ब्रिटेन के बंटवारे की आहट? स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड ने मिलकर बढ़ाया दबाव, कहा- ‘वेस्टमिंस्टर का समय खत्म होने को’ ब्रिटिश सरकार के सामने खड़ी हुई बड़ी संवैधानिक चुनौती

बी के झा

एन एस के डेस्क

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एनएसके डेस्क।

नई दिल्ली, 15 सितंबर

जिस ब्रिटेन ने कभी दुनिया के विशाल भूभाग पर अपने साम्राज्य का झंडा बुलंद किया था, आज वही ब्रिटेन अपनी ही संघीय संरचना को लेकर एक गंभीर सवाल के सामने खड़ा दिखाई दे रहा है।

क्या यूनाइटेड किंगडम आने वाले वर्षों में उसी स्वरूप में कायम रहेगा, जिस रूप में दुनिया उसे आज जानती है?

या फिर स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड की बढ़ती राष्ट्रवादी राजनीति ब्रिटेन के नक्शे को बदलने की दिशा में आगे बढ़ेगी?

यह सवाल इसलिए अहम हो गया है क्योंकि 14 सितंबर को वेल्स की राजधानी कार्डिफ में स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड से जुड़े प्रमुख राष्ट्रवादी नेताओं ने एक संयुक्त समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। समझौते में आत्मनिर्णय के अधिकार, संवैधानिक बदलाव और अपने-अपने भविष्य का फैसला खुद करने की मांग को प्रमुखता दी गई है। नेताओं ने ब्रिटिश सरकार से संभावित संवैधानिक बदलाव के लिए तैयार रहने का आह्वान किया है।

‘वेस्टमिंस्टर का समय खत्म होने को’ ’कार्डिफ बैठक का सबसे राजनीतिक रूप से विस्फोटक संदेश था—“वेस्टमिंस्टर का समय अब खत्म होने को है।

”स्कॉटलैंड के SNP नेता जॉन स्विनी, वेल्स के Plaid Cymru नेता रुन एपी इओर्थवर्थ और उत्तरी आयरलैंड की Sinn Féin नेता मिशेल ओ’नील ने संयुक्त रूप से यह संकेत दिया कि ब्रिटेन के भीतर सत्ता और संवैधानिक अधिकारों के पुराने केंद्रीकृत ढांचे को अब चुनौती दी जा रही है।Sinn Féin की नेता मैरी लू मैकडोनाल्ड भी इस बैठक में शामिल हुईं।

नेताओं ने कहा कि तीनों क्षेत्रों के लोगों को अपने राजनीतिक भविष्य का फैसला स्वयं करने का अधिकार होना चाहिए। समझौते में यूरोप के साथ संबंध मजबूत करने और आत्मनिर्णय के अधिकार को आगे बढ़ाने के लिए सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी जताई गई है।

हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि यह समझौता तत्काल ब्रिटेन से अलग होने का कानूनी फैसला नहीं है। यह मुख्य रूप से राजनीतिक और संवैधानिक दबाव बनाने वाला समझौता है। स्कॉटलैंड और वेल्स के लिए स्वतंत्रता का जनमत संग्रह कराने की राह अभी भी ब्रिटिश संसद और संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़ी हुई है।

स्कॉटलैंड फिर मांग रहा आजादी पर जनमत संग्रह

स्कॉटलैंड इस पूरे घटनाक्रम का सबसे प्रमुख केंद्र है। 2014 में वहां आजादी को लेकर जनमत संग्रह हो चुका है, जिसमें 55 फीसदी मतदाताओं ने ब्रिटेन के साथ बने रहने के पक्ष में मतदान किया था।लेकिन करीब 12 साल बाद SNP एक बार फिर स्वतंत्रता के मुद्दे को राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में ला रहा है। जॉन स्विनी ने अब संकेत दिया है कि स्कॉटलैंड में 2031 तक स्वतंत्रता पर जनमत संग्रह कराया जाना चाहिए।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम की हालिया टिप्पणियों ने भी इस बहस को हवा दी है। उन्होंने संसद में कहा था कि यदि किसी क्षेत्र में जनमत किसी संवैधानिक बदलाव के पक्ष में स्पष्ट रूप से बदलता है तो जनमत संग्रह के सवाल पर विचार किया जा सकता है। बाद में डाउनिंग स्ट्रीट ने स्पष्ट किया कि सरकार की प्राथमिकता आर्थिक और सामाजिक मुद्दे हैं तथा वह फिलहाल संवैधानिक बहस को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं है।

