बी के झा
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नई दिल्ली, 23 अगस्त
आरक्षण को लेकर केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने एक बार फिर अपनी पार्टी की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि आरक्षण किसी सरकार, राजनीतिक दल या व्यवस्था की ओर से दी गई ‘खैरात’ नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि आरक्षण को खत्म करने की बात तो दूर, इसकी समीक्षा भी उनकी पार्टी को स्वीकार्य नहीं है। चिराग ने अपने पुराने संसदीय वक्तव्य का वीडियो साझा करते हुए सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।चिराग के इस बयान ने आरक्षण पर चल रही पुरानी राजनीतिक बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है। एक ओर उनके समर्थक इसे सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों के संवैधानिक हितों की रक्षा की स्पष्ट राजनीतिक प्रतिबद्धता बता रहे हैं,
वहीं दूसरी ओर कुछ समाजसेवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि बदलते सामाजिक-आर्थिक हालात में आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा पर पूरी तरह दरवाजा बंद करना क्या उचित है?‘
आरक्षण खैरात नहीं, संविधान का अधिकार’
चिराग पासवान ने फरवरी 2020 में संसद में दिए गए अपने वक्तव्य का वीडियो साझा करते हुए कहा कि आरक्षण किसी की कृपा या दया से नहीं मिला है। यह संविधान में निहित सामाजिक न्याय की व्यवस्था का हिस्सा है। उनका कहना है कि आरक्षण समाप्त करना तो दूर, इसकी समीक्षा का विचार भी उनकी पार्टी स्वीकार नहीं करेगी।चिराग का यह रुख उनके राजनीतिक आधार से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) लंबे समय से सामाजिक न्याय, दलित-पिछड़े वर्गों के अधिकार और संवैधानिक संरक्षण के मुद्दों को अपनी राजनीति के प्रमुख आधारों में रखती रही है। ऐसे में आरक्षण पर चिराग का कड़ा बयान केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि अपने समर्थक सामाजिक समूहों को दिया गया स्पष्ट संदेश भी माना जा रहा है।
समाजसेवियों ने उठाया दूसरा पक्ष
चिराग पासवान के बयान पर बिहार के एक वरिष्ठ समाजसेवी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि आरक्षण को ‘खैरात’ कहना या न कहना राजनीतिक शब्दावली का विषय हो सकता है, लेकिन देश में आरक्षण की व्यवस्था के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर विमर्श से इनकार नहीं किया जा सकता।समाजसेवी ने कहा कि संविधान ने सामाजिक रूप से पिछड़े और वंचित वर्गों को प्रतिनिधित्व तथा अवसर दिलाने के लिए विशेष प्रावधान किए हैं, लेकिन लोकतंत्र में किसी भी नीति की समय-समय पर समीक्षा और प्रभाव का आकलन होना स्वाभाविक प्रक्रिया है।
उनके मुताबिक, आरक्षण के प्रश्न को केवल राजनीतिक नारों तक सीमित करने के बजाय सामाजिक न्याय, आर्थिक पिछड़ापन, शिक्षा, रोजगार और अवसरों की समानता के व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की समस्याओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि किसी वर्ग में आर्थिक रूप से बेहद कमजोर परिवार हैं और वे शिक्षा तथा रोजगार के अवसरों से वंचित हैं, तो उनके लिए भी नीतिगत समाधान तलाशना सरकार और राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है।
‘सिर्फ एक पक्ष नहीं, पूरे समाज की चिंता जरूरी’
समाजसेवी ने चिराग पासवान को निशाने पर लेते हुए कहा कि लोकतंत्र में किसी एक सामाजिक समूह के हितों की बात करना गलत नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में व्यापक सामाजिक संतुलन का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।उन्होंने कहा कि आज आरक्षण को लेकर समाज में कई तरह की आकांक्षाएं और असंतोष मौजूद हैं। एक तरफ वंचित वर्ग अपने संवैधानिक अधिकारों को कमजोर किए जाने को लेकर चिंतित है, तो दूसरी तरफ ऐसे वर्ग भी हैं जो शिक्षा और सरकारी नौकरियों में अवसरों को लेकर खुद को पीछे छूटा हुआ महसूस करते हैं। इसलिए इस पूरे विषय पर भावनात्मक टकराव के बजाय तथ्य आधारित राष्ट्रीय बहस की जरूरत है।
चिराग के राजनीतिक सफर में आरक्षण और सामाजिक न्याय की अहम भूमिका
चिराग पासवान की राजनीति को समझने के लिए उनके राजनीतिक और पारिवारिक विरासत को देखना जरूरी है। वे दिवंगत केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक राम विलास पासवान के पुत्र हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद उन्होंने वर्ष 2011 में फिल्मी दुनिया में कदम रखा, लेकिन अभिनय में अपेक्षित सफलता नहीं मिलने के बाद वे सक्रिय राजनीति में आ गए।वर्ष 2012 में वे लोक जनशक्ति पार्टी के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष बने। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने बिहार की जमुई सुरक्षित सीट से जीत दर्ज कर संसद में प्रवेश किया। वर्ष 2019 में भी वे इसी सीट से निर्वाचित हुए।
