19 बेटियों संग पिता की 105 किलोमीटर कांवड़ यात्रा, बाबाधाम की राह पर निकला अनोखा परिवार, केसरिया वस्त्रों में बेटियों का जत्था बना आकर्षण का केंद्र

बी के झा

NSK news Ind

गोड्डा/सुल्तानगंज, 25 अगस्त

सावन की पवित्र फिजा में जब सुल्तानगंज से देवघर तक लाखों कांवड़ियों के कदम ‘बोल बम’ के जयघोष के साथ आगे बढ़ रहे हैं, उसी भीड़ में एक परिवार की यात्रा लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रही है। झारखंड के गोड्डा निवासी संजीव कुमार अपनी 19 बेटियों के साथ करीब 105 किलोमीटर की कांवड़ यात्रा पर निकले हैं।

केसरिया वस्त्रों में सजी बेटियां कंधे पर कांवड़ उठाए पिता के साथ बाबा बैद्यनाथ के दरबार की ओर बढ़ रही हैं।यह यात्रा सिर्फ आस्था की कहानी नहीं, बल्कि परिवार, संस्कार और बेटियों के प्रति विश्वास का भी संदेश देती नजर आ रही है।

सुल्तानगंज में गंगा स्नान और जल भरने के बाद शुरू हुई यह पैदल यात्रा

मुंगेर के असरगंज स्थित कच्ची कांवरिया पथ से आगे बढ़ रही है। जहां भी यह जत्था पहुंच रहा है, राहगीर और स्थानीय लोग कुछ पल ठहरकर इस अनोखे दृश्य को निहार रहे हैं।चार दशक से बाबा के दरबार में पहुंच रहे संजीव कुमार के लिए बाबाधाम की यात्रा कोई नया संकल्प नहीं है। वह पिछले करीब 40 वर्षों से लगातार सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर देवघर पहुंचते रहे हैं।

हर सावन में उनकी आस्था उन्हें इस कठिन पैदल यात्रा के लिए प्रेरित करती है। इस बार उन्होंने अपनी यात्रा को और खास बना दिया और परिवार की 19 बेटियों को भी साथ लेकर बाबा बैद्यनाथ के दरबार की ओर निकल पड़े।इस टोली में छोटी बच्चियों से लेकर युवा बेटियां तक शामिल हैं। इनमें कई ऐसी हैं, जो पिछले दस वर्षों से लगातार कांवड़ यात्रा में हिस्सा ले रही हैं।

केसरिया परिधान, कंधे पर कांवड़ और जुबां पर भोलेनाथ का नाम लिए बेटियों का यह जत्था कच्ची कांवरिया पथ पर आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

तपती राह, छाले और फिर भी कदम नहीं रुके

सुल्तानगंज से देवघर तक करीब 105 किलोमीटर की यात्रा आसान नहीं है। तेज धूप, लंबा पैदल सफर, थकान और पैरों में पड़ने वाले छालों के बावजूद बेटियों का उत्साह कम नहीं हुआ है। उनके चेहरों पर थकान से ज्यादा बाबा बैद्यनाथ के दर्शन की उत्सुकता दिखाई दे रही है।

यात्रा के दौरान परिवार का अनुशासन और आपसी सहयोग भी देखने को मिल रहा है। छोटी बेटियों का बड़ी बहनें ध्यान रख रही हैं और पिता पूरे जत्थे को संभालते हुए आगे बढ़ रहे हैं। रास्ते में लोगों द्वारा इस परिवार का उत्साह बढ़ाया जा रहा है।

‘आस्था के साथ अपनी जड़ों से जुड़ें बेटियां

’संजीव कुमार का कहना है कि आज की युवा पीढ़ी आधुनिकता और मोबाइल की दुनिया में तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन इस दौड़ में कहीं न कहीं अपनी संस्कृति और परंपराओं से दूरी भी बढ़ रही है। उनका मानना है कि बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ अपनी संस्कृति और संस्कारों से परिचित कराना भी जरूरी है।

उन्होंने कहा कि बेटियों को धर्म और संस्कार से जोड़ना उनके लिए शिक्षा का ही एक हिस्सा है। उनका उद्देश्य बेटियों पर किसी तरह का दबाव डालना नहीं, बल्कि उन्हें अपनी परंपराओं और पारिवारिक मूल्यों से परिचित कराना है।

बेटियों के चेहरे पर भक्ति का उत्साह

यात्रा में शामिल बेटियां भी इस अनुभव को लेकर उत्साहित हैं। उनका कहना है कि कांवड़ यात्रा ने उन्हें केवल धार्मिक आस्था से ही नहीं जोड़ा, बल्कि कठिन परिस्थितियों में धैर्य और अनुशासन के साथ आगे बढ़ना भी सिखाया है।बेटियों का कहना है कि महादेव सब जानते हैं। मन में जो मन्नत है, बाबा उसे जरूर पूरा करेंगे। उनके लिए यह यात्रा बाबा के दर्शन और जलाभिषेक तक सीमित नहीं, बल्कि पिता और बहनों के साथ बिताया जा रहा एक यादगार आध्यात्मिक अनुभव भी है।

आस्था के साथ बेटी को सम्मान देने का संदेश

संजीव और उनकी 19 बेटियों की यह कांवड़ यात्रा ऐसे समय में सामने आई है, जब समाज में बेटियों की शिक्षा, सम्मान और आत्मनिर्भरता को लेकर लगातार चर्चा होती है। इस यात्रा की तस्वीरें और दृश्य लोगों को इसलिए भी आकर्षित कर रहे हैं, क्योंकि यहां बेटियां सिर्फ परिवार के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल रहीं, बल्कि कठिन धार्मिक यात्रा में अपनी क्षमता और इच्छाशक्ति का परिचय भी दे रही हैं।

सुल्तानगंज से देवघर तक बढ़ते इन कदमों में पिता की चार दशक पुरानी आस्था और बेटियों का उत्साह एक साथ दिखाई दे रहा है। कांवड़ के हर उठते कदम के साथ मानो एक संदेश भी आगे बढ़ रहा है—

परंपरा तभी जीवित रहती है, जब नई पीढ़ी उसे समझे, महसूस करे और अपनी इच्छा से आगे बढ़ाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *