न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर मोहम्मद यूनुस की घेराबंदी, ‘तुम आतंकवादी हो, यहां क्यों आए?’ के नारों से मचा हंगामा; हिंदुओं की सुरक्षा पर भी पूर्व अंतरिम सरकार का कार्यकाल कठघरे में

बी. के. झा

एनएसके – अंतरराष्ट्रीय राजनीति-विशेष रिपोर्ट

NSK news Ind

नई दिल्ली, 14 अक्टूबर

नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री और बांग्लादेश की पूर्व अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस को न्यूयॉर्क के जॉन एफ. कैनेडी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उस समय तीखे विरोध का सामना करना पड़ा, जब कुछ बांग्लादेशी प्रवासियों ने उन्हें घेरकर उनकी सरकार के कार्यकाल पर गंभीर सवाल उठाए। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में व्हीलचेयर पर बैठे यूनुस के सामने प्रदर्शनकारी चिल्लाते हुए दिखाई देते हैं। एक व्यक्ति की आवाज साफ सुनाई देती है— ‘तुम आतंकवादी हो, यहां क्यों आए?

वापस जाओ!

’यह घटना केवल एक व्यक्ति के विरोध तक सीमित नहीं है। इसने बांग्लादेश की राजनीति, सत्ता परिवर्तन के बाद पैदा हुए असंतोष, मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़े सवालों को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। हालांकि, प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि वीडियो से नहीं होती।

‘तुमने हजारों लोगों को मरवाया’, प्रदर्शनकारियों ने लगाए गंभीर आरोप

12 अक्टूबर को न्यूयॉर्क के जेएफके एयरपोर्ट पर हुई इस घटना के दौरान प्रदर्शनकारियों ने यूनुस पर बांग्लादेश में हजारों लोगों की मौत का जिम्मेदार होने, पुलिसकर्मियों की हत्याओं, बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां कराने और लोकतंत्र को कमजोर करने जैसे आरोप लगाए। एक प्रदर्शनकारी ने करीब दो लाख लोगों की गिरफ्तारी का दावा भी किया।प्रदर्शनकारियों ने सवाल किया कि बांग्लादेश में लोकतंत्र और मानवाधिकारों की बात करने वाले यूनुस आखिर अमेरिका क्यों आए हैं। उनके खिलाफ ‘वापस जाओ’ के नारे भी लगाए गए।

वायरल वीडियो में यूनुस व्हीलचेयर पर बैठे आगे बढ़ते दिखाई देते हैं। वह प्रदर्शनकारियों के आरोपों का कोई जवाब देते नजर नहीं आते। स्थिति को संभालने के लिए सुरक्षा कर्मियों को हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्हें भीड़ से दूर ले जाया गया।महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रदर्शनकारियों के आरोपों को फिलहाल सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। वीडियो विरोध की तीव्रता दिखाता है, लेकिन उसमें लगाए गए प्रत्येक आरोप की पुष्टि नहीं करता। प्रदर्शनकारियों की पहचान और उनकी ओर से लगाए गए दावों की स्वतंत्र पुष्टि भी स्पष्ट नहीं है।

सत्ता परिवर्तन के बाद भी बांग्लादेश में क्यों नहीं थमा असंतोष?

अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद मोहम्मद यूनुस ने अंतरिम सरकार की कमान संभाली थी। उनसे उम्मीद की गई थी कि वह देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करेंगे, कानून-व्यवस्था सुधारेंगे और मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करेंगे।लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद बांग्लादेश को राजनीतिक हिंसा, भीड़ के हमलों, गिरफ्तारियों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी रिपोर्टों में यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान राजनीतिक विरोधियों की मनमानी हिरासत, भीड़ की हिंसा और मानवाधिकार सुधारों को लागू करने में कमियों पर चिंता जताई थी। संगठन ने यह भी रेखांकित किया कि पिछली सरकार के दौर में हुए दमन के कुछ रूप कम होने के बावजूद जवाबदेही और कानून के शासन से जुड़ी समस्याएं बनी रहीं।ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस सरकार से लोकतांत्रिक सुधारों की उम्मीद की गई थी, उसके कार्यकाल में कानून-व्यवस्था और नागरिक अधिकारों को लेकर विवाद क्यों बने रहे?

हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि बांग्लादेश में राजनीतिक हिंसा की पूरी जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति पर डालने के लिए ठोस साक्ष्य आवश्यक हैं। विरोध के नारों से किसी व्यक्ति का अपराध सिद्ध नहीं होता।

बांग्लादेश के हिंदुओं की सुरक्षा: यूनुस सरकार के कार्यकाल का सबसे संवेदनशील सवाल

मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल की समीक्षा करते समय बांग्लादेश के हिंदू समुदाय की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राजनीतिक उथल-पुथल के बीच हिंदुओं के घरों, दुकानों और धार्मिक स्थलों पर हमलों की घटनाओं ने भारत सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंता पैदा की थी।ह्यूमन राइट्स वॉच ने जुलाई 2025 में बताया था कि रंगपुर जिले में हिंदू अल्पसंख्यक समुदाय के कम-से-कम 14 घरों को भीड़ ने नुकसान पहुंचाया। संगठन ने अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ जारी हिंसा और सुरक्षा संबंधी समस्याओं पर भी चिंता जताई।

इन घटनाओं ने एक बुनियादी सवाल खड़ा किया—यदि कोई सरकार लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा का दावा करती है, तो उसके शासन में धार्मिक अल्पसंख्यकों को भयमुक्त जीवन की गारंटी क्यों नहीं मिल पाती?

कॉक्स बाजार में हिंदू बस्ती और मंदिर पर हमले से संबंधित दावों की भी स्वतंत्र पुष्टि और घटना-विशेष के विश्वसनीय विवरण के आधार पर जांच आवश्यक है। किसी एक घटना को बिना पुष्ट प्रमाण के पूरे समुदाय या सरकार के विरुद्ध अंतिम निष्कर्ष का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।धर्म चाहे कोई भी हो, किसी नागरिक के घर, मंदिर या धार्मिक पहचान पर हमला केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि उसके संवैधानिक अधिकारों पर चोट है। बांग्लादेश की सरकारों की जवाबदेही इसी कसौटी पर तय होनी चाहिए।

गबन के मामले में भी विवादों में रहे यूनुस

मोहम्मद यूनुस का सार्वजनिक जीवन केवल राजनीति और मानवाधिकारों से जुड़े विवादों तक सीमित नहीं रहा है। ग्रामीण बैंक के माध्यम से गरीबों, विशेषकर महिलाओं को सूक्ष्म ऋण उपलब्ध कराने के उनके काम के लिए उन्हें 2006 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। इसके बावजूद उनके कारोबारी और कानूनी मामलों को लेकर भी विवाद सामने आते रहे हैं।ग्रामीण टेलीकॉम के श्रमिक कल्याण कोष से लगभग 20 लाख अमेरिकी डॉलर के कथित गबन से जुड़े मामले में यूनुस और अन्य लोगों के खिलाफ बांग्लादेश में कानूनी कार्यवाही की खबरें आई थीं। यूनुस ने भ्रष्टाचार के आरोपों से इनकार किया था और कार्रवाई को उत्पीड़न बताया था।इस मामले का उल्लेख करते समय उसकी वर्तमान कानूनी स्थिति और संबंधित अदालत के अंतिम आदेशों की पुष्टि आवश्यक है।

किसी मामले में आरोप तय होना अपने आप में दोषसिद्धि नहीं होता।इसलिए यूनुस के सार्वजनिक जीवन का आकलन करते समय उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों, उनके पक्ष और अदालत के निष्कर्षों के बीच स्पष्ट अंतर रखना जरूरी है।

विरोध के बाद ढाका की प्रतिक्रिया, अमेरिका से कार्रवाई की मांग

न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर हुई घटना के बाद बांग्लादेश की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई। द डेली स्टार की 14 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश के विदेश मामलों के राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने कहा कि ढाका इस मुद्दे को अमेरिकी सरकार के सामने उठाएगा और कानून प्रवर्तन के स्तर पर कार्रवाई की मांग करेगा।इससे स्पष्ट है कि मामला केवल एयरपोर्ट पर हुई नारेबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब यह कूटनीतिक चिंता का विषय भी बन गया है।लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी नेता से सवाल पूछना नागरिकों का अधिकार है। लेकिन विरोध और धमकी के बीच अंतर बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। आरोपों की जांच होनी चाहिए, परंतु किसी व्यक्ति को केवल नारे लगाकर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

नोबेल पुरस्कार सम्मान है, जवाबदेही से छूट नहीं

मोहम्मद यूनुस के मामले में सबसे बड़ा प्रश्न उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और उनके नेतृत्व के सार्वजनिक मूल्यांकन के बीच है। नोबेल पुरस्कार किसी व्यक्ति के योगदान का सम्मान है, लेकिन वह उसके बाद लिए गए राजनीतिक निर्णयों को आलोचना से परे नहीं कर देता।यदि किसी सरकार के कार्यकाल में नागरिकों की सुरक्षा प्रभावित होती है, राजनीतिक विरोधियों के अधिकारों पर सवाल उठते हैं या अल्पसंख्यकों पर हमले होते हैं, तो उन घटनाओं की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करना जरूरी है।

न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर लगे नारे यूनुस के खिलाफ आरोपों को सिद्ध नहीं करते, लेकिन वे यह जरूर दिखाते हैं कि उनके कार्यकाल को लेकर राजनीतिक टकराव और असंतोष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिखाई दे रहा है।

लोकतंत्र में असली कसौटी न तो पुरस्कार है, न सत्ता और न ही समर्थकों की संख्या—असली कसौटी है नागरिकों की सुरक्षा, कानून का निष्पक्ष शासन और सत्ता से सवाल पूछने की स्वतंत्रता।

मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल का अंतिम मूल्यांकन भी इसी कसौटी पर होना चाहिए।

बांग्लादेश के लोगों को न्याय मिले, हिंदू समेत सभी अल्पसंख्यक सुरक्षित रहें और राजनीतिक हिंसा के प्रत्येक मामले में निष्पक्ष जांच हो—यही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी जिम्मेदारी है।

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