पार्टी की कमान संभालने के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती
अक्टूबर 2020 में पिता राम विलास पासवान के निधन और उसके बाद पार्टी में पैदा हुए राजनीतिक संकट के रूप में आई। वर्ष 2021 में चाचा पशुपति कुमार पारस के नेतृत्व में पार्टी के अधिकांश सांसदों के अलग होने से चिराग के सामने राजनीतिक अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया।इसके बावजूद उन्होंने अलग संगठन खड़ा किया और अक्टूबर 2021 में लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के साथ अपनी राजनीतिक यात्रा को आगे बढ़ाया। ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ के नारे के साथ उन्होंने संगठन को फिर से मजबूत करने का प्रयास किया।
2024 में मिली बड़ी राजनीतिक वापसी
वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव चिराग पासवान के राजनीतिक करियर के लिए महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। उन्होंने हाजीपुर लोकसभा सीट से जीत दर्ज की और उनकी पार्टी ने एनडीए के साथ रहते हुए उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। इसके बाद उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री की जिम्मेदारी मिली।इस राजनीतिक वापसी ने चिराग को बिहार की राजनीति में एक बार फिर महत्वपूर्ण चेहरा बना दिया। यही कारण है कि आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर उनका बयान केवल सामाजिक न्याय की बहस तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है।‘
आने वाले चुनाव तय करेंगे किसकी राजनीति मजबूत होगी
’चिराग के बयान पर प्रतिक्रिया देने वाले समाजसेवी ने राजनीतिक दलों को भी आगाह किया। उनका कहना है कि आने वाले चुनावों में सामाजिक समीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे और किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह मान लेना उचित नहीं होगा कि कोई भी वर्ग हमेशा किसी एक दल के साथ रहेगा।उन्होंने कहा कि सामान्य वर्ग के मतदाताओं में भी आरक्षण और अवसरों को लेकर असंतोष है। यदि राजनीतिक दल उनकी चिंताओं की अनदेखी करते हैं तो इसका चुनावी असर दिखाई दे सकता है।
उनके मुताबिक, चुनाव में मतदाता किसी नेता या दल को केवल जातीय समीकरण के आधार पर समर्थन नहीं देते, बल्कि रोजगार, शिक्षा, आर्थिक अवसर और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे भी तेजी से महत्वपूर्ण हो रहे हैं।
आरक्षण की बहस अब सिर्फ राजनीति नहीं, सामाजिक विमर्श भी
दरअसल, भारत में आरक्षण का प्रश्न केवल सरकारी नौकरियों या शैक्षणिक संस्थानों में सीटों तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक प्रतिनिधित्व, ऐतिहासिक वंचना, अवसरों की समानता और राजनीतिक भागीदारी से जुड़ा व्यापक विषय है। इसलिए आरक्षण पर कोई भी बयान तत्काल राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा करता है।चिराग पासवान ने समीक्षा के सवाल पर जिस तरह स्पष्ट और कठोर रुख अपनाया है, उससे यह संदेश जरूर गया है कि उनकी पार्टी आरक्षण के मुद्दे पर पीछे हटने के मूड में नहीं है।
लेकिन दूसरी ओर, समाज के विभिन्न वर्गों से उठ रहे सवाल यह संकेत भी देते हैं कि आरक्षण पर बहस आने वाले दिनों में और व्यापक हो सकती है।एक तरफ चिराग पासवान इसे संविधान और सामाजिक न्याय की रक्षा का सवाल मानते हैं, वहीं उनके आलोचक चाहते हैं कि व्यवस्था के प्रभाव, लाभार्थियों की स्थिति और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की चिंताओं पर भी खुली बहस हो। यही विरोधाभास आने वाले समय में आरक्षण की राजनीति को और धार दे सकता है।
चिराग के लिए भी आसान नहीं होगी आगे की राह
चिराग पासवान ने जिस दृढ़ता के साथ आरक्षण पर अपनी स्थिति रखी है, उससे उनके समर्थक वर्ग में स्पष्ट संदेश गया है। लेकिन व्यापक राजनीति में उनके सामने चुनौती यह होगी कि वे सामाजिक न्याय की अपनी प्रतिबद्धता के साथ उन वर्गों की चिंताओं का जवाब कैसे देते हैं जो मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में बदलाव या समीक्षा की मांग कर रहे हैं।बिहार की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरण बेहद महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे में चिराग के लिए आने वाले चुनाव सिर्फ सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक आधार को और मजबूत करने की परीक्षा भी होंगे।
आरक्षण पर चिराग का संदेश फिलहाल साफ है—न खत्म करने की बात स्वीकार्य है और न समीक्षा की मांग। लेकिन लोकतंत्र में अंतिम फैसला किसी नेता के बयान से नहीं, बल्कि जनता की राजनीतिक पसंद से होता है।
आने वाले चुनाव यह बताएंगे कि चिराग की यह स्पष्ट नीति उनके राजनीतिक भविष्य को और मजबूत करती है या उनके सामने नए सामाजिक-राजनीतिक सवाल खड़े करती है।
