मराठी विवाद पर महाराष्ट्र में सियासी बारूद: प्रताप सरनाईक के ‘यूपी-बिहार’ बयान से भड़का सवाल—भाषा की परीक्षा चालकों की या राजनीति की?

बी के झा

NSK news Ind

मुंबई/पटना, 26 अगस्त

महाराष्ट्र में मराठी भाषा के ‘कार्यसाधक ज्ञान’ को लेकर शुरू हुआ विवाद अब भाषा से निकलकर सीधे राजनीति के अखाड़े में पहुंच गया है। महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने आरोप लगाया है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में होने वाले चुनावों को देखते हुए कुछ नेता मुंबई और ठाणे का माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। मंत्री के इस बयान ने एक पुराने और बेहद संवेदनशील सवाल को फिर सामने ला दिया है—

मुंबई किसकी है और मुंबई में रहने का अधिकार तय करने वाली कसौटी भाषा होगी, जन्मस्थान होगा या भारतीय संविधान?

सरनाईक का कहना है कि किसी भी टैक्सी या ऑटो चालक पर अब तक 500 रुपये का भी जुर्माना नहीं लगाया गया है, जबकि 20-25 हजार रुपये के जुर्माने की अफवाहें फैलाकर चालकों को भड़काया जा रहा है। उनका आरोप है कि उत्तर भारत के कुछ नेता सोशल मीडिया वीडियो के माध्यम से मराठी बनाम हिंदी का विवाद पैदा कर रहे हैं।लेकिन इस पूरे विवाद का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि सरकार का उद्देश्य केवल यात्रियों और चालकों के बीच संवाद स्थापित करना है, तो फिर इस अभियान को लेकर इतनी बेचैनी क्यों है?

और यदि भाषा केवल संवाद का माध्यम है, तो राजनीतिक बयानबाजी में यूपी-बिहार का प्रवेश क्यों हो गया?

भाषा सीखने का सवाल या पहचान की राजनीति?

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि सरकार चालकों को मराठी का विशेषज्ञ बनाने नहीं जा रही। उद्देश्य केवल इतना है कि वे यात्रियों से स्थानीय भाषा में संवाद कर सकें। सरकार का यह तर्क प्रशासनिक दृष्टि से व्यावहारिक दिखाई देता है।लेकिन समस्या नियम से ज्यादा उसके संदेश और राजनीतिक प्रस्तुति को लेकर पैदा हुई है।मुंबई देश का ऐसा महानगर है, जिसकी अर्थव्यवस्था लाखों प्रवासी श्रमिकों, कर्मचारियों, व्यापारियों और छोटे उद्यमियों के योगदान से चलती है।

उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, राजस्थान, दक्षिण भारत और देश के अन्य हिस्सों से आए लोगों ने दशकों में इस शहर को अपना घर बनाया है।ऐसे में जब किसी मंत्री के बयान में सीधे ‘यूपी-बिहार चुनाव’ और ‘मुंबई-ठाणे का माहौल खराब करने’ की बात आती है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भाषा विवाद अब क्षेत्रीय राजनीतिक ध्रुवीकरण का नया औजार बन रहा है?

पटना के शिक्षाविद का पलटवार—पहले अपने गिरेबान में झांकें

पटना के एक वरिष्ठ शिक्षाविद ने महाराष्ट्र सरकार और परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि मंत्री को पहले अपने राजनीतिक बयान की भाषा और उसके प्रभाव पर विचार करना चाहिए।शिक्षाविद के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति महाराष्ट्र में रहकर मराठी सीखता है तो यह अच्छी बात है। स्थानीय भाषा का सम्मान भी होना चाहिए। लेकिन भाषा का सम्मान और भाषा के नाम पर नागरिकों के बीच ऊंच-नीच या क्षेत्रीय विभाजन—दो अलग बातें हैं।

उनका सवाल बेहद सीधा है—“क्या महाराष्ट्र भारत से अलग कोई देश है, जहां दूसरे राज्यों के लोगों को मराठी भाषा और महाराष्ट्र की वेशभूषा अपनाने के बाद ही रहने की अनुमति मिलेगी?

