BRICS के बहाने मोदी-पुतिन की महामुलाकात, रक्षा से रुपये-रूबल तक बन सकती है बड़ी तस्वीर; सुखोई-57 और S-400 पर दुनिया की नजर

बी के झा

नई दिल्ली, 11 सितंबर

BRICS शिखर सम्मेलन से पहले राजधानी दिल्ली में कूटनीति का पारा चढ़ गया है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शुक्रवार तड़के करीब तीन बजे पालम एयरफोर्स स्टेशन पहुंचे। भारत की धरती पर पुतिन के कदम रखते ही सबसे ज्यादा नजर जिस मुलाकात पर टिक गई है, वह है—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की आमने-सामने बातचीत।

यह मुलाकात महज दो राष्ट्राध्यक्षों की औपचारिक बैठक नहीं मानी जा रही। रक्षा, ऊर्जा, भुगतान व्यवस्था और वैश्विक रणनीति के बदलते समीकरणों के बीच मोदी-पुतिन वार्ता भारत-रूस संबंधों के अगले अध्याय की दिशा तय कर सकती है।

तीन मोर्चों पर सबसे ज्यादा नजर

1. रक्षा: सुखोई-57 से S-400 तकमोदी-पुतिन वार्ता में रक्षा सहयोग सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल हो सकता है।

भारत और रूस के बीच लंबे समय से रक्षा साझेदारी रही है और अब बातचीत का एक संभावित केंद्र सुखोई-57 फाइटर जेट हो सकता है।

फिफ्थ जेनरेशन के लड़ाकू विमानों से जुड़े प्रस्तावों के अलावा S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की डिलीवरी और दोनों देशों के व्यापक रक्षा सहयोग की समीक्षा भी चर्चा का हिस्सा बन सकती है।

न्यूक्लियर सबमरीन से जुड़े सहयोग पर भी बातचीत की संभावना जताई जा रही है। अगर इन क्षेत्रों में कोई बड़ी सहमति बनती है तो इसका असर सिर्फ भारत-रूस रक्षा संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि एशिया के रणनीतिक शक्ति-संतुलन पर भी इसकी नजरें टिकेंगी।

2. क्रूड ऑयल: ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा सवालमोदी-पुतिन वार्ता का दूसरा बड़ा मुद्दा क्रूड ऑयल और ऊर्जा सुरक्षा हो सकता है।

वैश्विक ऊर्जा बाजार और पश्चिम एशिया की अस्थिर परिस्थितियों के बीच भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल अपनी ऊर्जा जरूरतों की निरंतर और सुरक्षित आपूर्ति बनाए रखना है।

भारत पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हित के आधार पर तेल खरीद के फैसले करता है। ऐसे में रूस के साथ दीर्घकालिक ऊर्जा सहयोग या आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत करने पर बातचीत भारत के लिए रणनीतिक महत्व रख सकती है। यानी मामला सिर्फ सस्ते तेल का नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा की दीर्घकालिक रणनीति का है।

3. रुपया-रूबल: डॉलर के दबदबे को चुनौती?

तीसरा महत्वपूर्ण मुद्दा है—लोकल करेंसी में कारोबार।

रूस लंबे समय से डॉलर पर निर्भरता कम करने और राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की वकालत करता रहा है। ऐसे में भारत और रूस के बीच रुपये और रूबल में भुगतान व्यवस्था को और मजबूत करने पर चर्चा संभव है।यदि दोनों देश सीमा-पार भुगतान और स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को व्यापक रूप देते हैं, तो यह सिर्फ द्विपक्षीय व्यापार का मामला नहीं रहेगा। यह वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की भूमिका और वैकल्पिक भुगतान तंत्र को लेकर चल रही बड़ी बहस का भी हिस्सा बन सकता है।

हालांकि इसके सामने व्यावहारिक चुनौतियां भी कम नहीं हैं—खासकर व्यापार संतुलन, भुगतान तंत्र और दोनों मुद्राओं की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता से जुड़े सवाल।

