बी के झा
NSK news Ind

नई दिल्ली, 24 सितंबर
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल की बढ़ती संस्थागत भूमिका को लेकर कांग्रेस ने एक बार फिर केंद्र सरकार से सवाल पूछे हैं। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने सवाल उठाया है कि जब विदेश नीति के लिए अनुभवी विदेश मंत्री एस. जयशंकर मौजूद हैं, तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में डोभाल को कैबिनेट मंत्री का रैंक दिए जाने और उनकी भूमिका के विस्तार को किस रूप में देखा जाना चाहिए।चव्हाण ने इसी संदर्भ में पूर्ववर्ती व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहले, मनमोहन सिंह सरकार के दौर में NSA का पद अपेक्षाकृत अलग प्रशासनिक स्थिति में था। उनका सवाल केवल पद के दर्जे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने व्यापक रूप से यह मुद्दा उठाया कि भारत की विदेश नीति के निर्णायक स्तर पर वास्तविक समन्वय और दिशा किसके हाथ में है।
‘विदेश नीति कौन चला रहा है?’—चव्हाण का सीधा सवाल
चव्हाण के मुताबिक, एक ओर विदेश मंत्री एस. जयशंकर हैं, जो लंबे समय तक भारतीय विदेश सेवा में रहे हैं और विदेश नीति के विशेषज्ञ माने जाते हैं। दूसरी ओर डोभाल हैं, जो 2014 से लगातार राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भूमिका में हैं।चव्हाण ने सवाल उठाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में विदेश नीति आखिर कौन चला रहा है—विदेश मंत्रालय या राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र?
यही सवाल अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। हालांकि प्रशासनिक दृष्टि से विदेश नीति का औपचारिक दायित्व विदेश मंत्रालय और विदेश मंत्री के पास है, वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में NSA की भूमिका प्रधानमंत्री को रणनीतिक सलाह देने और विभिन्न सुरक्षा-संबंधी संस्थाओं के बीच समन्वय की है।
डोभाल को कब मिला कैबिनेट मंत्री का रैंक?
यहां कांग्रेस के आरोप और सरकारी रिकॉर्ड के बीच फर्क समझना जरूरी है। केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के 13 जून 2024 के आदेश के मुताबिक, अजित डोभाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में पुनर्नियुक्त किया गया और उनके कार्यकाल के दौरान उन्हें Table of Precedence में कैबिनेट मंत्री का रैंक दिया गया।यानी यह कहना कि डोभाल को अभी-अभी पहली बार कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला है, पूरी तरह सटीक नहीं होगा। उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड में 2024 का आदेश स्पष्ट रूप से इस रैंक का उल्लेख करता है।इसके अलावा, 2019 में भी डोभाल को NSA के रूप में दूसरा कार्यकाल दिए जाने के समय कैबिनेट मंत्री का व्यक्तिगत रैंक दिए जाने का उल्लेख उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में मिलता है।
एक पद, दो चेहरे और विदेश नीति पर बड़ा सवाल
भारतीय शासन व्यवस्था में विदेश नीति का संवैधानिक और प्रशासनिक ढांचा विदेश मंत्रालय के माध्यम से चलता है। वर्तमान केंद्रीय मंत्रिपरिषद की आधिकारिक सूची में एस. जयशंकर विदेश मंत्री हैं।दूसरी ओर, प्रधानमंत्री कार्यालय की मौजूदा सूची में अजित डोभाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में दर्ज किया गया है।
यहीं से राजनीतिक सवाल पैदा होता है—विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच सीमा और समन्वय की रेखा आखिर कितनी स्पष्ट है?
क्योंकि भारत की विदेश नीति अब केवल राजनयिक रिश्तों तक सीमित नहीं रह गई है। चीन सीमा, आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा, रणनीतिक साझेदारी, पश्चिम एशिया, रूस-अमेरिका संबंध और वैश्विक शक्ति-संतुलन जैसे मुद्दों में विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ते हैं।इसी वजह से NSA और विदेश मंत्री की भूमिकाओं के बीच तालमेल अपने आप में महत्वपूर्ण प्रशासनिक विषय है।
राहुल गांधी के हमले के बाद चव्हाण का बयान क्यों अहम?
चव्हाण का बयान ऐसे समय आया है जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भूमिका को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठा चुके हैं।कांग्रेस का राजनीतिक तर्क यह है कि विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका कितनी बढ़ी है, इसे सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।वहीं सरकार और उसके समर्थकों की ओर से डोभाल की भूमिका को राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक ढांचे में देखा जाता रहा है। केंद्र की ओर से अगस्त 2026 में डोभाल को लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय पुरस्कार दिए जाने के अवसर पर गृह मंत्री अमित शाह ने राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने में उनके योगदान की सार्वजनिक रूप से सराहना की थी।
असली सवाल पद नहीं, भूमिका का है
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है कि बहस सिर्फ इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि NSA को किस स्तर का रैंक मिला है। बड़ा प्रश्न यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के बीच जिम्मेदारियों का व्यावहारिक विभाजन किस तरह काम करता है।कांग्रेस इसे सत्ता के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और विदेश नीति की दिशा से जोड़कर देख रही है।
सरकार की ओर से डोभाल की भूमिका को राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक हितों और प्रधानमंत्री को रणनीतिक सलाह देने के संदर्भ में देखा जाता है।इसलिए चव्हाण का सवाल आने वाले दिनों में केवल कांग्रेस बनाम सरकार की राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहेगा या भारत की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के संस्थागत ढांचे पर गंभीर बहस खड़ी करेगा—यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
एन एस के विश्लेषण:
डोभाल को कैबिनेट मंत्री का रैंक दिया जाना सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज तथ्य है।
विवाद इस तथ्य से आगे बढ़कर उनकी भूमिका की सीमा, विदेश मंत्रालय के साथ समन्वय और प्रधानमंत्री कार्यालय में रणनीतिक निर्णयों की प्रक्रिया को लेकर है।
यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक आरोपों से अलग हटकर संस्थागत पारदर्शिता और जवाबदेही की बहस महत्वपूर्ण हो जाती है।
बी. के. झा
एन एस के
