बी के झा
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नई दिल्ली, 5 अक्टूबर
चुनावी राजनीति में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रहा विवाद अब एक नए और बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की मताधिकार को लेकर की गई टिप्पणी के बाद कांग्रेस ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपने हमले को और तेज कर दिया है।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने जस्टिस भुइयां की टिप्पणी को आधार बनाते हुए ज्ञानेश कुमार से तत्काल इस्तीफे की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि जस्टिस भुइयां की टिप्पणी ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और उसके प्रमुख को “बेनकाब” कर दिया है।हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। जस्टिस भुइयां ने अपने भाषण में ज्ञानेश कुमार का नाम लेकर उनके खिलाफ कोई न्यायिक फैसला नहीं सुनाया था। उन्होंने व्यापक संवैधानिक सिद्धांत के तौर पर मताधिकार और बड़े पैमाने पर नागरिकों को मतदान से वंचित करने की स्थिति पर टिप्पणी की थी।
जस्टिस भुइयां ने आखिर कहा क्या?
4 अक्टूबर को हैदराबाद स्थित NALSAR University of Law में आयोजित 19वीं जस्टिस बी.आर. साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने मतदान के अधिकार पर विस्तार से बात की।उन्होंने कहा कि भारतीय नागरिक की पहचान से उसके मतदान के अधिकार को अलग नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक ऐसी कोई प्रक्रिया, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में नागरिक मताधिकार से वंचित हो जाएं, मनमानी होगी और संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 326 के विपरीत होगी।
उन्होंने यह भी कहा कि संविधान नागरिकों को दो वर्गों—मताधिकार रखने वाले और मताधिकार से वंचित नागरिकों—में विभाजित करने की कल्पना नहीं करता।
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं लंबित हैं। हालांकि उन्होंने अपने संबोधन में SIR या निर्वाचन आयोग का नाम लेकर कोई न्यायिक आदेश नहीं दिया था।
कांग्रेस ने पकड़ा राजनीतिक सिरा
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी सामने आते ही कांग्रेस ने इसे राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया।जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि यदि मतदान का अधिकार संविधान की मूल संरचना से जुड़ा है तो मतदाता सूची से जुड़े फैसलों में अत्यधिक सावधानी और संवैधानिक जवाबदेही जरूरी है। उन्होंने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संदर्भ में अपने इस्तेमाल किए जाने वाले “G-2” शब्द का भी प्रयोग किया।
यहीं से विवाद का राजनीतिक आयाम और गहरा हो जाता है।कांग्रेस इसे निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और मताधिकार की लड़ाई के तौर पर पेश कर रही है, जबकि निर्वाचन आयोग SIR को मतदाता सूची को दुरुस्त करने की वैधानिक प्रक्रिया बताता रहा है।
लेकिन क्या जस्टिस भुइयां की टिप्पणी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ फैसला है?
यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न है।
उत्तर फिलहाल ‘नहीं’ है।
जस्टिस भुइयां का वक्तव्य एक संवैधानिक सिद्धांत पर आधारित टिप्पणी था। यह किसी याचिका पर पारित न्यायिक आदेश नहीं था और इसमें CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कोई व्यक्तिगत दोष निर्धारित नहीं किया गया।इसलिए कांग्रेस का यह निष्कर्ष कि जस्टिस भुइयां ने ज्ञानेश कुमार को “बेनकाब” कर दिया, कांग्रेस की राजनीतिक व्याख्या है, अदालत का फैसला नहीं। यह अंतर लोकतांत्रिक विमर्श में बनाए रखना जरूरी है।
आज सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
इस बीच 5 अक्टूबर को CEC ज्ञानेश कुमार से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रूप से उन्हें निलंबित करने की मांग स्वीकार नहीं की। हालांकि अदालत ने केंद्र और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है।याचिका में आरोप लगाया गया है कि SIR से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण निर्णय अन्य निर्वाचन आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। अदालत ने फिलहाल अंतिम निष्कर्ष देने के बजाय संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने SIR के दौरान इस्तेमाल किए जा रहे संशोधित Form-6 को मंजूरी नहीं दी थी।यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ समय में यह धारणा बनने लगी थी कि Form-6 में किए गए बदलावों को सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृति हासिल है।
कानूनविदों के सामने असली सवाल
कानूनी विशेषज्ञों के लिए विवाद का केंद्र किसी व्यक्ति का राजनीतिक समर्थन या विरोध नहीं, बल्कि तीन संवैधानिक प्रश्न हैं—
पहला,–क्या मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया में प्रत्येक पात्र नागरिक को पर्याप्त अवसर और सुनवाई मिलती है?
दूसरा—निर्वाचन आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया कानून और निर्धारित संस्थागत व्यवस्था के अनुरूप है या नहीं?
