बी. के. झा
NSK news Ind

नई दिल्ली, 11 अक्टूबर
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनों और युवाओं से जुड़े विवादों के बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत का बच्चों और किशोरों को लेकर दिया गया संदेश एक नई चर्चा का आधार बन सकता है। उन्होंने साफ कहा कि कानून के दायरे में आए बच्चों की बात केवल सुनी नहीं जानी चाहिए, बल्कि उसे समझने की कोशिश भी होनी चाहिए। न्याय व्यवस्था की असली कसौटी केवल अपराध पर प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि यह पहचानना भी है कि किसी बच्चे के जीवन में ऐसी परिस्थिति पैदा क्यों हुई।जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के दस वर्ष पूरे होने पर आयोजित राष्ट्रीय परामर्श कार्यक्रम में प्रधान न्यायाधीश ने सुधार, पुनर्वास और बच्चों की गरिमा पर जोर दिया। उनका संदेश उन सभी संस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण है, जिनका सामना किशोरों, छात्रों और कानून के दायरे में आए नाबालिगों से होता है।
लेकिन इस संदेश के साथ एक बड़ा सवाल भी जुड़ा है—क्या भारत की व्यवस्था बच्चों को गलती के बाद दूसरा मौका देने के लिए पर्याप्त संवेदनशील है, या सामाजिक आक्रोश और अपराध की गंभीरता के बीच सुधार की अवधारणा अक्सर पीछे छूट जाती है?
‘सजा नहीं, सुधार’—न्याय की सोच में बदलाव का संदेश
प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कानून के दायरे में आने वाला बच्चा कई बार कुछ समय पहले तक ऐसा बच्चा होता है, जिसे देखभाल और संरक्षण की जरूरत थी। यदि व्यवस्था समय रहते उसकी परेशानियों को पहचानने में विफल रहती है, तो बाद में केवल दंडात्मक कार्रवाई करना समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।उन्होंने सुधारात्मक दृष्टिकोण पर जोर देते हुए स्पष्ट किया कि बच्चे को उसके कृत्य से पैदा हुए नुकसान की जवाबदेही से पूरी तरह मुक्त करना उद्देश्य नहीं है। उद्देश्य यह है कि न्याय की प्रक्रिया बच्चे के भविष्य को स्थायी रूप से बर्बाद करने के बजाय उसे बेहतर रास्ते पर लौटने का अवसर दे।यह दृष्टिकोण इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि किशोर न्याय व्यवस्था में एक ओर पीड़ित को न्याय दिलाना और अपराध की गंभीरता को स्वीकार करना जरूरी है, तो दूसरी ओर नाबालिग की उम्र, मानसिक परिपक्वता, परिस्थितियों और पुनर्वास की संभावनाओं को भी समझना पड़ता है।
प्रधान न्यायाधीश का संदेश इसी संतुलन की ओर संकेत करता है—न तो पीड़ित के साथ हुए नुकसान को नजरअंदाज किया जाए और न ही बच्चे को जीवनभर अपराधी की पहचान में कैद कर दिया जाए।
क्या 18 साल से कम उम्र के हर बच्चे को सजा से छूट है?
यहां कानून की एक महत्वपूर्ण बारीकी समझना जरूरी है। किशोर न्याय अधिनियम का अर्थ यह नहीं है कि 18 वर्ष से कम उम्र के प्रत्येक व्यक्ति को हर परिस्थिति में सामान्य आपराधिक जवाबदेही से पूरी तरह छूट मिल जाती है।कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को सामान्यतः बच्चा माना जाता है और उसके मामले की सुनवाई किशोर न्याय व्यवस्था के अंतर्गत होती है। हालांकि, 16 से 18 वर्ष की आयु के किशोर पर जघन्य अपराध का आरोप होने पर कानून में प्रारंभिक आकलन की विशेष व्यवस्था है।
किशोर न्याय बोर्ड उसकी मानसिक और शारीरिक क्षमता, अपराध के परिणामों को समझने की योग्यता तथा कथित अपराध की परिस्थितियों का आकलन करता है। निर्धारित कानूनी शर्तें पूरी होने पर मामला बाल न्यायालय के समक्ष भेजा जा सकता है।इसलिए प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणी को अपराध की गंभीरता को कम करके आंकने या सभी नाबालिगों को बिना शर्त छूट देने के रूप में देखना सही नहीं होगा। इसका केंद्रीय संदेश यह है कि न्यायिक प्रक्रिया में बच्चे की उम्र और परिस्थितियों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
जस्टिस नागरत्ना की चेतावनी: बच्चों की आवाज दबाना समाज के लिए खतरा
सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश और किशोर न्याय समिति की अध्यक्ष जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने भी बच्चों की चिंताओं को समझने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यदि बड़े बच्चों की परेशानियों को लगातार नजरअंदाज करते हैं, तो वे अलग-थलग और अस्वीकार किए जाने का अनुभव कर सकते हैं।उनका संदेश केवल अदालतों या पुलिस तक सीमित नहीं है। परिवार, विद्यालय, प्रशासन और समाज—सभी की जिम्मेदारी है कि बच्चों की समस्याओं को समय रहते पहचाना जाए। बच्चों के व्यवहार के पीछे मौजूद पारिवारिक तनाव, सामाजिक दबाव, शिक्षा से जुड़ी कठिनाइयों और भावनात्मक परेशानियों को समझे बिना केवल कठोर प्रतिक्रिया देना कई बार समस्या को और गहरा कर सकता है।
जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी किशोर न्याय व्यवस्था के उस बुनियादी सिद्धांत को सामने रखती है, जिसमें बच्चे को किसी मुकदमे की फाइल या आंकड़ा मानने के बजाय एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता है, जिसका भविष्य न्यायिक और प्रशासनिक फैसलों से प्रभावित होगा।
CJP विवाद की पृष्ठभूमि में क्यों महत्वपूर्ण है यह संदेश?
CJP आंदोलन के साथ युवाओं की नाराजगी, रोजगार, शिक्षा और संस्थाओं की जवाबदेही जैसे मुद्दे चर्चा में रहे हैं। आंदोलन को व्यापक पहचान मिलने की एक वजह मुख्य न्यायाधीश की उस पूर्व टिप्पणी से पैदा हुआ विवाद भी रहा, जिसमें बेरोजगार युवाओं की तुलना ‘कॉकरोच’ से किए जाने को लेकर तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। इसी संदर्भ ने CJP नाम और उसके राजनीतिक-सामाजिक संदेश को चर्चा में ला दिया।हालांकि, 10 अक्टूबर को किशोर न्याय कानून के दस वर्ष पूरे होने पर दिया गया
जस्टिस सूर्यकांत का बयान एक अलग, आधिकारिक न्यायिक कार्यक्रम का हिस्सा था। इसे CJP के विरोध प्रदर्शन पर सीधे जवाब या आंदोलन के समर्थन के रूप में पेश करने का कोई पुष्ट आधार सामने नहीं है।फिर भी, व्यापक संदर्भ में दोनों घटनाक्रम युवाओं के प्रति संस्थागत भाषा, सम्मान और जवाबदेही पर सवाल उठाते हैं। सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों की टिप्पणियों का प्रभाव केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहता। वे यह भी तय करती हैं कि युवा खुद को व्यवस्था का सम्मानित हिस्सा महसूस करते हैं या उपेक्षित वर्ग के रूप में देखते हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर बनाए रखना जरूरी है: बेरोजगार युवाओं की राजनीतिक नाराजगी और कानून के दायरे में आए नाबालिगों के अधिकार दो अलग मुद्दे हैं। लेकिन दोनों में संवाद, गरिमा और संस्थागत संवेदनशीलता की भूमिका पर बहस हो सकती है।
