धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लिया, अब ज्ञानेश कुमार के मामले में क्यों पड़ रहे हो?’ केंद्रीय मंत्री ने CJP से छात्रों के मुद्दों पर आंदोलन करने को कहा, मुख्य चुनाव आयुक्त का किया बचाव; राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर भी उठाए सवाल, विपक्ष पर लगाया अराजकता फैलाने का आरोप

बी. के. झा – एनएसके

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नई दिल्ली, 12 अक्टूबर

देश की राजनीति में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी घमासान के बीच केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को सीधी नसीहत दी है। उनका संदेश साफ है—जिस मुद्दे को लेकर पार्टी बनी थी, उस पर आंदोलन करो; ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की लड़ाई में कूदने की जरूरत क्या है?

आठवले ने नीट परीक्षा में कथित पेपर लीक के मुद्दे का हवाला देते हुए कहा कि CJP ने तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा था और उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस्तीफा ले लिया। ऐसे में अब पार्टी को छात्रों की शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए।केंद्रीय मंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष का विरोध तेज हो रहा है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट तक मार्च का ऐलान किया गया है, जबकि CJP भी दिल्ली में प्रदर्शन की तैयारी कर रही है। ऐसे में आठवले की टिप्पणी ने राजनीतिक बहस को और धार दे दी है। सवाल यह है कि क्या CJP अपने मूल मुद्दों तक सीमित रहेगी या चुनाव आयोग से जुड़े विवाद में भी अपनी राजनीतिक जमीन तलाशेगी?

‘धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लिया, अब ज्ञानेश कुमार के पीछे क्यों?

’रामदास आठवले ने रविवार को CJP को संबोधित करते हुए कहा कि पार्टी की स्थापना नीट परीक्षा में पेपर लीक के मुद्दे पर हुई थी। उनके मुताबिक, पार्टी ने तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा था और बाद में उनकी मांग पूरी हो गई।आठवले ने कहा, “कॉकरोच जनता पार्टी वालों को मेरा कहना है कि आपकी पार्टी स्थापित हुई थी नीट एग्जाम में जो पेपर लीक हुई थी, उसके लिए आपकी पार्टी स्थापित हुई थी। आपने धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा, मोदी जी इस्तीफा ले लिया और सारी मांगें आपकी पूरी कर दीं। अब ज्ञानेश कुमार के इस मामले में पड़ने की आपको क्या जरूरत है।

”केंद्रीय मंत्री की इस टिप्पणी का राजनीतिक संदेश स्पष्ट है। वह CJP को यह याद दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि उसकी पहचान छात्रों और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों के आधार पर बनी थी। उनके मुताबिक, पार्टी को उसी दिशा में अपना आंदोलन आगे बढ़ाना चाहिए, न कि मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर सियासी संघर्ष में उतरना चाहिए।हालांकि, आठवले की इस नसीहत से यह सवाल भी उठता है कि किसी राजनीतिक संगठन के आंदोलन का दायरा क्या केवल उसके शुरुआती मुद्दे तक सीमित रहना चाहिए?

लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दल और संगठन समय के साथ दूसरे सार्वजनिक मुद्दों पर भी अपना रुख तय करते हैं। ऐसे में CJP की आगे की रणनीति ही बताएगी कि वह इस सलाह को किस रूप में लेती है।

‘आंदोलन करो, लेकिन छात्रों के लिए’

आठवले ने CJP को सलाह दी कि वह शिक्षा नीति, परीक्षा प्रणाली और विद्यार्थियों की समस्याओं को लेकर आंदोलन करे। उन्होंने कहा कि छात्रों को कैसी शिक्षा मिलनी चाहिए और परीक्षाओं में किस तरह की व्यवस्था होनी चाहिए, इन सवालों पर आवाज उठाना अधिक जरूरी है।उनके मुताबिक, ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन करने की आवश्यकता नहीं है।इस बयान में केंद्र सरकार के सहयोगी मंत्री की राजनीतिक रणनीति भी दिखाई देती है। एक ओर वह CJP को उसके कथित मूल एजेंडे की याद दिला रहे हैं, तो दूसरी ओर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ चल रहे विरोध को अनावश्यक ठहराने की कोशिश कर रहे हैं।

लेकिन छात्रों के मुद्दे और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता—दोनों ही सार्वजनिक महत्व के विषय हैं। किसी एक मुद्दे पर आंदोलन करने से दूसरे मुद्दे पर सवाल उठाने का अधिकार अपने आप समाप्त नहीं हो जाता। असली बहस इस बात पर होनी चाहिए कि उठाए गए आरोपों के समर्थन में क्या तथ्य हैं और संबंधित संस्थाएं उनका जवाब किस तरह देती हैं।

ज्ञानेश कुमार के बचाव में आठवले ने क्या दलील दी?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का बचाव करते हुए आठवले ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के विवाद पर अपनी दलील रखी। उन्होंने दावा किया कि लगभग 13 करोड़ वोट हटाए जाने की चर्चा के संदर्भ में करीब छह करोड़ लोग स्थानांतरित हो चुके थे, एक करोड़ लोगों के नाम दो जगह दर्ज थे और करीब तीन करोड़ लोग लापता थे।आठवले के मुताबिक, मतदाता सूची में दोहरे नाम, स्थानांतरण और मतदाताओं का पता नहीं चलने जैसी वजहों से नाम हटाए गए।

हालांकि, ये आंकड़े केंद्रीय मंत्री के दावे के रूप में ही देखे जाने चाहिए। इनकी स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित आधिकारिक आंकड़ों का सत्यापन जरूरी है। मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया, हटाए गए नामों की वास्तविक संख्या और प्रत्येक श्रेणी का विवरण ही इस विवाद पर तथ्यपरक निष्कर्ष निकालने का आधार बन सकता है।यहां मूल सवाल केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि प्रक्रिया की पारदर्शिता का भी है। यदि नाम नियमानुसार हटाए गए हैं, तो संबंधित आंकड़ों और प्रक्रिया को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना विवाद को दूर करने में मदद कर सकता है।

वहीं, यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो उसके लिए प्रभावी शिकायत और सुधार की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।

राहुल गांधी पर पलटवार—‘क्या कांग्रेस के बढ़े सांसद वोट चोरी से जीते?

