जहां शंखनाद तक वर्जित, वहां DJ की गूंज पर घमासान! बदरीनाथ में कॉन्सर्ट पर मुरली मनोहर जोशी का सवाल—क्या आस्था की कीमत पर पर्यटन? तीर्थ पुरोहितों ने भी उठाए सवाल, मंदिर के निकट आयोजन के स्वरूप और स्थान को लेकर बढ़ा विवाद

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली/देहरादून, 26 सितंबर

हिमालय की गोद में बसे बदरीनाथ धाम में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम अब संस्कृति, आस्था, पर्यावरण और धार्मिक स्थलों के व्यावसायीकरण को लेकर बड़ी बहस का केंद्र बन गया है।

19 और 20 सितंबर को आयोजित ‘देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल’ के वीडियो सामने आने के बाद कार्यक्रम में तेज संगीत और डांस को लेकर सवाल उठे। आयोजन का विषय था—‘हमारी संस्कृति, हमारी विरासत, हमारा भविष्य।’कार्यक्रम भारतीय सेना की ‘ऑपरेशन सद्भावना’ पहल के तहत चमोली जिला प्रशासन और उत्तराखंड पर्यटन के सहयोग से आयोजित किया गया था।

रिपोर्टों के अनुसार कार्यक्रम बदरीनाथ मंदिर के मुख्य प्रवेश क्षेत्र के ठीक बाहर/निकट आयोजित हुआ। समापन दिवस पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बदरीनाथ धाम में पूजा-अर्चना भी की और कार्यक्रम से जुड़े प्रतिभागियों को सम्मानित किया।

लेकिन अब सवाल कार्यक्रम की नीयत से ज्यादा स्थान और स्वरूप पर उठ रहा है।और इस बहस में भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व पार्टी अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी की आपत्ति ने विवाद को राष्ट्रीय स्तर पर ला दिया है।

‘यह धाम की पवित्रता पर सीधा आघात’

मुरली मनोहर जोशी ने 25 सितंबर को सोशल मीडिया मंच X पर कार्यक्रम को लेकर तीखी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि बदरीनाथ जैसे पवित्र स्थल पर संगीत समारोह या DJ कार्यक्रम की अनुमति देना सांस्कृतिक मर्यादा के उल्लंघन के साथ धाम की पवित्रता पर आघात है।जोशी ने बदरीनाथ की धार्मिक परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां तक कि शंख बजाने की परंपरा भी वर्जित है, ऐसे में तेज संगीत और बड़े मनोरंजन कार्यक्रमों को लेकर पुनर्विचार होना चाहिए।

उन्होंने ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में बड़े जमावड़े और लोगों के नाचने से जुड़े स्वास्थ्य तथा पर्यावरणीय पहलुओं पर भी चिंता जताई।उन्होंने केंद्र और उत्तराखंड सरकार से ऐसे आयोजनों पर रोक लगाने और देवभूमि की मर्यादा बनाए रखने का आग्रह किया है।जोशी ने यह भी कहा कि देवभूमि को बाजारू संस्कृति में बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने की जरूरत है और शंकराचार्यों तथा संत-महात्माओं से इस विषय पर प्रभावी आवाज उठाने की अपील की।

सवाल इसलिए भी बड़ा है—जहां शंख नहीं, वहां DJ क्यों?

बदरीनाथ में शंख न बजाने की परंपरा अपने आप में विशिष्ट है।धार्मिक परंपराओं में इसके पीछे अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार माता लक्ष्मी की साधना में व्यवधान न हो, इसलिए शंखनाद नहीं किया जाता। दूसरी लोक-मान्यता इसे शंखचूर्ण अथवा अन्य पौराणिक प्रसंगों से जोड़ती है। कुछ स्थानीय व्याख्याओं में हिमालयी भौगोलिक परिस्थितियों और ध्वनि-प्रतिध्वनि को भी कारण बताया जाता है।इसलिए शंख-वर्जना को लेकर एक ही सर्वमान्य व्याख्या बताना उचित नहीं होगा।

लेकिन मूल प्रश्न धार्मिक परंपरा से आगे जाता है—जब इस धाम की धार्मिक संस्कृति में ध्वनि और शांति को लेकर इतनी विशिष्ट परंपराएं हैं, तो मंदिर के इतने करीब बड़े ध्वनि-विस्तार वाले कार्यक्रम की सीमा क्या होनी चाहिए?

यही वह प्रश्न है जिसने अब विवाद को जन्म दिया है।

संतों और तीर्थ पुरोहितों ने भी जताई आपत्ति

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बदरीनाथ के निकट कार्यक्रम में तेज संगीत और नृत्य के वीडियो सामने आने के बाद साधु-संतों और मंदिर से जुड़े लोगों ने आयोजन के स्वरूप पर सवाल उठाए।उत्तराखंड चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत के महासचिव डॉ. बृजेश सती ने भी आपत्ति जताई। उन्होंने बदरीनाथ में शंख की ध्वनि की परंपरागत मनाही का उल्लेख करते हुए कार्यक्रम के स्वरूप पर सवाल उठाया। उन्होंने पहले लाउडस्पीकर पर भजन को लेकर न्यायालयी हस्तक्षेप का भी संदर्भ दिया।यह विरोध केवल किसी राजनीतिक दल के मंच से नहीं आया है। मंदिर की धार्मिक मर्यादा, तीर्थ क्षेत्र की शांति और आयोजन की सीमा को लेकर धार्मिक पक्ष से भी सवाल सामने आए हैं।

राजनीतिक विश्लेषक क्या देख रहे हैं?

राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर इस विवाद के दो अलग पहलू हैं।

पहला—धार्मिक पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था।

दूसरा—तीर्थस्थल और मनोरंजन स्थल के बीच की सीमा।

उत्तराखंड में पर्यटन रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सांस्कृतिक कार्यक्रम स्थानीय कलाकारों को मंच देने और क्षेत्रीय संस्कृति को बढ़ावा देने का माध्यम भी हो सकते हैं।लेकिन बदरीनाथ जैसे तीर्थस्थल के मामले में आयोजकों के सामने एक अतिरिक्त जिम्मेदारी आती है—कार्यक्रम का स्वरूप ऐसा हो कि पर्यटन और सांस्कृतिक गतिविधि के साथ तीर्थ की धार्मिक मर्यादा भी बनी रहे।

यही संतुलन अब बहस के केंद्र में है।

शिक्षाविदों और समाजसेवी संस्थाओं के सामने भी बड़ा सवाल

शिक्षाविदों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों के लिए विवाद का मूल प्रश्न यह है कि ‘संस्कृति महोत्सव’ की परिभाषा क्या होनी चाहिए?

यदि आयोजन का उद्देश्य स्थानीय संस्कृति को प्रदर्शित करना है तो लोकसंगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक वाद्य, हिमालयी कला, हस्तशिल्प और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत को केंद्र में रखा जा सकता है।

लेकिन यदि कार्यक्रम का स्वरूप सामान्य कॉन्सर्ट जैसा हो जाता है तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेगा कि क्या वही प्रारूप किसी प्रमुख तीर्थ के निकट उपयुक्त है?

यानी विवाद संगीत बनाम धर्म का सीधा संघर्ष नहीं है।

असली सवाल है—स्थान, ध्वनि की तीव्रता, आयोजन का स्वरूप और धार्मिक क्षेत्र की संवेदनशीलता के बीच संतुलन कैसे बने?

कानूनविदों के लिए भी मुद्दा केवल आस्था का नहीं

कानूनी दृष्टि से भी इस बहस को केवल धार्मिक भावना तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा।धार्मिक स्थलों के आसपास किसी आयोजन की अनुमति देते समय प्रशासन को स्थानीय नियमों, ध्वनि प्रदूषण संबंधी प्रावधानों, पर्यावरणीय संवेदनशीलता, भीड़ प्रबंधन और सार्वजनिक सुरक्षा जैसे पहलुओं को देखना होता है।इसलिए यदि विवाद आगे बढ़ता है तो महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि कार्यक्रम के लिए अनुमति किस प्राधिकारी ने दी,

किन शर्तों पर दी गई और क्या ध्वनि,

भीड़, पर्यावरण तथा धार्मिक क्षेत्र से संबंधित सभी नियमों का पालन हुआ?

यही वे सवाल हैं जिनका जवाब प्रशासनिक स्तर पर सार्वजनिक होना विवाद को शांत करने में मदद कर सकता है।

पर्यावरण का सवाल सबसे अलग

बदरीनाथ केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि अत्यंत संवेदनशील हिमालयी भूभाग का हिस्सा भी है।बड़े आयोजनों में भीड़, वाहनों की आवाजाही, कचरा, ध्वनि और स्थानीय संसाधनों पर दबाव जैसे सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं।इसीलिए मुरली मनोहर जोशी ने भी अपनी आपत्ति में धार्मिक मर्यादा के साथ पर्यावरण और ऊंचाई पर लोगों के स्वास्थ्य का मुद्दा उठाया है।

पर्यावरण विशेषज्ञों के लिए यहां एक व्यापक प्रश्न भी है—क्या हिमालयी तीर्थों के लिए ‘टूरिज्म कैपेसिटी’ और बड़े आयोजनों की स्पष्ट सीमा तय होनी चाहिए?

