बी के झा
NSK news India

नई दिल्ली, 5 अक्टूबर
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर चल रही राजनीतिक और संवैधानिक बहस अब सीधे सुप्रीम कोर्ट की भूमिका तक पहुंच गई है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के पदाधिकारी सौरभ दास ने सुप्रीम कोर्ट और मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत पर बेहद तीखी टिप्पणी करते हुए आरोप लगाया है कि बंगाल और बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को आगे बढ़ने देने में अदालत की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
दास ने सोशल मीडिया पोस्ट में CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची का नाम लेते हुए कहा कि अब अदालत चाहे जो कदम उठाए, लोगों की नजर में उसकी विश्वसनीयता प्रभावित हो चुकी है। उन्होंने यहां तक आरोप लगाया कि युवाओं के वोट देने के अधिकार और राज्यों में चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर सवाल उठते हैं।हालांकि, ये CJP के राजनीतिक आरोप हैं, अदालत द्वारा स्थापित तथ्य नहीं।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका और उसके आदेशों का अंतिम मूल्यांकन न्यायिक रिकॉर्ड और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही किया जा सकता है।
SIR बना टकराव का सबसे बड़ा केंद्र
दरअसल, मतदाता सूची के SIR को लेकर पिछले कुछ महीनों में चुनाव आयोग, राजनीतिक दलों और न्यायपालिका के बीच लगातार बहस देखने को मिली है। विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने प्रक्रिया की पारदर्शिता, दस्तावेजों की मांग और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर सवाल उठाए हैं।इसी राजनीतिक माहौल में CJP की ओर से सुप्रीम कोर्ट को लेकर की गई टिप्पणी ने बहस को और तीखा कर दिया है। दास ने आरोप लगाया कि कुछ महत्वपूर्ण याचिकाओं पर समय रहते सुनवाई नहीं हुई और इसका असर देश की राजनीतिक व्यवस्था पर पड़ा।उन्होंने महाराष्ट्र की राजनीतिक परिस्थितियों, दलों में टूट और दिल्ली के संवैधानिक संकट जैसे मुद्दों का भी उल्लेख किया और आरोप लगाया कि इन घटनाक्रमों में भाजपा को राजनीतिक लाभ मिला।
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या न्यायपालिका के फैसलों को राजनीतिक परिणामों के आधार पर परखा जाना चाहिए, या संवैधानिक कसौटियों पर?
राजनीतिक विश्लेषण: असली लड़ाई अदालत बनाम राजनीति नहीं, भरोसे की है
राजनीतिक विश्लेषकों के नजरिए से देखें तो CJP का हमला महज किसी एक न्यायिक आदेश की आलोचना नहीं है। इसके पीछे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, मतदाता सूची की शुचिता और न्यायपालिका की संस्थागत विश्वसनीयता को लेकर बढ़ता अविश्वास दिखाई देता है।
एक पक्ष का तर्क है कि लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाना नागरिक और राजनीतिक अधिकार का हिस्सा है। यदि किसी संस्था के निर्णय से मतदाता अधिकार प्रभावित होने की आशंका है, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
वहीं दूसरा पक्ष यह मानता है कि सुप्रीम कोर्ट की आलोचना करते समय आरोपों और प्रमाणों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
न्यायपालिका के किसी निर्णय से राजनीतिक दल या संगठन असहमत हो सकते हैं, लेकिन अदालत पर ‘मिलीभगत’ जैसे गंभीर आरोप लगाने के लिए ठोस प्रमाण आवश्यक होते हैं।
कानूनविदों के लिए भी बड़ा सवाल—CEC की शक्ति कितनी और कैसे?
CEC ज्ञानेश कुमार के कामकाज को लेकर दाखिल याचिका ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न खड़ा किया है—क्या मुख्य निर्वाचन आयुक्त अकेले ऐसे निर्णय ले सकते हैं, जिनके अधिकार पूरे निर्वाचन आयोग से जुड़े हों?
पटना निवासी राकेश कुमार सिंह की जनहित याचिका में इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की गई है।याचिका में यह निर्देश देने की मांग की गई है कि अंतिम सुनवाई तक CEC ज्ञानेश कुमार मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में काम न करें और इस दौरान आयोग का कामकाज अन्य निर्वाचन आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की सर्वसम्मति से चलाया जाए।याचिका में यह भी अनुरोध किया गया है कि यदि पद रिक्त होता है तो नई नियुक्ति ऐसी समिति की सिफारिश पर हो, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हों।
कानूनी दृष्टि से यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका संबंध केवल किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि निर्वाचन आयोग की संस्थागत संरचना और निर्णय लेने की संवैधानिक व्यवस्था से है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने भी बढ़ाया विवाद
इस बीच इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि पिछले करीब 10 महीनों में निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR से जुड़े कुछ फैसलों पर सवाल उठाए थे।रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर यह आपत्ति जताई कि कुछ फैसले उनकी जानकारी या सिफारिश के बिना लिए गए। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन को पत्र लिखकर वोटर सॉफ्टवेयर से जुड़े सवाल उठाए थे।
हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष इस पूरे विवाद को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
शिक्षाविदों की नजर में—युवाओं का भरोसा सबसे बड़ा मुद्दा
शिक्षाविदों के नजरिए से इस विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू युवा मतदाताओं का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा है।भारत की बड़ी युवा आबादी के लिए मतदान केवल संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी का सबसे प्रत्यक्ष माध्यम है। यदि युवा यह महसूस करने लगे कि मतदाता सूची, चुनाव आयोग या न्यायपालिका की प्रक्रियाओं में पारदर्शिता नहीं है, तो इसका प्रभाव लोकतांत्रिक भागीदारी पर पड़ सकता है।लेकिन इसका समाधान संस्थाओं को कमजोर करना नहीं, बल्कि अधिक पारदर्शिता, स्पष्ट जवाबदेही और तथ्य आधारित सार्वजनिक संवाद है।
समाजसेवी संगठनों के सामने भी चुनौती
सिविल सोसायटी और सामाजिक संगठनों के लिए यह समय बेहद महत्वपूर्ण है। मतदाता सूची में किसी पात्र नागरिक का नाम छूटना हो या किसी अपात्र व्यक्ति का नाम जुड़ना—दोनों ही लोकतंत्र के लिए गंभीर विषय हैं।ऐसे में सामाजिक संगठनों की भूमिका राजनीतिक आरोपों को दोहराने के बजाय जमीनी स्तर पर यह देखने की हो सकती है कि वास्तविक मतदाताओं को दस्तावेज, आपत्ति और सुधार की प्रक्रिया में किसी प्रकार की परेशानी तो नहीं हो रही।
आज सुप्रीम कोर्ट में क्या होगा?
अब निगाहें सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया से जुड़े दो मामलों पर सुनवाई प्रस्तावित है।बताया गया है कि CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ मामले की सुनवाई करेगी।
ऐसे में CJP की तीखी टिप्पणी ने सुनवाई को राजनीतिक रूप से और संवेदनशील बना दिया है। लेकिन असली परीक्षा अदालत की नहीं, लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के भरोसे की है।यदि अदालत याचिकाओं को सुनकर स्पष्ट संवैधानिक दिशा देती है, तो विवाद के कई पहलुओं पर तस्वीर साफ हो सकती है।
यदि याचिकाएं खारिज होती हैं, तो भी अदालत के सामने अपने निर्णय के संवैधानिक आधार को स्पष्ट करने की चुनौती होगी।
NSK विश्लेषण:
सवाल सिर्फ ज्ञानेश कुमार का नहीं
इस पूरे विवाद को केवल ‘CEC बनाम CJP’ या ‘सरकार बनाम विपक्ष’ की लड़ाई मानना शायद समस्या को छोटा करके देखना होगा।
असल सवाल तीन संस्थाओं की विश्वसनीयता से जुड़ा है—निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक राजनीति।
चुनाव आयोग पर सवाल उठेंगे तो जवाब पारदर्शिता से देना होगा।
न्यायपालिका पर सवाल उठेंगे तो जवाब उसके फैसलों और संवैधानिक तर्कों से आएगा।
राजनीतिक दलों पर सवाल उठेंगे तो जनता अपने वोट से जवाब देगी।
CJP का यह कहना कि ‘सुप्रीम कोर्ट जो चाहे करे, फर्क नहीं पड़ता’ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खुद एक गंभीर चेतावनी है। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में अदालत की ताकत केवल उसके आदेश में नहीं होती, बल्कि उस आदेश की जनस्वीकृति और संस्थागत विश्वसनीयता में भी होती है।
यही कारण है कि सोमवार की सुनवाई केवल दो याचिकाओं की सुनवाई नहीं मानी जा रही।
इसके केंद्र में बड़ा सवाल है—क्या देश की चुनावी व्यवस्था और उसके संवैधानिक प्रहरी जनता का भरोसा बनाए रखने में सफल हो रहे हैं?
और इस सवाल का जवाब केवल अदालत में नहीं, आने वाले समय में देश के मतदाताओं और खासकर युवा मतदाताओं के बीच भी दिखाई देगा।
बी. के. झा NSK