’रामदास आठवले ने राहुल गांधी के वोट चोरी संबंधी आरोपों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कांग्रेस की लोकसभा सीटों में हुई बढ़ोतरी का हवाला देते हुए पूछा कि यदि चुनाव परिणामों में गड़बड़ी का दावा किया जा रहा है, तो क्या कांग्रेस अपनी बढ़ी हुई सीटों को भी उसी नजर से देखेगी?

आठवले ने कहा कि राहुल गांधी जहां से चुनकर आए हैं, वहां भी क्या कांग्रेस यह आरोप लगाएगी कि उसके वोट चोरी हुए हैं। उन्होंने कांग्रेस के सांसदों की संख्या 42 से बढ़कर 99 होने का उल्लेख करते हुए विपक्ष के आरोपों पर सवाल खड़े किए।उन्होंने यह भी पूछा कि जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब क्या वह वोट चोरी करती थी।

केंद्रीय मंत्री ने आरोप लगाया कि चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग बेबुनियाद है और इसके जरिए जानबूझकर अराजकता को निमंत्रण दिया जा रहा है।हालांकि, किसी पार्टी की सीटें बढ़ने या घटने से अपने आप यह साबित नहीं होता कि चुनाव प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी हुई या नहीं हुई। चुनावी आरोपों की जांच के लिए निर्वाचन संबंधी रिकॉर्ड, शिकायतों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण जरूरी है। इसी तरह, विपक्ष के आरोप भी केवल राजनीतिक बयान के आधार पर प्रमाणित नहीं माने जा सकते। इसलिए इस विवाद का निर्णायक जवाब राजनीतिक तंज से नहीं, बल्कि तथ्यों, पारदर्शिता और उचित जांच से ही सामने आ सकता है।

CJP को पहले भी चेतावनी दे चुके हैं आठवले रामदास

आठवले इससे पहले 3 अक्टूबर को भी CJP प्रमुख अभिजीत दीपके को लेकर बयान दे चुके हैं। उस समय उन्होंने आरोप लगाया था कि दीपके ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के बारे में गलत बयान दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं।

आठवले ने तब चेतावनी दी थी कि इस तरह के बयान बंद नहीं किए गए, तो उनकी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया कड़ी कार्रवाई करेगी।अब ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर CJP को आंदोलन से दूर रहने की सलाह देकर आठवले ने एक बार फिर पार्टी को निशाने पर लिया है। उनके बयानों से स्पष्ट है कि CJP और केंद्रीय मंत्री के बीच राजनीतिक मतभेद केवल मौजूदा चुनाव आयोग विवाद तक सीमित नहीं हैं।

दिल्ली में आज दो मोर्चों पर हलचल, कांग्रेस और CJP की तैयारी

राजधानी दिल्ली में सोमवार को विरोध प्रदर्शनों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। कांग्रेस ने राहुल गांधी के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालने का ऐलान किया है। पार्टी ने इसे लोकतंत्र और संविधान से जुड़ा आंदोलन बताते हुए विपक्षी दलों तथा नागरिक संगठनों से भागीदारी की अपील की है।

दूसरी ओर, CJP ने भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए पुलिस से अनुमति मांगने की बात कही है। पार्टी के अनुसार, वह सुबह 10 बजे पुलिस से समय और स्थान निर्धारित करने का अनुरोध करेगी।

CJP ने चेतावनी दी है कि यदि 24 घंटे के भीतर अनुमति और स्थान को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तो वह स्वयं प्रदर्शन की जगह और समय घोषित करेगी।इससे पहले पार्टी प्रमुख अभिजीत दीपके समेत कई नेताओं को हिरासत में लिए जाने की खबर भी सामने आई थी।ऐसे में दिल्ली में विरोध प्रदर्शन, पुलिस की अनुमति और राजनीतिक संगठनों के अधिकारों को लेकर बहस और तेज हो सकती है।

सियासी संदेश साफ, लेकिन फैसला तथ्यों के आधार पर होगा

रामदास आठवले की CJP को दी गई नसीहत के पीछे राजनीतिक संदेश स्पष्ट है—वह पार्टी को नीट और छात्र हितों के मुद्दे तक सीमित रखने की वकालत कर रहे हैं और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलन को गैरजरूरी बता रहे हैं। साथ ही, उन्होंने राहुल गांधी के आरोपों पर सवाल उठाकर विपक्ष की रणनीति को चुनौती दी है।

लेकिन लोकतंत्र में किसी मुद्दे की प्रासंगिकता का निर्धारण केवल सत्तापक्ष या विपक्ष के बयानों से नहीं होता। मतदाता सूची में संशोधन हो, परीक्षा व्यवस्था में अनियमितताओं का आरोप हो या चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता का सवाल—हर मामले में तथ्यों, जवाबदेही और पारदर्शिता की कसौटी समान होनी चाहिए।

अब निगाहें CJP के अगले कदम पर हैं।

क्या पार्टी आठवले की सलाह मानकर छात्र हितों पर ध्यान केंद्रित करेगी, या ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपने प्रस्तावित विरोध को जारी रखेगी?

दिल्ली का अगला घटनाक्रम बताएगा कि यह विवाद केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या राजनीतिक टकराव का नया अध्याय खोलता है।

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