हिजाब बनाम यूनिफॉर्म: इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने फिर खोला धर्म, अधिकार और शिक्षा की मर्यादा का सवाल

बी. के. झा

प्रयागराज/नई दिल्ली

स्कूल की चारदीवारी में धर्म की पहचान कितनी दूर तक साथ चल सकती है और संस्थान की तय मर्यादा कहां से शुरू होती है? इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक ताजा फैसले ने इस पुराने लेकिन संवेदनशील सवाल को फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।

प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल की छात्रा सुकैना रिजवी की याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने कहा कि यदि स्कूल की यूनिफॉर्म समान, निष्पक्ष, गैर-भेदभावपूर्ण और अनुशासन व संस्थागत पहचान बनाए रखने के उद्देश्य से लागू है, तो कोई विद्यार्थी उसमें अपनी ओर से बदलाव को अधिकार के रूप में नहीं मांग सकता।

फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने केवल ‘हिजाब पहनने’ के सवाल पर फैसला नहीं दिया, बल्कि व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत अनुशासन के बीच संतुलन की कसौटी सामने रखी है।

कक्षा छह से पहन रही थी स्कार्फ, 11वीं में पहुंचते ही विवाद

सुकैना ने कक्षा छह से दसवीं तक इसी स्कूल में पढ़ाई की थी और उसके अनुसार वह इस दौरान यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनती रही। स्कूल ने पहले आपत्ति नहीं की। लेकिन कक्षा 11 में दाखिले के समय स्कूल ने निर्धारित ड्रेस कोड का पालन करने को कहा और अतिरिक्त हेडस्कार्फ की अनुमति देने से इनकार कर दिया।

छात्रा की ओर से तर्क दिया गया कि स्कार्फ उसके धार्मिक आचरण का हिस्सा है और इसे रोकना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। स्कूल का पक्ष था कि वह सह-शिक्षा वाला निजी विद्यालय है और सभी विद्यार्थियों के लिए समान ड्रेस कोड लागू है। किसी एक छात्र को अलग छूट देने से अनुशासन और यूनिफॉर्म की मूल भावना प्रभावित होगी।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अतीत में स्कूल द्वारा आपत्ति नहीं जताए जाने से छात्रा को भविष्य में यूनिफॉर्म से अलग होने का कोई स्थायी कानूनी अधिकार हासिल नहीं हो जाता।

अदालत ने कहा—यूनिफॉर्म सिर्फ कपड़ा नहीं, संस्थागत व्यवस्था है

खंडपीठ ने यूनिफॉर्म के पीछे तीन बड़े उद्देश्य गिनाए—अनुशासन, विद्यार्थियों के बीच समानता और संस्थान की पहचान। अदालत के अनुसार एक समान यूनिफॉर्म अलग-अलग धर्मों के विद्यार्थियों के बीच धर्म-निरपेक्ष वातावरण तैयार करने में भी मदद करती है।यही वह बिंदु है जहां फैसला महज ‘हिजाब बनाम यूनिफॉर्म’ का विवाद नहीं रह जाता।

सवाल यह बन जाता है कि यदि हर विद्यार्थी अपनी व्यक्तिगत धार्मिक, सांस्कृतिक या वैचारिक पसंद के आधार पर यूनिफॉर्म में बदलाव की मांग करे तो क्या ‘यूनिफॉर्म’ शब्द का अर्थ ही समाप्त नहीं हो जाएगा?

कानूनविदों के एक वर्ग के मुताबिक अदालत ने इसी संभावित स्थिति को ध्यान में रखते हुए संस्थान की नीति को प्राथमिकता दी है। लेकिन दूसरे दृष्टिकोण से यह भी पूछा जाएगा कि क्या समानता का अर्थ हमेशा एक जैसा पहनावा है, या समानता के भीतर धार्मिक विविधता के लिए सीमित स्थान भी हो सकता है?

‘हिजाब अनिवार्य धार्मिक प्रथा है’—दावे पर अदालत ने मांगा ठोस आधार

मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा है। अदालत ने कहा कि याचिका में ऐसा पर्याप्त तथ्यात्मक या प्रामाणिक धार्मिक आधार पेश नहीं किया गया जिससे यह स्थापित हो कि कक्षा में हेडस्कार्फ पहनना इस्लाम की ऐसी अनिवार्य धार्मिक प्रथा है, जिसके न पालन करने से व्यक्ति की आस्था का मूल स्वरूप प्रभावित हो जाएगा।

खंडपीठ ने 2022 के कर्नाटक हाईकोर्ट के पूर्ण पीठ फैसले का भी उल्लेख किया और कहा कि सुप्रीम कोर्ट में हिजाब विवाद पर विभाजित फैसला आने के बावजूद इस मुद्दे पर अंतिम और सर्वमान्य स्थिति अभी स्पष्ट नहीं हुई है।इसलिए इस फैसले को यह कहकर देखना उचित नहीं होगा कि अदालत ने देशभर के स्कूलों में हिजाब पर कोई सार्वभौमिक प्रतिबंध लगा दिया है।

