बी के झा
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झुंझुनूं ( राजस्थान), 26 सितंबर
राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के 150वें वर्ष के अवसर पर शुक्रवार को राजस्थान का झुंझुनूं देशव्यापी सामूहिक गायन अभियान का एक बड़ा केंद्र बन गया।
सुबह ठीक 11 बजे जिले के 2,685 शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों और आम नागरिकों ने एक साथ राष्ट्रीय गीत का सामूहिक गायन किया। शिक्षा विभाग के अनुसार इस आयोजन में 2 लाख 45 हजार 670 लोगों ने भाग लिया।यह आयोजन केवल एक सामूहिक गायन कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों, राष्ट्रीय एकता और नई पीढ़ी को देश के स्वतंत्रता संघर्ष से जोड़ने के प्रयास के रूप में भी प्रस्तुत किया गया।
कार्यक्रम का आयोजन विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान, नई दिल्ली की ओर से देशव्यापी स्तर पर किया गया। संस्था के अनुसार देशभर में 25 हजार से अधिक स्थानों पर एक करोड़ से अधिक विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों और आम नागरिकों को एक ही समय में ‘वंदे मातरम्’ के सामूहिक गायन से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया।
झुंझुनूं में एक साथ उठी 2.45 लाख आवाजें
जिले में कार्यक्रम की व्यापकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हजारों विद्यालयों और संस्थानों में एक ही समय पर ‘वंदे मातरम्’ की गूंज सुनाई दी।जिला संयोजक राजेंद्र कुमार गोयल के अनुसार इस आयोजन को विश्व रिकॉर्ड में शामिल कराने की दिशा में प्रयास किया जा रहा है। उनके मुताबिक एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी कार्यक्रम को सूचीबद्ध किया गया है।
हालांकि अंतिम विश्व रिकॉर्ड की आधिकारिक मान्यता संबंधित रिकॉर्ड संस्था के सत्यापन और उसके निर्धारित मानकों पर निर्भर करेगी।इस बार सिर्फ दो नहीं, छह छंदों का गायनकार्यक्रम की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक रहा—‘वंदे मातरम्’ के संपूर्ण छह छंदों का सामूहिक गायन।आमतौर पर सार्वजनिक कार्यक्रमों में गीत के शुरुआती दो छंद ही गाए जाते हैं।
आयोजकों के अनुसार 150वें वर्ष के अवसर पर संपूर्ण गीत के छह छंदों का गायन कराया गया।विद्या भारती से जुड़े राजेश शर्मा के अनुसार विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों को ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व की जानकारी दी गई तथा स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका से परिचित कराया गया।यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि नई पीढ़ी के लिए राष्ट्रीय प्रतीकों को केवल औपचारिकता के बजाय उनके ऐतिहासिक संदर्भ के साथ समझना शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
शिक्षाविदों की नजर में: केवल गायन नहीं, इतिहास से जुड़ने का अवसर
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे कार्यक्रम तब अधिक प्रभावी होते हैं जब विद्यार्थियों को केवल गीत याद कराने के बजाय उसके इतिहास, साहित्यिक संदर्भ और स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका भी समझाई जाए।शिक्षाविदों के नजरिए से सामूहिक गायन जैसी गतिविधियां विद्यार्थियों में सामूहिक सहभागिता, अनुशासन और ऐतिहासिक चेतना विकसित करने का माध्यम बन सकती हैं।
हालांकि शिक्षा विशेषज्ञ यह भी रेखांकित करते हैं कि राष्ट्रीय गीतों और प्रतीकों की शिक्षा को राजनीतिक बहस से अलग रखते हुए संवैधानिक मूल्यों, स्वतंत्रता आंदोलन के विविध योगदानों और भारत की बहुलतावादी परंपरा के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाना अधिक उपयोगी होगा।
कानूनविदों की नजर में: राष्ट्रभाव और संवैधानिक स्वतंत्रता दोनों महत्वपूर्ण
कानूनी दृष्टि से ‘वंदे मातरम्’ भारत का राष्ट्रीय गीत है। इसके सम्मान और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन को समझना भी महत्वपूर्ण है।कानूनविदों के अनुसार किसी भी राष्ट्रीय आयोजन का उद्देश्य यदि नागरिकों में राष्ट्रीय चेतना और एकता की भावना मजबूत करना है, तो उसमें संविधान की मूल भावना—स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और विविधता—का भी सम्मान होना चाहिए।
