कांगो में आग का तांडव: दो स्कूलों में जिंदा जलते रहे बच्चे, 26 की मौत; संकरी राह ने बढ़ाई त्रासदी; खिड़कियों से कूदे बच्चे, भगदड़ में भी कुचले गए

बी के झा

NSK news Ind

बकावु, 11 सितंबर

अफ्रीकी देश कांगो के पूर्वी हिस्से में गुरुवार को आग ने ऐसा कहर बरपाया कि देखते ही देखते दो स्कूल मौत के मैदान में बदल गए। दक्षिण किवु प्रांत के बकावु शहर में लगी भीषण आग में कम से कम 26 छात्रों की मौत हो गई, जबकि दर्जनों लोग घायल बताए जा रहे हैं।

मृतकों में 19 लड़कियां और 7 लड़के शामिल हैं। प्रशासन ने आशंका जताई है कि राहत और बचाव अभियान आगे बढ़ने के साथ मृतकों की संख्या और बढ़ सकती है।यह हादसा उस समय हुआ, जब आग पहले एक घर से उठी और घनी आबादी वाले इलाके में देखते ही देखते आसपास की इमारतों को अपनी चपेट में लेने लगी।

लपटें पास के फुराहा सेकेंडरी स्कूल और उजामा प्राइमरी स्कूल तक पहुंच गईं। देखते ही देखते स्कूल परिसर में अफरातफरी मच गई और बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालना मुश्किल हो गया।

संकरा रास्ता बना मौत का फंदा

स्थानीय इलाके के प्रशासक मोइसे लुबाला के मुताबिक, फुराहा सेकेंडरी स्कूल के भीतर कई छात्र आग और धुएं के बीच फंस गए। कुछ बच्चों की मौत दम घुटने से हुई। आग से बचने के लिए छात्रों ने बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन स्कूल से बाहर जाने का रास्ता बेहद संकरा था।लुबाला के अनुसार, स्थिति इतनी भयावह हो गई कि कुछ छात्र जान बचाने के लिए खिड़कियों से कूदने लगे, जबकि बड़ी संख्या में बच्चे दरवाजे की ओर भागे। एक साथ बाहर निकलने की कोशिश में कई छात्र गिर पड़े और भगदड़ जैसी स्थिति में कुछ बच्चे भीड़ के पैरों तले कुचल गए।

यानी हादसा सिर्फ आग का नहीं था—धुआं, संकरा निकास और अचानक मची भगदड़ ने मौत का दायरा और बढ़ा दिया।

अस्पताल में यूनिफॉर्म पहने पहुंचते रहे घायल बच्चे

फुराहा और उजामा स्कूल के अलग-अलग उम्र के घायल छात्र-छात्राओं को उनकी स्कूल यूनिफॉर्म में न्यामुलागिरा BDOM हेल्थ सेंटर ले जाया गया। अस्पताल में अचानक घायलों की संख्या बढ़ने से चिकित्सा व्यवस्था पर भी भारी दबाव पड़ा।वहां मौजूद नर्स सिजा जीन-बैप्टिस्ट hu ने बताया कि घायलों की संख्या इतनी अधिक थी कि मेडिकल स्टाफ के लिए सही आंकड़ा दर्ज करना तक मुश्किल हो रहा था।इससे हादसे की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है कि अस्पताल में घायल बच्चों की पहचान और उपचार के बीच स्वास्थ्यकर्मी लगातार जूझते रहे।

पहले 24 मौतों की खबर, बाद में आंकड़ा 26 पहुंचा

बकावु शहर पर नियंत्रण रखने वाले विद्रोही संगठन M23 के प्रवक्ता लॉरेंस कन्युका ने शुरुआती तौर पर 24 छात्रों की मौत की जानकारी दी थी। उनके मुताबिक, 29 लोगों का स्थानीय अस्पतालों में इलाज चल रहा था। इसके बाद दक्षिण किवु प्रांतीय सरकार ने मृतकों की संख्या बढ़ाकर 26 बताई।प्रशासन का कहना है कि बचाव और जांच अभियान पूरा होने के बाद ही हादसे में हुई कुल मौतों की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकेगी।

आखिर इतनी तेजी से क्यों फैली आग?

फिलहाल आग लगने की वास्तविक वजह सामने नहीं आई है। स्थानीय प्रशासक के मुताबिक, जिस इलाके में आग शुरू हुई, वहां आबादी बेहद घनी है और बड़ी संख्या में मकान लकड़ी से बने हुए हैं। यही वजह रही कि आग ने बेहद कम समय में अपना दायरा बढ़ा लिया।अब जांच का बड़ा सवाल यही है कि आग की शुरुआत कैसे हुई और स्कूलों में मौजूद बच्चों को समय रहते सुरक्षित बाहर क्यों नहीं निकाला जा सका। साथ ही, स्कूलों के निकासी मार्ग और अग्निसुरक्षा इंतजामों की स्थिति भी जांच के दायरे में आ सकती है।

संघर्ष और संकट के बीच एक और त्रासदी

कांगो का पूर्वी हिस्सा लंबे समय से हिंसा, विद्रोह और मानवीय संकट से जूझ रहा है। रवांडा के समर्थन वाले M23 विद्रोहियों ने फरवरी 2025 में बकावु पर कब्जा कर लिया था। क्षेत्र में 100 से अधिक हथियारबंद समूह सक्रिय बताए जाते हैं। इन समूहों के बीच संघर्ष का एक बड़ा कारण इलाके के विशाल खनिज संसाधनों पर नियंत्रण भी है।इन खनिजों का इस्तेमाल वैश्विक तकनीकी उद्योग के अनेक उत्पादों में होता है। लेकिन जिन संसाधनों को दुनिया विकास और तकनीक की रीढ़ मानती है, उन्हीं संसाधनों की धरती पर रहने वाले लोगों के लिए जिंदगी आज भी असुरक्षा और संकट से घिरी हुई है।

पूर्वी कांगो की स्वास्थ्य व्यवस्था भी गंभीर दबाव में है। ऐसे माहौल में दो स्कूलों में हुआ यह अग्निकांड केवल एक स्थानीय हादसा नहीं, बल्कि उस क्षेत्र की जटिल मानवीय परिस्थितियों की एक और भयावह तस्वीर सामने लाता है।

NSK विश्लेषण:

बकावु के स्कूलों में लगी आग ने एक कड़वा सवाल छोड़ दिया है—जब किसी स्कूल में सैकड़ों बच्चे मौजूद हों तो आपात स्थिति में सुरक्षित निकासी की व्यवस्था कितनी मजबूत है?

आग की वजह की जांच जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है यह पता लगाना कि क्या इन मौतों को बेहतर सुरक्षा व्यवस्था से रोका जा सकता था।

26 बच्चों की मौत केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उन परिवारों की जिंदगी में आया ऐसा शून्य है जिसे कोई राहत या मुआवजा भर नहीं सकता।

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