”उन्होंने कहा कि मुंबई का निर्माण केवल महाराष्ट्र के लोगों ने नहीं किया है। उत्तर भारतीय मजदूर से लेकर उद्योगपति, टैक्सी चालक, दुकानदार, फिल्म उद्योग के कर्मचारी और लाखों नौकरीपेशा लोग मुंबई की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं।

उनके अनुसार असली राजनीति यह है कि यूपी-बिहार के लोगों को कौन मुद्दा बना रहा है—मुंबई में रहने वाले प्रवासी या वे राजनीतिक दल, जो अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए प्रवासियों को मुद्दा बना रहे हैं?

राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में ‘यूपी-बिहार’ का जिक्र सबसे बड़ा संकेत

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, भाषा विवाद को यदि केवल प्रशासनिक नियम माना जाए तो मामला काफी सीमित है। लेकिन जैसे ही इसमें उत्तर प्रदेश और बिहार के चुनावों को जोड़ दिया जाता है, मामला राष्ट्रीय स्तर की क्षेत्रीय राजनीति में बदल जाता है।विश्लेषकों का मानना है कि महाराष्ट्र की राजनीति में ‘मराठी अस्मिता’ कोई नया मुद्दा नहीं है। वर्षों से विभिन्न राजनीतिक दलों ने इसे अपने-अपने तरीके से इस्तेमाल किया है। लेकिन मुंबई की अर्थव्यवस्था जितनी राष्ट्रीय और वैश्विक होती गई, क्षेत्रीय पहचान की राजनीति के सामने भी उतनी ही बड़ी चुनौती खड़ी होती गई।

अब सवाल यह है कि क्या मराठी अस्मिता की रक्षा का अर्थ दूसरे राज्यों से आए भारतीयों को असहज करना है?

यदि जवाब ‘नहीं’ है, तो सरकार और राजनीतिक दलों को अपने शब्दों का चयन भी उसी अनुपात में करना होगा।

कानूनविद बोले—संविधान में नागरिक पहले, क्षेत्र बाद में

कानूनविदों की नजर में इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू संवैधानिक अधिकार हैं।भारत का संविधान नागरिकों को देश के किसी भी हिस्से में आने-जाने, रहने और काम करने की स्वतंत्रता देता है, हालांकि सार्वजनिक व्यवस्था और कानून के अधीन उचित प्रतिबंध संभव हैं।इसलिए किसी राज्य की स्थानीय भाषा सीखने को प्रोत्साहित करना एक बात है और किसी नागरिक के लिए दूसरे राज्य में रहने या रोजगार पाने को उसकी क्षेत्रीय पहचान से जोड़ देना दूसरी बात।कानून के जानकारों के अनुसार यदि सरकार किसी पेशे के लिए भाषा का कार्यसाधक ज्ञान आवश्यक मानती है तो उसके पीछे स्पष्ट प्रशासनिक उद्देश्य, पारदर्शी नियम और सभी पर समान रूप से लागू होने वाली प्रक्रिया होनी चाहिए।

किसी चालक को केवल इसलिए निशाना नहीं बनाया जा सकता कि वह उत्तर प्रदेश या बिहार से आया है।इसी तरह किसी स्थानीय भाषा को सीखने की सरकारी नीति का विरोध भी केवल क्षेत्रीय पहचान के नाम पर करना उचित नहीं होगा।

संजय निरूपम और अबू आजमी की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?