यानी राष्ट्रगीत या राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत करना और नागरिकों की संवैधानिक स्वतंत्रताओं का सम्मान करना एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के पूरक पक्ष हैं।
समाजसेवी संगठनों ने देखा सामाजिक एकता का संदेश
सामाजिक क्षेत्र से जुड़े संगठनों के नजरिए से ऐसे आयोजनों की सबसे बड़ी ताकत उनकी व्यापक भागीदारी होती है।जब एक ही समय पर अलग-अलग सामाजिक, भाषाई और आर्थिक पृष्ठभूमि के विद्यार्थी और नागरिक एक साथ किसी राष्ट्रीय गीत का गायन करते हैं, तो यह सार्वजनिक जीवन में सामूहिकता की भावना को सामने लाता है।
झुंझुनूं में हजारों संस्थानों के माध्यम से लाखों लोगों का एक साथ जुड़ना इसी सामूहिक सहभागिता का उदाहरण है।सामाजिक संगठनों के लिए हालांकि चुनौती यह भी रहती है कि ऐसे आयोजनों का प्रभाव कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी सामाजिक सद्भाव, शिक्षा, सेवा और नागरिक जिम्मेदारी के रूप में दिखाई दे।
सरकार के लिए संदेश: राष्ट्रीय प्रतीकों से नई पीढ़ी को जोड़ने का अभियान
सरकार और प्रशासनिक तंत्र की दृष्टि से इस तरह के आयोजन शिक्षा संस्थानों में राष्ट्रीय पर्वों और ऐतिहासिक घटनाओं को लेकर जनभागीदारी बढ़ाने का माध्यम बन सकते हैं।खासकर तब, जब कार्यक्रम को केवल विद्यालय परिसर तक सीमित न रखकर अभिभावकों और आम नागरिकों से भी जोड़ा गया हो।देशभर में एक साथ आयोजन कराने की कोशिश का एक दूसरा पहलू भी है—तकनीक और संगठन क्षमता के माध्यम से बड़े पैमाने पर नागरिक भागीदारी।
यदि आयोजन के आंकड़ों का स्वतंत्र सत्यापन होता है और निर्धारित रिकॉर्ड मानकों पर यह प्रमाणित होता है, तो इसका संगठनात्मक पक्ष भी उल्लेखनीय माना जाएगा।
विपक्ष के लिए भी यह बहस का विषय क्यों?
राष्ट्रीय प्रतीकों और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को लेकर देश में राजनीतिक विमर्श समय-समय पर अलग-अलग दृष्टिकोणों में सामने आता रहा है।विपक्षी दलों के नजरिए से ऐसे कार्यक्रमों पर सामान्यतः यह सवाल उठ सकता है कि राष्ट्रभक्ति को किसी एक राजनीतिक विचारधारा या संगठन की पहचान तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। स्वतंत्रता आंदोलन में विभिन्न विचारधाराओं, समुदायों और संगठनों के योगदान को भी समान रूप से इतिहास और शिक्षा में स्थान मिलना चाहिए।
वहीं, ऐसे आयोजनों के समर्थक पक्ष का तर्क हो सकता है कि राष्ट्रीय गीत और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने में बड़े पैमाने पर सामूहिक कार्यक्रमों की भूमिका है।इसलिए असली प्रश्न केवल यह नहीं कि कितने लोगों ने ‘वंदे मातरम्’ गाया, बल्कि यह भी है कि कार्यक्रम विद्यार्थियों को उसके ऐतिहासिक संदर्भ और स्वतंत्रता आंदोलन की व्यापक विरासत के बारे में कितना समझा पाया।
राजनीतिक विश्लेषण: ‘वंदे मातरम्’ से आगे की कहानी
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार ‘वंदे मातरम्’ भारतीय सार्वजनिक जीवन में केवल एक गीत नहीं रहा है। इसका इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन, राष्ट्रवादी चेतना और औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जनभावना से गहराई से जुड़ा है।इसी वजह से समय-समय पर इसके अर्थ और सार्वजनिक इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक एवं सामाजिक बहस भी होती रही है।
लेकिन झुंझुनूं का आयोजन इस बहस को एक अलग कोण देता है।यहां केंद्र में राजनीति नहीं, बल्कि स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों विद्यार्थियों की सामूहिक भागीदारी रही।यदि ऐसी गतिविधियों के साथ विद्यार्थियों को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का व्यापक इतिहास, संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाएं और देश की विविध सांस्कृतिक परंपराएं भी पढ़ाई जाएं, तो सामूहिक गायन एक व्यापक नागरिक शिक्षा कार्यक्रम का हिस्सा बन सकता है।
क्या सचमुच बनेगा विश्व रिकॉर्ड?