तीसरा—यदि किसी निर्णय में कानूनी खामी पाई जाती है तो उसका उपचार क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट की आज की कार्यवाही से संकेत यही है कि अदालत फिलहाल आरोपों को अंतिम सत्य मानने के बजाय संबंधित पक्षों का जवाब लेकर आगे बढ़ना चाहती है।
राजनीतिक विश्लेषण: लड़ाई अब ‘वोट’ से आगे ‘विश्वास’ की हो गई
राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर देखें तो SIR विवाद की सबसे बड़ी चुनौती केवल मतदाता सूची नहीं है। असली संकट संस्थाओं पर भरोसे का है।विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलाव राजनीतिक रूप से प्रभावित हो सकते हैं। निर्वाचन आयोग इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता और SIR को मतदाता सूची को व्यवस्थित करने की प्रक्रिया के रूप में देखता है। वहीं अदालत अब यह जांच रही है कि लगाए गए आरोपों में कितना कानूनी आधार है।
इस त्रिकोण—राजनीति, निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका—के बीच एक बात बिल्कुल स्पष्ट है: यदि किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से बाहर होता है तो लोकतंत्र की बुनियाद पर सवाल उठता है; लेकिन यदि बिना प्रमाण किसी संवैधानिक संस्था को कठघरे में खड़ा किया जाता है, तो इससे संस्थागत विश्वास भी कमजोर हो सकता है।
शिक्षाविदों के लिए सबसे बड़ी चिंता युवा मतदाता
इस विवाद का सबसे गहरा प्रभाव युवाओं पर पड़ सकता है।भारत का युवा यदि यह मानने लगे कि उसका वोट सुरक्षित नहीं है या चुनावी संस्थाओं पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो लोकतांत्रिक भागीदारी पर असर पड़ सकता है।लेकिन दूसरी तरफ युवाओं के बीच राजनीतिक असहमति को संस्थाओं के प्रति अविश्वास में बदलना भी लोकतंत्र के लिए चुनौती है।इसलिए विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में इस मुद्दे को राजनीतिक नारे के बजाय संविधान, चुनावी प्रक्रिया, मतदाता अधिकार और संस्थागत जवाबदेही के संदर्भ में समझना अधिक जरूरी है।
समाजसेवी संगठनों की भूमिका भी अहम
नागरिक संगठनों और सामाजिक संस्थाओं के सामने भी अब बड़ी जिम्मेदारी है। यदि कहीं पात्र मतदाता का नाम हटता है तो उसे कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से चुनौती देने में मदद की जाए। यदि किसी मतदाता को दस्तावेज या आपत्ति दर्ज कराने में परेशानी है तो उसकी सहायता की जाए।लोकतंत्र में सबसे मजबूत जवाब सड़क का शोर नहीं, बल्कि दस्तावेज, तथ्य और संवैधानिक प्रक्रिया होते हैं।
क्या संस्थाओं के खिलाफ बढ़ता अविश्वास खतरनाक है?
यही वह बिंदु है जहां इस पूरे विवाद को राजनीतिक आरोपों से ऊपर उठाकर देखना होगा।यह कहना कि किसी संस्था में बैठे सभी लोग किसी वैचारिक खेमे या विदेशी प्रभाव के तहत काम कर रहे हैं, एक गंभीर आरोप है। ऐसे आरोपों के लिए प्रमाण आवश्यक हैं। केवल किसी न्यायिक टिप्पणी, राजनीतिक प्रदर्शन या विपक्षी बयान से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।इसी तरह किसी आंदोलन या राजनीतिक संगठन द्वारा CEC पर तीखा हमला करना अपने आप में देश में अराजकता फैलाने की साजिश साबित नहीं करता। उसके इरादे और प्रभाव का आकलन ठोस गतिविधियों और प्रमाणों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि क्या चुनावी संस्थाओं पर लगातार बढ़ता अविश्वास लोकतांत्रिक स्थिरता के लिए चिंता का विषय बन रहा है?
यह सवाल सरकार, विपक्ष, निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका—चारों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है।
NSK विश्लेषण:
लोकतंत्र में अंतिम शक्ति किसकी?
भारत के लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती हैं, राजनीतिक दल बदलते हैं, नेता बदलते हैं और चुनाव आयोग की पीठ पर बैठे अधिकारी भी बदलते हैं।लेकिन तीन संस्थाएं ऐसी हैं जिनकी विश्वसनीयता लोकतंत्र की रीढ़ है—निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका और संसद।
इसलिए CEC ज्ञानेश कुमार पर लगे आरोपों की जांच होनी चाहिए तो पूरी गंभीरता से हो।
यदि आरोप गलत हैं तो तथ्य सामने आने चाहिए।
यदि कोई निर्णय कानून के विपरीत पाया जाता है तो उसे कानून के मुताबिक सुधारा जाना चाहिए।
इसी तरह न्यायपालिका के किसी न्यायाधीश की टिप्पणी को राजनीतिक हथियार बनाने के बजाय उसके वास्तविक संवैधानिक संदर्भ में समझना चाहिए।
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी ने एक बुनियादी सवाल जरूर सामने रख दिया है—भारत में नागरिक की लोकतांत्रिक पहचान और उसके मताधिकार के बीच रिश्ता कितना मजबूत है?
अब इस सवाल का जवाब नारों से नहीं, संविधान, कानून, पारदर्शिता और प्रमाण से देना होगा।
क्योंकि लोकतंत्र में किसी व्यक्ति का पद स्थायी नहीं होता, लेकिन जनता के वोट की विश्वसनीयता ही पूरी व्यवस्था की वैधता का आधार होती है।
बी. के. झा
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