आतंकवाद से स्पेस तक, एजेंडा लंबा

मोदी और पुतिन के बीच बातचीत सिर्फ रक्षा और तेल तक सीमित रहने की उम्मीद नहीं है।

आतंकवाद के खिलाफ सहयोग,

ड्रग तस्करी पर रोक,

अंतरिक्ष सहयोग और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर जैसे मुद्दे भी वार्ता में जगह पा सकते हैं।

भारत के लिए यह कॉरिडोर यूरोप और मध्य एशिया तक वैकल्पिक कनेक्टिविटी मजबूत करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। वहीं रूस के लिए भारत एशिया में एक महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक साझेदार बना हुआ है।

दिल्ली पहुंचते ही पुतिन को अभेद्य सुरक्षा

पुतिन की यात्रा को देखते हुए दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी की गई है। चाणक्यपुरी स्थित उनके संभावित ठहराव वाले होटल के आसपास कई स्तरों की सुरक्षा व्यवस्था की गई है। दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी भी सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी में तैनात हैं।

राजधानी में BRICS सम्मेलन के कारण पहले ही सुरक्षा का व्यापक घेरा तैयार किया जा चुका है।

भारत ने किया गर्मजोशी से स्वागत

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि विदेश राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने दिल्ली एयरपोर्ट पर रूसी राष्ट्रपति का स्वागत किया।उन्होंने भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे बहुआयामी संबंधों और “विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी” को रेखांकित किया।

पुतिन का आज का कार्यक्रम भी खास

क्रेमलिन के अनुसार पुतिन 11 सितंबर को BRICS बिजनेस फोरम के पूर्ण सत्र को संबोधित करेंगे। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक होगी।दोनों नेता रूस और भारत के उद्योग एवं व्यापार मंत्रालयों द्वारा आयोजित INNOPROM प्रदर्शनी का दौरा भी करेंगे।यानी पुतिन की भारत यात्रा में कूटनीति के साथ-साथ कारोबार और उद्योग को भी खास महत्व दिया जा रहा है।

मोदी-पुतिन की केमिस्ट्री के साथ दिल्ली में जिनपिंग भी

इस पूरे घटनाक्रम को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि BRICS सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी शामिल होंगे।एक ही मंच पर मोदी, पुतिन और जिनपिंग की मौजूदगी वैश्विक शक्ति-संतुलन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होगी।

भारत जहां रूस के साथ अपने पारंपरिक रणनीतिक रिश्तों को आगे बढ़ाना चाहता है, वहीं चीन के साथ संवाद और प्रतिस्पर्धा दोनों जारी हैं।ऐसे में दिल्ली में होने वाला BRICS सम्मेलन केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं होगा।

यहां रक्षा,

ऊर्जा,

व्यापार,

भुगतान व्यवस्था और वैश्विक शासन की बदलती तस्वीर पर दुनिया की नजर होगी।

असली परीक्षा समझौतों से ज्यादा संतुलन की

मोदी-पुतिन की मुलाकात में यदि सुखोई-57, ऊर्जा और रुपये-रूबल भुगतान व्यवस्था जैसे मुद्दों पर ठोस प्रगति होती है, तो इसे भारत-रूस साझेदारी के नए चरण के संकेत के रूप में देखा जाएगा। लेकिन भारत की असली कूटनीतिक परीक्षा इससे भी बड़ी है—रूस के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत रखते हुए चीन के साथ संवाद, पश्चिम एशिया में अपने हितों की रक्षा और वैश्विक दक्षिण की आवाज को एक साथ साधना।

दिल्ली में BRICS का मंच तैयार है।

पुतिन पहुंच चुके हैं,

जिनपिंग के आने का इंतजार है

और दुनिया की निगाहें प्रधानमंत्री मोदी की उस कूटनीतिक चाल पर टिकी हैं, जो आने वाले समय में भारत की रणनीतिक दिशा की एक नई तस्वीर पेश कर सकती है।

NSK Delhi की नजर अब इस बात पर रहेगी कि मोदी-पुतिन की बंद कमरे की बातचीत से बाहर निकलकर कौन-से फैसले सार्वजनिक होते हैं और BRICS की दिल्ली बैठक वैश्विक शक्ति-समीकरण को कितना प्रभावित करती है।

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