आयोजकों ने देशभर में एक करोड़ से अधिक लोगों के सामूहिक गायन का दावा किया है और इसे विश्व रिकॉर्ड के लिए प्रस्तुत करने की बात कही है।लेकिन किसी भी विश्व रिकॉर्ड का अंतिम निर्धारण केवल आयोजन में शामिल लोगों की संख्या के दावे से नहीं होता। इसके लिए संबंधित रिकॉर्ड संस्था द्वारा तय किए गए प्रमाण, समय, प्रतिभागियों की पुष्टि, वीडियो/दस्तावेजी साक्ष्य और अन्य निर्धारित मानकों का सत्यापन आवश्यक होता है।
इसलिए फिलहाल इसे विश्व रिकॉर्ड की प्रक्रिया में शामिल किया गया आयोजन कहना अधिक तथ्यात्मक होगा, जबकि अंतिम रिकॉर्ड की पुष्टि संबंधित संस्था के आधिकारिक सत्यापन के बाद ही मानी जानी चाहिए।
झुंझुनूं से उठा राष्ट्रगीत का सामूहिक स्वर
शुक्रवार को सुबह 11 बजे झुंझुनूं के 2,685 संस्थानों में जब लाखों आवाजें एक साथ ‘वंदे मातरम्’ के सुर में जुड़ीं, तो यह दृश्य अपने आप में बड़ा था। 2 लाख 45 हजार 670 प्रतिभागी—एक समय, एक गीत और एक सामूहिक स्वर।
150वें वर्ष के अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम इस सवाल को भी सामने लाता है कि क्या राष्ट्रीय प्रतीकों को केवल समारोहों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें इतिहास, संविधान, शिक्षा और नागरिक जिम्मेदारी की व्यापक समझ से जोड़ा जा सकता है?
झुंझुनूं का आयोजन फिलहाल इसका एक बड़ा उदाहरण जरूर प्रस्तुत करता है।
क्योंकि राष्ट्रगीत की शक्ति केवल उसके शब्दों में नहीं, बल्कि उस सामूहिक चेतना में भी है जो अलग-अलग आवाजों को एक सुर में जोड़ देती है।
एनएसके विश्लेषण
‘वंदे मातरम्’ के 150वें वर्ष का यह आयोजन संख्या के लिहाज से जितना बड़ा है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण इसका शैक्षिक और सामाजिक पक्ष है।
यदि लाखों विद्यार्थियों ने गीत गाया है तो उनके लिए यह भी जरूरी है कि वे जानें कि यह गीत भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में कैसे राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बना और आज संवैधानिक भारत में राष्ट्रीय प्रतीकों का अर्थ क्या है।
2.45 लाख लोगों की एक साथ उठी आवाज केवल एक रिकॉर्ड का आंकड़ा नहीं—यह इस बात का सार्वजनिक दृश्य है कि शिक्षा संस्थान चाहें तो इतिहास, संस्कृति और नागरिक चेतना को बड़े पैमाने पर जनभागीदारी से जोड़ सकते हैं।
