केजरीवाल-सिसोदिया हाजिर हों…” दिल्ली हाईकोर्ट का आखिरी मौका; आबकारी नीति केस में 5–6 अक्टूबर को निर्णायक बहस

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 18 अगस्त

दिल्ली की चर्चित आबकारी नीति भ्रष्टाचार मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की कानूनी लड़ाई एक बार फिर अहम मोड़ पर पहुंच गई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने सीबीआई की पुनरीक्षण याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए सभी आरोपियों को चार सप्ताह का अंतिम अवसर देते हुए स्पष्ट कर दिया कि इसके बाद कोई अतिरिक्त समय नहीं मिलेगा।जस्टिस मनोज जैन की पीठ ने कहा कि अब सुनवाई को अनावश्यक रूप से लंबा नहीं खींचा जाएगा और 5–6 अक्टूबर को सीबीआई की मुख्य दलीलें सुनी जाएंगी।

103 पन्नों के जवाब पर बढ़ी बहस

सुनवाई के दौरान केजरीवाल और सिसोदिया की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने अदालत को बताया कि सीबीआई ने हाल ही में 103 पन्नों का अतिरिक्त लिखित जवाब दाखिल किया है, जिसमें कथित तौर पर नए आधार और तर्क शामिल हैं।इस पर अदालत ने पूछा, “क्या आप वास्तव में जवाब दाखिल करना चाहते हैं?” बचाव पक्ष ने जवाब दिया—”बिल्कुल।” इसके बाद हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को अंतिम अवसर प्रदान कर दिया।### जज का स्पष्ट संदेश: अब और मोहलत नहींअदालत ने साफ शब्दों में कहा कि:

सभी पक्ष चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करें।

इसके बाद किसी प्रकार की अतिरिक्त मोहलत नहीं दी जाएगी।

पहले सीबीआई अपनी दलीलें रखेगी, फिर बचाव पक्ष को पूरा अवसर मिलेगा।कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले की सुनवाई अलग-अलग हिस्सों में नहीं होगी।

सीबीआई बनाम बचाव पक्ष: कानूनी टकराव तेज

सीबीआई की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि लिखित जवाब में कोई नया आधार नहीं जोड़ा गया है, बल्कि निचली अदालत के फैसले की कानूनी खामियों को विस्तार से रखा गया है।दूसरी ओर बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि निचली अदालत के फैसले के महज़ चार घंटे के भीतर पुनरीक्षण याचिका दाखिल करना जल्दबाज़ी दर्शाता है और इसकी वैधता पर भी प्रश्न उठते हैं।

पूरा मामला क्या है?

27 फरवरी को निचली अदालत ने आबकारी नीति मामले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, के. कविता सहित सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया था। अदालत ने अपने फैसले में सीबीआई की जांच प्रक्रिया पर भी गंभीर टिप्पणियां की थीं। इसी आदेश को चुनौती देते हुए सीबीआई दिल्ली हाईकोर्ट पहुंची है।

राजनीतिक विश्लेषण: कानूनी लड़ाई या राजनीतिक नैरेटिव?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुकदमा केवल न्यायालय का मामला नहीं, बल्कि दिल्ली की राजनीति का सबसे बड़ा नैरेटिव भी बन चुका है। उनके अनुसार हाईकोर्ट का अंतिम फैसला आने तक सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों इसे अपने-अपने राजनीतिक दृष्टिकोण से जनता के सामने रखेंगे।

कानूनविदों की राय

संवैधानिक कानून विशेषज्ञों का कहना है कि पुनरीक्षण याचिका में हाईकोर्ट यह नहीं देखता कि कौन लोकप्रिय है, बल्कि यह देखता है कि निचली अदालत ने कानून और साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया या नहीं। इसलिए अक्टूबर की सुनवाई इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण चरण मानी जा रही है।

शिक्षाविदों और समाजसेवी संस्थाओं की टिप्पणी

लोक प्रशासन के अध्येताओं का कहना है कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों का शीघ्र और निष्पक्ष निपटारा लोकतंत्र में जनता के विश्वास को मजबूत करता है। वहीं पारदर्शिता पर काम करने वाली सामाजिक संस्थाओं ने अदालत से तथ्य और साक्ष्य के आधार पर त्वरित न्याय की अपेक्षा जताई है।

दिल्ली के आम नागरिक क्या कहते हैं?

दिल्ली के नागरिकों की राय दो हिस्सों में बंटी दिखाई देती है। एक वर्ग का मानना है कि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने तक किसी को दोषी नहीं माना जाना चाहिए, जबकि दूसरा वर्ग चाहता है कि इतने चर्चित मामले का अंतिम निर्णय जल्द आए ताकि वर्षों से चल रही राजनीतिक बहस समाप्त हो सके।

बीजेपी और विपक्ष की प्रतिक्रिया

दिल्ली भाजपा ने कहा कि सीबीआई को अदालत में अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए और भ्रष्टाचार के मामलों में जवाबदेही तय होना आवश्यक है।वहीं आम आदमी पार्टी का कहना है कि निचली अदालत पहले ही सभी आरोपियों को बरी कर चुकी है और वह हाईकोर्ट में भी तथ्यात्मक एवं कानूनी आधार पर अपना जवाब देगी। अन्य विपक्षी दलों ने निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा जताने की बात कही है।

आगे क्या?

अब सभी आरोपियों को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करना होगा। 5 और 6 अक्टूबर को दिल्ली हाईकोर्ट में सीबीआई की विस्तृत दलीलें शुरू होंगी।

इसके बाद अदालत तय करेगी कि निचली अदालत द्वारा 23 आरोपियों को बरी करने के फैसले में हस्तक्षेप की आवश्यकता है या नहीं।

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