बी के झा
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पटना, 24 अगस्त
गंगा का पानी अब बिहार की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गया है। वर्ष 1996 में हुई भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि की 30 वर्ष की अवधि दिसंबर 2026 में समाप्त हो रही है। इसके संभावित नवीनीकरण को लेकर बिहार में सियासत तेज हो गई है। सत्तारूढ़ जेडीयू ने केंद्र से मांग की है कि बिहार की वर्तमान और भविष्य की जल जरूरतों को सुरक्षित किए बिना नई व्यवस्था आगे न बढ़ाई जाए।जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने फरक्का के मुद्दे को राज्यसभा में भी उठाया है। उनका कहना है कि आबादी, सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक जरूरतों को देखते हुए 2050 तक बिहार की जल आवश्यकता काफी बढ़ेगी।
जल संसाधन मंत्री विजय चौधरी और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी केंद्र के सामने बिहार की चिंताएं रख चुके हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर से हुई बातचीत में बिहार के सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और जल संसाधन से जुड़े मुद्दों को संधि नवीनीकरण की चर्चा में शामिल करने का भरोसा मिलने की बात कही गई है।
लालू ने खोला मोर्चा
जेडीयू के रुख पर आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि फरक्का का विरोध आरजेडी की पुरानी नीति रही है और बिहार के हितों को लेकर उनकी पार्टी पहले से आवाज उठाती रही है। आरजेडी नेता आलोक मेहता ने भी सवाल किया कि लंबे समय से सत्ता में रहने के बावजूद अब जेडीयू को फरक्का की याद क्यों आई। इस तरह पानी का मुद्दा पुराने राजनीतिक दावों और आरोप-प्रत्यारोप में बदल गया है।
क्या है 1996 की संधि?
12 दिसंबर 1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि में शुष्क मौसम यानी 1 जनवरी से 31 मई के बीच फरक्का पर गंगा के पानी के बंटवारे का प्रावधान है। पानी का आवंटन 10-10 दिन की अवधि के आधार पर होता है और इसकी निगरानी दोनों देशों की संयुक्त समिति करती है। संधि की अवधि 30 वर्ष है।हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार की बाढ़ और गाद की पूरी समस्या को केवल फरक्का बैराज या जल संधि से जोड़ना सही नहीं होगा। गाद का जमाव, सहायक नदियों का प्रवाह, अत्यधिक बारिश, तटबंध, नदी तल, जल निकासी और जलवायु परिवर्तन समेत कई कारक बाढ़ को प्रभावित करते हैं।
बदलती जलवायु ने बढ़ाई चुनौती
भारतीय विश्व मामलों की परिषद (ICWA) के विश्लेषण के मुताबिक 1996 की संधि जिन पुराने हाइड्रोलॉजिकल आंकड़ों पर आधारित थी, गंगा की मौजूदा परिस्थितियां उनसे काफी बदल चुकी हैं। बदलते वर्षा पैटर्न, बाढ़ और सूखे के बढ़ते जोखिम को देखते हुए पुराने आंकड़ों और जल बंटवारे के फार्मूले की समीक्षा की जरूरत महसूस की जा रही है।बिहार की समस्या भी दोहरी है। मानसून में बाढ़ और गाद से तबाही होती है, जबकि शुष्क मौसम में पानी की उपलब्धता का संकट सामने आता है। इसलिए राज्य की मांग केवल पानी के हिस्से तक सीमित न रहकर सिंचाई, पेयजल, बाढ़ नियंत्रण, गाद प्रबंधन और समग्र गंगा बेसिन प्रबंधन से जुड़ती है।
बिहार की भूमिका कितनी?
कानूनी तौर पर भारत-बांग्लादेश संधि केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में है और बिहार अकेले इसे बदल या रद्द नहीं कर सकता। लेकिन संधि का सीधा असर बिहार की जल उपलब्धता, सिंचाई और बाढ़ प्रबंधन पर पड़ता है। ऐसे में राज्य नई व्यवस्था में अपनी वर्तमान और भविष्य की जरूरतों को औपचारिक रूप से शामिल कराने की मांग कर रहा है।भारत के सामने चुनौती भी दोहरी है। उसे एक ओर बिहार और अन्य गंगा बेसिन राज्यों के हितों का संतुलन करना है, वहीं दूसरी ओर बांग्लादेश के साथ जल कूटनीति को भी बनाए रखना है।
सियासत से आगे नीति की जरूरत
दिलचस्प यह है कि जेडीयू और आरजेडी राजनीतिक रूप से एक-दूसरे पर हमला कर रहे हैं, लेकिन दोनों बिहार के जल हितों की बात कर रहे हैं। अंतर केवल इतना है कि जेडीयू भविष्य की जरूरतों को लेकर नई संधि में बिहार के हित सुरक्षित कराने पर जोर दे रही है, जबकि आरजेडी अपने पुराने फरक्का विरोध को आधार बनाकर जेडीयू पर सवाल उठा रही है।
अब असली जरूरत राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर वैज्ञानिक अध्ययन की है। बिहार को 2050 तक की जल जरूरत का आकलन, बाढ़ और गाद प्रबंधन की दीर्घकालिक योजना, सिंचाई-पेयजल की जरूरत और गंगा के वास्तविक जल प्रवाह के आंकड़ों के आधार पर केंद्र के सामने ठोस प्रस्ताव रखना होगा।
फरक्का पर असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत-बांग्लादेश के बीच कितना पानी बंटेगा। बड़ा सवाल यह है कि बिहार की वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी।
यदि नई व्यवस्था में इसका टिकाऊ समाधान मिलता है, तभी इसे बिहार के हितों के अनुरूप माना जा सकेगा।