निर्णय के केंद्र में संबंधित स्कूल की समान ड्रेस नीति और याचिका में धार्मिक अनिवार्यता साबित करने में असफलता है।

मुस्लिम संगठनों के लिए फैसला—धार्मिक स्वतंत्रता की नई बहस

फैसले के बाद मुस्लिम धर्मगुरुओं के एक वर्ग ने असहमति जताते हुए कहा है कि हिजाब धार्मिक आस्था और आचरण का हिस्सा है तथा छात्राओं को स्कूल की निर्धारित वर्दी के साथ इसे पहनने की अनुमति होनी चाहिए।मुस्लिम संगठनों के लिए इस फैसले की बड़ी चिंता यह है कि धार्मिक स्वतंत्रता को केवल ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ की कसौटी से देखने पर व्यक्तिगत आस्था और धार्मिक पहचान के कई पहलू कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकते हैं।

हालांकि, इस बहस में यह अंतर भी महत्वपूर्ण है कि धार्मिक आस्था का सम्मान करना और किसी निजी शैक्षणिक संस्थान की ड्रेस नीति में अनिवार्य छूट देना—दो अलग कानूनी प्रश्न हैं।

हिंदू संगठनों की संभावित दलील—’नियम सबके लिए एक

‘हिंदू संगठनों की ओर से इस फैसले का समर्थन करने वाली प्रमुख दलील यह होगी कि स्कूल में धर्म के आधार पर अलग-अलग ड्रेस कोड लागू होने के बजाय सभी विद्यार्थियों के लिए समान नियम होना चाहिए। उनके अनुसार यूनिफॉर्म का उद्देश्य ही विद्यार्थियों की धार्मिक और सामाजिक पहचान से ऊपर उठकर एक साझा शैक्षणिक पहचान बनाना है।

इस दृष्टिकोण का सबसे मजबूत तर्क यही है—

यदि यूनिफॉर्म वास्तव में समान है और किसी एक धर्म को लक्ष्य बनाकर नहीं बनाई गई है, तो उसका पालन सभी विद्यार्थियों के लिए समान होना चाहिए।लेकिन यहां भी एक संवैधानिक सावधानी जरूरी है। किसी धर्म के प्रतीक को केवल इसलिए निशाना नहीं बनाया जा सकता कि वह अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़ा है। असली कसौटी यह होनी चाहिए कि नियम सभी पर समान रूप से लागू हो रहा है या नहीं।

शिक्षाविद बोले—स्कूल विचारधारा की प्रयोगशाला नहीं, शिक्षा का परिसर है

शिक्षाविदों के लिए इस फैसले का सबसे अहम संदेश यह है कि स्कूलों को बच्चों के बीच धार्मिक प्रतिस्पर्धा का मैदान बनने से बचाना होगा।शिक्षा का मूल उद्देश्य बच्चे को यह सिखाना है कि वह अपनी आस्था के साथ-साथ दूसरे की आस्था का भी सम्मान करे। इसलिए स्कूल प्रशासन के लिए चुनौती केवल यूनिफॉर्म लागू करना नहीं, बल्कि ऐसी संवेदनशील नीति बनाना है जो अनुशासन कायम रखते हुए किसी समुदाय को अपमानित या लक्षित महसूस न होने दे।

यही कारण है कि भविष्य में स्कूलों की ड्रेस नीति में स्पष्टता, पूर्व सूचना और सभी विद्यार्थियों पर समान अनुपालन बेहद महत्वपूर्ण होगा।

कानूनविदों की नजर में असली मुद्दा ‘हिजाब’ नहीं, अधिकारों का टकराव

संवैधानिक कानून के जानकार इस मामले को तीन अधिकारों के बीच संतुलन के रूप में देख सकते हैं—धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शैक्षणिक संस्थान की प्रशासनिक स्वायत्तता।एक तरफ संविधान व्यक्ति को आस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, दूसरी तरफ किसी संस्थान को अपनी शैक्षणिक व्यवस्था और अनुशासन संचालित करने का अधिकार भी है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में संस्थागत अनुशासन को प्राथमिकता दी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार समाप्त हो गया। अदालत ने मूलतः कहा है कि उस अधिकार के आधार पर हर परिस्थिति में निर्धारित यूनिफॉर्म से छूट का दावा स्वतः स्वीकार नहीं किया जा सकता।

सरकार के सामने अब असली चुनौती

उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले में स्कूल के पक्ष का समर्थन किया था और यूनिफॉर्म को संस्थान की नीति का विषय बताया था।सरकार के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि ऐसे संवेदनशील मामलों में वह कानून-व्यवस्था और शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक सौहार्द को भी संतुलित रखे। किसी भी पक्ष की अतिशयोक्तिपूर्ण राजनीतिक व्याख्या विवाद को अदालत से सड़क तक ले जा सकती है।