इस विवाद में संजय निरूपम, अबू आजमी और ऑटो-टैक्सी यूनियन नेता शशांक राव के नाम भी सामने आए हैं। स्वयं मंत्री ने बताया कि इन लोगों ने उनसे संपर्क किया था।यह तथ्य अपने आप में बताता है कि विवाद का असर केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है। सड़क पर ऑटो और टैक्सी चलाने वाला वह वर्ग, जो प्रतिदिन मुंबई की आम जनता से सीधे संपर्क में रहता है, इस मुद्दे को लेकर आशंकित है।सरकार के लिए इसलिए जरूरी है कि वह केवल ‘अफवाह’ कहकर मामले को खत्म न करे, बल्कि लिखित रूप में स्पष्ट करे—

भाषा ज्ञान का स्तर क्या होगा?

परीक्षा कौन लेगा?

किसे कितने समय की छूट मिलेगी?

असफल होने पर क्या कार्रवाई होगी?

क्या जुर्माना लगेगा?

लाइसेंस पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?

क्या मराठी सीखने के लिए सरकार निःशुल्क प्रशिक्षण देगी?

इन सवालों का स्पष्ट उत्तर जितनी जल्दी आएगा, उतनी जल्दी विवाद ठंडा होगा।

विपक्ष के लिए भी अग्निपरीक्षा

विपक्षी दलों के सामने भी इस मुद्दे पर सावधानी बरतने की चुनौती है।यदि विपक्ष हर भाषा संबंधी नीति को ‘हिंदी बनाम मराठी’ या ‘उत्तर भारतीय बनाम मराठी’ बना देता है तो इससे वही क्षेत्रीय राजनीति मजबूत होगी, जिसकी आलोचना वह कर रहा है।विपक्ष को सवाल उठाना चाहिए कि सरकार का नियम संविधानसम्मत, पारदर्शी और समान है या नहीं। उसे यह भी पूछना चाहिए कि टैक्सी-ऑटो चालकों को भाषा सीखने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण और समय दिया जा रहा है या नहीं।लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों की सामूहिक छवि को राजनीतिक हथियार बनाना किसी भी पक्ष के लिए उचित नहीं होगा।

समाजसेवी संस्थाओं का सवाल—मुंबई केवल मराठी या केवल प्रवासियों की नहींमुंबई में काम करने वाली सामाजिक संस्थाओं और नागरिक समूहों की नजर में यह विवाद शहर के सामाजिक ताने-बाने से जुड़ा है।

मुंबई की ताकत उसकी विविधता रही है।

यहां मराठी परिवार भी हैं,

उत्तर भारतीय परिवार भी,

गुजराती,

दक्षिण भारतीय,

बंगाली,

पंजाबी और देश के लगभग हर हिस्से से आए लोग भी।स्थानीय भाषा का सम्मान होना चाहिए, लेकिन प्रवासियों की गरिमा भी सुरक्षित रहनी चाहिए।

सामाजिक संगठनों का एक तर्क यह भी है कि सरकार यदि वास्तव में मराठी को बढ़ावा देना चाहती है तो भाषा सीखने को अवसर बनाए, भय नहीं।यानी—मराठी सीखिए क्योंकि यह महाराष्ट्र की भाषा है, न कि इसलिए कि मराठी नहीं जानने पर आपको मुंबई में अपमानित होना पड़ेगा।यही फर्क किसी भाषा अभियान को सांस्कृतिक अभियान बनाता है और राजनीतिक विवाद को सामाजिक तनाव में बदलने से रोकता है।’

हम तो चले परदेस’ वाले वीडियो पर भी सवाल

मंत्री सरनाईक ने सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो प्रसारित किए जाने का आरोप लगाया, जिनमें ऑटो-रिक्शा को ट्रेनों से उत्तर भारत ले जाते हुए दिखाया गया और ‘हम तो चले परदेस’ जैसे गाने लगाए गए।यदि ये वीडियो भ्रामक हैं तो सरकार को सोशल मीडिया पर तथ्यात्मक स्पष्टीकरण देना चाहिए। जरूरत पड़े तो संबंधित फर्जी वीडियो की उत्पत्ति और प्रसार की जांच भी होनी चाहिए।

लेकिन यहां भी सरकार को सावधानी बरतनी होगी।हर आलोचनात्मक वीडियो को उत्तर भारतीय नेताओं की साजिश बताना उतना ही खतरनाक हो सकता है, जितना किसी सरकारी आदेश को बिना पढ़े ‘मराठी तानाशाही’ कहना।दोनों ही स्थितियों में तथ्य पीछे और राजनीतिक शोर आगे चला जाता है।

मुंबई के ऑटो चालक को चुनावी राजनीति का ईंधन क्यों बनाया जाए?

इस विवाद का सबसे मार्मिक पक्ष वह ऑटो चालक है, जो सुबह से रात तक सड़क पर मेहनत करता है।उसके लिए भाषा से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि—सवारी मिले,कमाई हो,परिवार चले,पुलिस और प्रशासन से परेशानी न होऔर लाइसेंस सुरक्षित रहे।उसे उत्तर प्रदेश-बिहार की चुनावी राजनीति से कोई लेना-देना नहीं हो सकता।लेकिन राजनीतिक बयानबाजी में वही चालक अचानक ‘मराठी बनाम उत्तर भारतीय’ की बहस का चेहरा बन जाता है।

यहीं से सवाल उठता है—क्या मुंबई के मेहनतकश नागरिक को राजनीतिक दलों की चुनावी पटकथा का किरदार बना देना उचित है?

राजनीति का आईना: यूपी-बिहार के कंधे पर महाराष्ट्र की राजनीति?

इस विवाद में सबसे बड़ा राजनीतिक व्यंग्य यही है कि एक तरफ मंत्री आरोप लगा रहे हैं कि यूपी-बिहार के नेता मुंबई का माहौल खराब करना चाहते हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष और प्रवासी संगठनों का सवाल है कि यदि मुंबई में यूपी-बिहार के लोग इतने अप्रासंगिक हैं तो हर चुनाव के आसपास उन्हें राजनीतिक मुद्दा क्यों बनाया जाता है?

यूपी और बिहार के लोगों की संख्या, उनकी आर्थिक भूमिका और उनकी चुनावी उपयोगिता—तीनों ने उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति में एक महत्वपूर्ण सामाजिक समूह बना दिया है।इसलिए राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार असली लड़ाई शायद भाषा की कम और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की ज्यादा है।

निष्कर्ष:

मराठी का सम्मान हो, मुंबई का चरित्र भी बचे महाराष्ट्र को अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करने का पूरा अधिकार है। मराठी सीखना और मराठी बोलने वालों का सम्मान करना भी मुंबई में रहने वाले हर व्यक्ति के लिए सकारात्मक बात है।लेकिन इसी के साथ यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि मुंबई भारत के संविधान के तहत भारत का हिस्सा है। यहां उत्तर प्रदेश, बिहार या किसी अन्य राज्य से आया व्यक्ति कोई बाहरी नागरिक नहीं, बल्कि भारत का नागरिक है।

सरकार को भाषा सिखानी है तो सिखाए।

चालकों को प्रशिक्षित करना है तो प्रशिक्षित करे।

फर्जी वीडियो फैलाने वालों पर कार्रवाई करनी है तो करे।

संदिग्ध नियमों पर सवाल उठाने वालों को जवाब देना है तो दे।

लेकिन भाषा को सम्मान की भाषा बनाया जाए, बहिष्कार की भाषा नहीं।

क्योंकि मुंबई की असली पहचान शायद यही है—यह शहर मराठी माणूस की मिट्टी से बना है, लेकिन इसकी धड़कन पूरे भारत से आए मेहनतकश लोगों की सांसों से चलती है।

और अगर राजनीतिक दल इस धड़कन को ‘मराठी बनाम यूपी-बिहार’ में बांटने लगें, तो सवाल केवल भाषा का नहीं रहेगा—

सवाल होगा कि सियासत के लिए मुंबई को कितनी बार बांटा जाएगा?

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