यही विरोधाभास अब SNP के लिए राजनीतिक हथियार बन गया है।

उत्तरी आयरलैंड का रास्ता अलग, लेकिन सबसे संवेदनशील

उत्तरी आयरलैंड का मामला स्कॉटलैंड और वेल्स से अलग है। Good Friday Agreement के तहत यदि ऐसी स्थिति बनती है कि उत्तरी आयरलैंड के लोगों का बहुमत आयरलैंड गणराज्य के साथ एकीकरण चाहता है, तो सीमा जनमत संग्रह पर विचार किया जा सकता है।यानी यहां ब्रिटेन से अलग होने का संवैधानिक रास्ता पहले से मौजूद है।

Sinn Féin लंबे समय से संयुक्त आयरलैंड की मांग कर रही है। अब उसकी राजनीतिक ताकत और स्कॉटलैंड तथा वेल्स के राष्ट्रवादी दलों के साथ बढ़ता तालमेल ब्रिटेन के लिए नई चुनौती पैदा कर रहा है।

वेल्स ने भी बदली राजनीतिक दिशा

वेल्स को लंबे समय तक ब्रिटेन के भीतर अपेक्षाकृत कम मुखर राष्ट्रवादी राजनीति वाले क्षेत्र के रूप में देखा जाता रहा। लेकिन अब वहां भी स्वतंत्रता की आवाज पहले के मुकाबले अधिक मजबूत दिखाई दे रही है।

Plaid Cymru की अगुवाई में वेल्स ने साफ कर दिया है कि भविष्य का फैसला वेल्स के लोगों की इच्छा के अनुसार होना चाहिए। हालांकि वेल्श नेतृत्व ने अभी स्वतंत्रता पर जनमत संग्रह की कोई निश्चित तारीख घोषित नहीं की है।इसी बीच स्कॉटलैंड और वेल्स ने अलग से Cardiff Agreement भी किया है, जिसके तहत दोनों सरकारें गरीबी, जीवन-यापन की लागत, आर्थिक विकास, जलवायु और यूरोपीय संघ के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंधों जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाएंगी।

ट्रंप के बयान ने भी बढ़ाई लंदन की बेचैनी

इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आयरलैंड के एकीकरण के समर्थन वाली टिप्पणियों ने बहस को और अंतरराष्ट्रीय रंग दे दिया है।ट्रंप के बयान से उत्तरी आयरलैंड के भविष्य को लेकर ब्रिटिश राजनीति में पहले से चल रही बहस और तेज हुई।

हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति की टिप्पणी अपने आप में ब्रिटेन की संवैधानिक व्यवस्था को नहीं बदलती, लेकिन इसने आयरिश एकीकरण के समर्थकों को राजनीतिक और प्रतीकात्मक तौर पर अतिरिक्त ऊर्जा जरूर दी है।

क्या सचमुच टूट जाएगा ब्रिटेन?

फिलहाल इसका जवाब नहीं है। कार्डिफ समझौता ब्रिटेन के टूटने की घोषणा नहीं है। लेकिन यह जरूर है कि पहली बार स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड की राष्ट्रवादी राजनीति एक साझा मंच पर ब्रिटेन की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती देती नजर आई है।

यही इस घटनाक्रम की असली गंभीरता है।ब्रिटेन की चुनौती केवल अलगाववादी नारों की नहीं, बल्कि इस सवाल की है कि क्या लंदन भविष्य में भी उसी राजनीतिक केंद्रीकरण के साथ यूनाइटेड किंगडम को चला पाएगा?

यदि स्कॉटलैंड में स्वतंत्रता की मांग मजबूत होती है, उत्तरी आयरलैंड में आयरिश एकीकरण का समर्थन बढ़ता है और वेल्स में भी स्वतंत्रता की राजनीति जड़ें जमाती है, तो ब्रिटेन को अपने संविधान और संघीय ढांचे पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।

इसलिए कार्डिफ से निकला संदेश सिर्फ एक राजनीतिक समझौते का संदेश नहीं है। यह लंदन के लिए चेतावनी भी है—ब्रिटेन की एकता अब केवल संसद के बहुमत से नहीं, बल्कि उसके अलग-अलग राष्ट्रों की राजनीतिक इच्छाओं से भी तय होगी।

और अगर आने वाले वर्षों में इन तीनों क्षेत्रों में जनमत ब्रिटेन से अलग होने के पक्ष में निर्णायक रूप से बदलता है, तो कभी दुनिया पर राज करने वाले ब्रिटेन के सामने अपने ही घर की सीमाएं बचाए रखने की सबसे बड़ी संवैधानिक परीक्षा खड़ी हो सकती है।

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