यह सवाल केवल बदरीनाथ का नहीं, पूरे हिमालयी पर्यटन मॉडल का है।

सेना की पहल होने से सवाल और संवेदनशील

इस आयोजन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह भारतीय सेना की ‘ऑपरेशन सद्भावना’ पहल के तहत आयोजित हुआ था और चमोली प्रशासन तथा उत्तराखंड पर्यटन भी इससे जुड़े थे।इसलिए विवाद को केवल किसी निजी आयोजक की गतिविधि के रूप में देखना उचित नहीं होगा।यदि आयोजन को लेकर धार्मिक या पर्यावरणीय आपत्तियां हैं तो प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कार्यक्रम के लिए स्थान और प्रारूप का चयन किन आधारों पर किया गया था।

विपक्ष की प्रतिक्रिया पर फिलहाल तस्वीर अधूरी

इस विवाद पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आना स्वाभाविक है, लेकिन उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों में कांग्रेस या अन्य प्रमुख विपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं की कोई स्पष्ट, प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं मिली है।इसलिए बिना आधिकारिक बयान के किसी दल के नाम से प्रतिक्रिया जोड़ना खबर की विश्वसनीयता के खिलाफ होगा।

हालांकि विपक्षी दल यदि इस मुद्दे को उठाते हैं तो बहस केवल ‘DJ बनाम धर्म’ तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। वे प्रशासनिक अनुमति, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और तीर्थ पर्यटन की नीति पर सरकार से जवाब मांग सकते हैं।

हिन्दू संगठनों के लिए भी आत्ममंथन का अवसर

हिन्दू धार्मिक संगठनों के सामने भी यह प्रश्न है कि तीर्थस्थलों की मर्यादा की रक्षा का व्यावहारिक मॉडल क्या हो।सिर्फ विरोध करने के बजाय क्या धार्मिक संगठनों, तीर्थ पुरोहितों, प्रशासन और पर्यटन विभाग के बीच ऐसी आचार-संहिता बन सकती है जिसमें—- तीर्थ क्षेत्र की सीमा स्पष्ट हो,

बड़े मनोरंजन कार्यक्रमों के लिए अलग क्षेत्र तय हों,

ध्वनि की सीमा निर्धारित हो,

धार्मिक अनुष्ठानों के समय कार्यक्रम न हों,

कचरा और भीड़ प्रबंधन की अनिवार्य व्यवस्था हो,

स्थानीय संस्कृति को प्राथमिकता मिले,

और पर्यावरणीय वहन क्षमता का वैज्ञानिक आकलन हो?

अगर ऐसा ढांचा बनता है तो विवाद केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समाधान की दिशा में बढ़ सकता है।

एनएसके विश्लेषण:

बदरीनाथ में असली बहस DJ की नहीं, मर्यादा की है

बदरीनाथ के पास हुआ यह सांस्कृतिक आयोजन अब एक बड़े प्रश्न का प्रतीक बन गया है।

क्या देवभूमि में संस्कृति के नाम पर आधुनिक कार्यक्रमों की अनुमति होनी चाहिए?

इसका उत्तर न तो हर आधुनिक आयोजन को खारिज करना है और न हर धार्मिक क्षेत्र को मनोरंजन स्थल में बदल देना।बदरीनाथ जैसे धाम की अपनी धार्मिक परंपरा है।

वहीं स्थानीय संस्कृति, कलाकारों और पर्यटन को भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।इसलिए रास्ता टकराव का नहीं, मर्यादा और आधुनिकता के बीच स्पष्ट सीमा तय करने का होना चाहिए।

मुरली मनोहर जोशी ने जिस सवाल को उठाया है, वह केवल एक DJ कार्यक्रम का सवाल नहीं है। यह आने वाले वर्षों में उत्तराखंड के धार्मिक पर्यटन की दिशा से जुड़ा प्रश्न भी है।

तीर्थ अगर पर्यटन बने तो उसकी आत्मा न खोए और पर्यटन अगर तीर्थ की सीमा में आए तो उसकी मर्यादा न टूटे—बदरीनाथ विवाद का सबसे बड़ा सबक शायद यही है।

हिमालय की खामोशी को बचाना केवल धार्मिक जिम्मेदारी नहीं, पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी है।

और अगर ‘हमारी संस्कृति, हमारी विरासत, हमारा भविष्य’ किसी कार्यक्रम का विषय है, तो सबसे पहले यह तय करना होगा कि विरासत को मंच पर प्रस्तुत करना है या मंच की चमक में विरासत को पीछे छोड़ देना है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *