी प्रभावी साबित होती है, इसकी लागत कितनी रहती है और क्या भारतीय सशस्त्र बल इसे परीक्षण एवं मूल्यांकन के बाद अपनाते हैं।

अर्थशास्त्रियों की नजर से: रक्षा बाजार का नया ‘ड्रोन इकॉनमी’अर्थव्यवस्था के स्तर पर देखें तो दुनिया में ड्रोन और काउंटर-ड्रोन तकनीक एक तेजी से बढ़ता हुआ रक्षा बाजार बन रही है।यहां सबसे बड़ा बदलाव यह है कि युद्ध के मैदान में सिर्फ बड़े और महंगे हथियार निर्णायक नहीं रह गए हैं। कम लागत वाले ड्रोन और उन्हें रोकने वाली कम लागत की प्रणालियां भी रणनीतिक महत्व हासिल कर रही हैं।

यही वजह है कि Powerus जैसी अपेक्षाकृत नई कंपनियां तेजी से रक्षा बाजार में जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं। अमेरिकी नियामकीय दस्तावेजों में Powerus ने अपने प्रतिस्पर्धियों के रूप में कई बड़ी रक्षा और ड्रोन कंपनियों का उल्लेख किया है।भारत के लिए इसका अर्थ यह है कि अगर घरेलू कंपनियां विदेशी तकनीक के साथ साझेदारी करते हुए धीरे-धीरे डिजाइन, निर्माण और सिस्टम इंटीग्रेशन की अपनी क्षमता बढ़ाती हैं, तो काउंटर-ड्रोन सेक्टर एक महत्वपूर्ण स्वदेशी रक्षा उद्योग बन सकता है।

कानूनविदों के लिए सबसे बड़ा सवाल—IP और रणनीतिक निर्भरता

इस सौदे का कानूनी पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।Guardian-1 के मामले में भारत को निर्माण और व्यावसायीकरण का लाइसेंस मिला है, लेकिन मूल बौद्धिक संपदा Powerus से आती है। इसलिए भविष्य में यह सवाल महत्वपूर्ण होगा कि भारत किस हद तक इस तकनीक को स्वतंत्र रूप से संशोधित, अपग्रेड और निर्यात कर सकता है।रक्षा क्षेत्र में सिर्फ ‘भारत में असेंबली’ और वास्तविक तकनीकी आत्मनिर्भरता में अंतर होता है।यदि मूल डिजाइन, महत्वपूर्ण IP और तकनीकी अपग्रेड के लिए विदेशी कंपनी पर निर्भरता बनी रहती है, तो स्थानीय उत्पादन आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम जरूर होगा, लेकिन अंतिम मंजिल नहीं।

समाज और नागरिक सुरक्षा के नजरिए से भी अहम

काउंटर-ड्रोन सिस्टम का इस्तेमाल केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं है। एयरपोर्ट, परमाणु एवं ऊर्जा प्रतिष्ठान, तेल संयंत्र, बंदरगाह, बड़े सार्वजनिक आयोजन और अन्य संवेदनशील प्रतिष्ठान भी ड्रोन हमलों से सुरक्षा चाहते हैं।इसलिए इस तकनीक का विस्तार राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ नागरिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा से भी जुड़ता है।समाजसेवी और नागरिक-सुरक्षा संस्थाओं के लिए सवाल यह भी रहेगा कि ऐसी तकनीक के इस्तेमाल में जवाबदेही, निगरानी और नागरिक अधिकारों की स्पष्ट सीमाएं तय हों। किसी भी सुरक्षा तकनीक की तरह इसका इस्तेमाल स्पष्ट कानूनी प्रोटोकॉल और अधिकृत एजेंसियों के नियंत्रण में होना जरूरी है।

भारत के विपक्ष के लिए भी कई सवाल

इस खास Powerus-पारस डिफेंस सौदे पर प्रमुख भारतीय विपक्षी दलों की कोई विशिष्ट, सत्यापित सार्वजनिक प्रतिक्रिया फिलहाल उपलब्ध नहीं मिली है। इसलिए किसी दल के नाम से बयान जोड़ना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।लेकिन संसद और सार्वजनिक विमर्श में इस सौदे से जुड़े कुछ सवाल उठ सकते हैं—क्या विदेशी रक्षा तकनीक के लाइसेंस को ‘आत्मनिर्भरता’ की श्रेणी में रखा जा सकता है?

Guardian-1 के भारतीय सैन्य उपयोग से पहले इसके परीक्षण और मूल्यांकन की प्रक्रिया क्या होगी?

भारत में इस तकनीक के निर्माण के दौरान कितना वास्तविक तकनीकी हस्तांतरण होगा?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या भारत-पाकिस्तान दोनों के साथ कारोबार करने वाली किसी विदेशी रक्षा कंपनी से जुड़ी तकनीक के मामले में अतिरिक्त रणनीतिक मूल्यांकन की जरूरत है?

ये सवाल किसी सौदे को सही या गलत ठहराने के बजाय उसकी पारदर्शिता और रणनीतिक उपयोगिता को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

एन एस के विश्लेषण:

असली कहानी Guardian-1 से बड़ी है

इस पूरी कहानी को केवल ‘ट्रंप के बेटों की कंपनी की भारत में डील’ के रूप में देखना अधूरा होगा।एक तरफ भारत को आधुनिक काउंटर-ड्रोन तकनीक की जरूरत है। दूसरी तरफ अमेरिका की एक नई रक्षा कंपनी भारत में अपने इंटरसेप्टर की मैन्युफैक्चरिंग के लिए भारतीय कंपनी को अधिकार देती है। उसी कंपनी के ट्रंप परिवार से जुड़े निवेशक हैं। और कुछ ही समय बाद वही कंपनी पाकिस्तान के साथ ड्रोन सहयोग का ऐलान करती है।

यह संयोग है, कारोबारी विस्तार है या बदलती वैश्विक रक्षा अर्थव्यवस्था का नया चेहरा—इसका फैसला तथ्यों और आगे होने वाले सौदों से ही होगा।लेकिन भारत के लिए नीति का मूल सवाल साफ है—विदेशी तकनीक भारत में बने, यह अच्छी शुरुआत हो सकती है; लेकिन भारत की असली रणनीतिक ताकत तब बनेगी जब विदेशी तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय भारत खुद अगली पीढ़ी की एंटी-ड्रोन तकनीक डिजाइन, विकसित और निर्यात करने की स्थिति में पहुंचे।

ड्रोन युद्ध का दौर शुरू हो चुका है। अब सवाल यह नहीं है कि आसमान में ड्रोन कितने हैं—सवाल यह है कि उन्हें रोकने की तकनीक किसके पास है और उस तकनीक की चाबी किसके हाथ में है।

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