कानूनविदों की नजर में असली चुनौती: कानून से ज्यादा उसका क्रियान्वयन
किशोर न्याय कानून के दस वर्ष पूरे होने पर आयोजित राष्ट्रीय परामर्श का उद्देश्य भी यही था कि कानून के क्रियान्वयन की उपलब्धियों, कमियों और अगले दशक की प्राथमिकताओं की समीक्षा की जाए। सुप्रीम कोर्ट और यूनिसेफ से जुड़े इस आयोजन में बाल संरक्षण और किशोर न्याय व्यवस्था को मजबूत करने के सवाल प्रमुख रहे। कानूनी दृष्टि से चुनौती केवल यह तय करना नहीं है कि किसी बच्चे के साथ कौन-सी प्रक्रिया अपनाई जाए। यह भी सुनिश्चित करना है कि पुलिस स्तर से लेकर अंतिम आदेश और पुनर्वास तक उसे उचित कानूनी सहायता मिले। प्रधान न्यायाधीश ने बच्चों के मामलों में लगातार सहायता उपलब्ध कराने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित बचाव वकीलों की व्यवस्था मजबूत करने पर भी जोर दिया।
जस्टिस नागरत्ना ने कानून के क्रियान्वयन में मौजूद खामियों की ओर भी ध्यान दिलाया। उनके विचार में, बच्चों को लेकर कानून का ढांचा मौजूद होना पर्याप्त नहीं है; असली परीक्षा यह है कि संस्थाएं उसे व्यवहार में कितनी प्रभावी ढंग से लागू करती हैं। इसका सीधा अर्थ है कि यदि बाल कल्याण समितियों, किशोर न्याय बोर्डों, कानूनी सहायता सेवाओं और पुनर्वास तंत्र में जरूरी संसाधन या प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं हैं, तो कानून की संवेदनशील भावना कागजों तक सीमित रह सकती है।
केंद्र सरकार और विपक्ष की प्रतिक्रिया पर क्या है स्थिति?
इस कार्यक्रम में केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों की भागीदारी का उल्लेख सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक घोषणा में है, लेकिन प्रधान न्यायाधीश की इन विशिष्ट टिप्पणियों पर केंद्र सरकार या प्रमुख विपक्षी दलों की कोई स्पष्ट, सत्यापित राजनीतिक प्रतिक्रिया उपलब्ध सामग्री में सामने नहीं आती। इसलिए किसी दल के नाम से समर्थन, विरोध या नाराजगी का बयान जोड़ना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
इस मुद्दे पर सार्वजनिक बहस के दो वैध पक्ष हैं। एक पक्ष का तर्क है कि बच्चों के पुनर्वास और दूसरे अवसर की व्यवस्था के बिना कठोर दंड सामाजिक समस्या का स्थायी समाधान नहीं बन सकता।
दूसरा पक्ष यह सवाल उठा सकता है कि गंभीर अपराधों में पीड़ित और उनके परिवारों के न्याय, सुरक्षा और संतोष को किस तरह सुनिश्चित किया जाए। इन दोनों चिंताओं के बीच संतुलन बनाना ही कानून, न्यायपालिका और प्रशासन की जिम्मेदारी है।
निष्कर्ष:
बच्चे का भविष्य बचाना भी न्याय का हिस्साप्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की टिप्पणियां किशोर न्याय व्यवस्था की बुनियादी जिम्मेदारी की याद दिलाती हैं। कानून का उद्देश्य केवल अपराध के बाद प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों को समझना भी है जो किसी बच्चे को गलत रास्ते की ओर ले जा सकती हैं।
लेकिन संवेदनशीलता का अर्थ जवाबदेही से समझौता करना नहीं है। पीड़ित के अधिकार, अपराध की गंभीरता, निष्पक्ष सुनवाई और बच्चे के पुनर्वास—इन सभी को साथ लेकर चलना होगा। इसके लिए प्रशिक्षित कानूनी सहायता, प्रभावी बाल संरक्षण व्यवस्था और समय पर हस्तक्षेप अनिवार्य हैं।
CJP विवाद के बीच इस संदेश की व्यापक प्रासंगिकता यही है कि युवाओं को केवल नाराजगी, असहमति या गलती के चश्मे से नहीं देखा जा सकता।
लोकतांत्रिक समाज की मजबूती इस बात से भी तय होती है कि उसकी संस्थाएं युवाओं की आवाज कितनी गंभीरता से सुनती हैं और उनकी समस्याओं का समाधान कितनी निष्पक्षता से करती हैं।
न्याय की असली सफलता केवल दोष तय करने में नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने में भी है कि किसी बच्चे की एक गलती उसके पूरे भविष्य का फैसला न बन जाए।
बी. के. झा, एन एस के