विपक्ष के लिए भी आसान नहीं सवाल

विपक्षी दलों के सामने भी दुविधा कम नहीं है। यदि वे इसे केवल धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न बनाते हैं तो उन पर तुष्टीकरण का आरोप लग सकता है; और यदि वे बिना शर्त फैसले का समर्थन करते हैं तो उनका अल्पसंख्यक अधिकारों को लेकर राजनीतिक आधार प्रभावित हो सकता है।इसलिए जिम्मेदार राजनीतिक प्रतिक्रिया का रास्ता यही होगा कि अदालत के आदेश का सम्मान हो, लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता और भेदभाव की शिकायतों के संवैधानिक समाधान का रास्ता भी खुला रहे।

सामाजिक संगठनों की भूमिका—फैसले से बड़ी है सामाजिक शांति

समाजसेवी संगठनों के लिए यह मामला चेतावनी भी है। हिजाब, पगड़ी, तिलक, धार्मिक प्रतीक या अन्य सांस्कृतिक पहचान से जुड़े प्रश्नों को यदि राजनीतिक ध्रुवीकरण का हथियार बना दिया गया तो सबसे अधिक नुकसान स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों का होगा।बच्चों को अदालतों और टीवी बहसों के बीच नहीं, कक्षा, किताब और संवाद के बीच अपना भविष्य बनाना है।

दूसरा फैसला भी अहम—मामूली आपराधिक केस से पुलिस नौकरी खत्म नहीं

इसी संदर्भ में इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक अन्य फैसला भी महत्वपूर्ण है, जिसमें अदालत ने कहा कि किसी अभ्यर्थी के खिलाफ पुराने या मामूली आपराधिक मामले की मौजूदगी अथवा उसकी जानकारी फॉर्म में न देने के आधार पर उसे सरकारी सेवा से हटाना हमेशा यांत्रिक ढंग से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

जनमेश कुमार से जुड़े मामले में अदालत ने आपराधिक मामले की प्रकृति, उसकी उम्र और परिस्थितियों को देखते हुए उपयुक्तता के समग्र आकलन पर जोर दिया। यह दृष्टिकोण सुप्रीम कोर्ट के Avtar Singh और Sandeep Kumar जैसे फैसलों में विकसित सिद्धांतों से जुड़ा है।यहां भी अदालत का संदेश वही दिखाई देता है—कानून केवल घटना नहीं देखता, परिस्थिति भी देखता है।

दो फैसले, एक बड़ा संवैधानिक संदेश

एक फैसले में अदालत ने कहा कि धार्मिक पहचान के आधार पर यूनिफॉर्म में स्वतः छूट का अधिकार नहीं बनता। दूसरे में कहा गया कि पुराने मामूली आपराधिक मामले के आधार पर व्यक्ति को बिना समग्र मूल्यांकन के सरकारी सेवा से बाहर करना उचित नहीं।दोनों फैसलों को साथ रखकर देखें तो इलाहाबाद हाईकोर्ट का व्यापक संदेश यही उभरता है कि नियम जरूरी हैं, लेकिन नियमों का इस्तेमाल विवेक और परिस्थिति को नजरअंदाज करके नहीं किया जा सकता।

हिजाब मामले में संस्थान की समानता और अनुशासन को महत्व मिला; पुलिस भर्ती मामले में व्यक्ति की परिस्थितियों और अपराध की प्रकृति को।

निष्कर्ष:

न धर्म जीता, न धर्म हारा—जीता सवाल कि संविधान को कैसे जिया जाए

हिजाब का सवाल भारत में केवल कपड़े का सवाल नहीं है। यह पहचान, आस्था, स्वतंत्रता, समानता और संस्थागत अनुशासन के बीच संतुलन का प्रश्न है।इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फिलहाल तराजू का पलड़ा समान यूनिफॉर्म और संस्थागत अनुशासन की ओर झुकाया है।

लेकिन बहस यहीं समाप्त नहीं होती। आगे यदि यह मुद्दा उच्चतर न्यायिक मंच पर जाता है तो धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत अनुशासन की संवैधानिक सीमा पर और स्पष्टता सामने आ सकती है।

लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि अदालत के फैसले का सम्मान हो, असहमति का अधिकार भी बचा रहे और बच्चों की शिक्षा को धार्मिक-राजनीतिक टकराव का अखाड़ा न बनने दिया जाए।

क्योंकि स्कूल की यूनिफॉर्म का असली उद्देश्य केवल बच्चों को एक जैसा दिखाना नहीं, बल्कि उन्हें यह सिखाना भी है कि अलग होकर भी साथ कैसे रहा जाता है।

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