बी के झा
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पटना/नई दिल्ली, 3 अक्टूबर
बिहार की राजनीति में राष्ट्रीय जनता दल के लिए यह सिर्फ एक कानूनी मामला नहीं, बल्कि नेतृत्व और राजनीतिक नैरेटिव की भी परीक्षा बनता जा रहा है। कथित IRCTC होटल मामले में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने 10 सितंबर को लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव समेत नौ आरोपियों के खिलाफ धनशोधन से जुड़े आरोप तय करने का आदेश दिया था। अदालत ने प्रथम दृष्टया मामले को ट्रायल के लिए आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार माना और अभियोजन की उस दलील को स्वीकार किया कि मामले में ‘मजबूत संदेह’ मौजूद है। वहीं सात आरोपियों को आरोपों से मुक्त भी किया गया।
अब 3 अक्टूबर को अदालत में औपचारिक आरोप पढ़े जाने और आरोपियों से उनका पक्ष पूछा जाना है। इसके बाद मुकदमे की सुनवाई आगे बढ़ेगी। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोप तय होना दोषी ठहराया जाना नहीं है। अंतिम निर्णय ट्रायल के बाद अदालत करेगी। तेजस्वी और उनके परिवार की ओर से आरोपों को खारिज किया जाता रहा है और जांच को राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित बताया गया है। हालांकि, अदालत ने इस स्तर पर राजनीतिक प्रतिशोध वाली दलील को स्वीकार नहीं किया।
तेजस्वी के लिए असली चुनौती अदालत से ज्यादा राजनीतिक नैरेटिव की
तेजस्वी यादव के सामने अब दो समानांतर मोर्चे हैं। पहला—कानूनी लड़ाई और दूसरा—राजनीतिक धारणा की लड़ाई।कानून की नजर में किसी व्यक्ति का आरोपी होना और दोषी साबित होना दो अलग-अलग अवस्थाएं हैं। लेकिन राजनीति में अदालत की हर तारीख अपने साथ एक नया राजनीतिक नैरेटिव लेकर आती है। यदि सुनवाई लंबे समय तक चलती है और तेजस्वी को लगातार अदालत में पेश होना पड़ता है, तो विपक्ष इसे भ्रष्टाचार के आरोपों से जोड़कर उनके खिलाफ अभियान का हिस्सा बना सकता है।
यहीं से ‘ब्रांड तेजस्वी’ की चुनौती शुरू होती है।तेजस्वी ने खुद को लालू प्रसाद की अगली पीढ़ी के नेता के रूप में स्थापित किया है। RJD के भीतर उनकी भूमिका अब केवल लालू परिवार के उत्तराधिकारी तक सीमित नहीं, बल्कि पार्टी के प्रमुख राजनीतिक चेहरे की है। ऐसे में अदालत की कार्यवाही जितनी लंबी चलेगी, उतनी ही बार उनके राजनीतिक विरोधियों को पुराने आरोपों को चुनावी और सार्वजनिक बहस में वापस लाने का अवसर मिलेगा।
क्या आरोप तय होते ही तेजस्वी की राजनीति कमजोर हो जाएगी?
जरूरी नहीं।कानूनविदों के अनुसार आरोप तय होने का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने आरोपी को दोषी मान लिया है। इस चरण के बाद अभियोजन अपने साक्ष्य और गवाह पेश करेगा, बचाव पक्ष को भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा और उसके बाद अदालत अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचेगी।इसलिए राजनीतिक रूप से तेजस्वी की स्थिति का आकलन केवल ‘चार्ज फ्रेम’ के आधार पर करना जल्दबाजी होगी।
लेकिन राजनीति का दूसरा सच यह है कि कानूनी लड़ाई और जनधारणा की लड़ाई एक साथ चलती है।यही वह जगह है जहां RJD के सामने सबसे बड़ी चुनौती है—क्या वह मामले को केवल कानूनी मुद्दा बनाए रख पाएगी या विपक्ष इसे ‘भ्रष्टाचार बनाम नई पीढ़ी की राजनीति’ के सवाल में बदल देगा?
BJP के हमले से बढ़ेगा राजनीतिक दबाव
अदालत के आदेश के बाद BJP ने RJD पर हमला तेज किया है। बिहार BJP अध्यक्ष संजय सरावगी ने आरोप लगाया कि अदालत की कार्रवाई ने RJD से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों पर फिर सवाल खड़े किए हैं। दूसरी ओर RJD ने आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है।
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह भी इस मामले को लेकर लालू परिवार और परिवारवादी राजनीति पर निशाना साध चुके हैं। उनका राजनीतिक तर्क यही है कि अदालत की कार्रवाई ने विपक्षी दलों की कथित भ्रष्टाचार-विरोधी राजनीति पर सवाल खड़े किए हैं।यानी BJP के लिए यह सिर्फ एक अदालती मामला नहीं, बल्कि RJD के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने का अवसर भी है।
महागठबंधन में कांग्रेस के लिए कितना बदल सकता है समीकरण?
यह सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।बिहार में विपक्षी राजनीति का बड़ा हिस्सा लंबे समय से RJD के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। तेजस्वी के कमजोर पड़ने की स्थिति में कांग्रेस और अन्य सहयोगी दल अपने राजनीतिक स्पेस को बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं।लेकिन इसे तत्काल नेतृत्व संघर्ष मानना भी सही नहीं होगा।किसी गठबंधन में नेतृत्व केवल अदालत के किसी एक आदेश से तय नहीं होता। उसके पीछे चुनावी प्रदर्शन, संगठनात्मक ताकत, सामाजिक समीकरण, सीटों पर पकड़ और सहयोगी दलों के बीच स्वीकार्यता जैसे कई कारक काम करते हैं।
फिर भी, यदि IRCTC मामले की सुनवाई लंबी खिंचती है और तेजस्वी की राजनीतिक छवि पर लगातार विपक्षी हमला जारी रहता है, तो महागठबंधन में सीट बंटवारे से लेकर नेतृत्व के सवाल तक पर बातचीत का स्वर बदल सकता है।
RJD में परिवार बनाम पार्टी—क्या भविष्य में उठ सकता है सवाल?
सबसे संवेदनशील सवाल यही है।लालू प्रसाद यादव RJD की राजनीति के केंद्रीय स्तंभ रहे हैं। राबड़ी देवी भी पार्टी की महत्वपूर्ण राजनीतिक हस्ती हैं। लेकिन वर्तमान दौर में तेजस्वी यादव पार्टी की अगली पीढ़ी का प्रमुख चेहरा हैं।ऐसे में यदि कानूनी विवाद लंबे समय तक जारी रहता है, तो RJD के भीतर स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठ सकता है कि पार्टी की राजनीतिक कमान को किस तरह मजबूत रखा जाए।हालांकि, अभी नेतृत्व संघर्ष के किसी निर्णायक रूप से सामने आने का सार्वजनिक प्रमाण नहीं है।इसलिए फिलहाल यह कहना अधिक सटीक होगा कि IRCTC मामला RJD के भीतर नेतृत्व संघर्ष पैदा कर चुका है, यह तथ्य नहीं है; लेकिन लंबी कानूनी प्रक्रिया भविष्य में ऐसा राजनीतिक दबाव पैदा कर सकती है। यही अंतर राजनीतिक विश्लेषण और राजनीतिक अटकल में होता है।
‘लालू मॉडल’ से ‘तेजस्वी मॉडल’ तक की यात्रा की परीक्षा
तेजस्वी यादव के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यह है कि क्या वह अपनी पहचान को केवल लालू प्रसाद के राजनीतिक उत्तराधिकारी से आगे ले जाकर एक स्वतंत्र पीढ़ीगत नेतृत्व के रूप में स्थापित कर पाएंगे।उनके सामने एक ओर RJD का पारंपरिक सामाजिक आधार है, दूसरी ओर युवा नेतृत्व की छवि बनाने की कोशिश।IRCTC मामला इसी दूसरे नैरेटिव को चुनौती देता है।विरोधी दल कहेंगे कि नई पीढ़ी के नेतृत्व को पुराने भ्रष्टाचार के आरोपों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
RJD का जवाब होगा कि आरोपों और दोषसिद्धि में अंतर है तथा राजनीतिक मुकदमों के जरिए नेतृत्व को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।
आखिरकार इस बहस का निर्णायक जवाब अदालत का अंतिम फैसला नहीं बल्कि उससे पहले चलने वाली लंबी कानूनी प्रक्रिया और जनता के बीच बनने वाला राजनीतिक नैरेटिव देगा।
शिक्षाविदों और राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में तीन सवाल
राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर इस पूरे घटनाक्रम से तीन बड़े सवाल निकलते हैं।
पहला—क्या तेजस्वी कानूनी विवाद को अपनी राजनीति पर हावी होने से रोक पाएंगे?
दूसरा—क्या RJD परिवार-केंद्रित नेतृत्व की छवि से आगे निकलकर संगठनात्मक नेतृत्व का ढांचा मजबूत कर पाएगी?
तीसरा—अगर मामला लंबा चलता है तो क्या कांग्रेस और दूसरे सहयोगी दल RJD के मुकाबले अपने राजनीतिक हिस्से की मांग बढ़ाएंगे?
इन तीनों सवालों का जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है।असली लड़ाई अब अदालत और जनता—दोनों के बीच IRCTC मामले ने तेजस्वी यादव के सामने तत्काल कोई दोषसिद्धि या चुनाव लड़ने पर स्वतः रोक जैसी स्थिति पैदा नहीं की है। लेकिन यह जरूर हुआ है कि उनका नाम अब एक लंबे चलने वाले आपराधिक मुकदमे की प्रक्रिया के साथ लगातार सार्वजनिक विमर्श में रहेगा।
अदालत में उन्हें कानूनी प्रक्रिया का सामना करना है।सड़क और चुनावी मैदान में उन्हें राजनीतिक आरोपों का जवाब देना होगा।और RJD के भीतर उन्हें यह साबित करना होगा कि पार्टी की राजनीतिक दिशा किसी एक मुकदमे की तारीखों से तय नहीं होती।यही कारण है कि 3 अक्टूबर की अदालत की कार्यवाही महज एक कानूनी औपचारिकता नहीं मानी जा रही।
यह तेजस्वी यादव के लिए फैसले का दिन नहीं, लेकिन एक लंबे राजनीतिक और कानूनी अध्याय की औपचारिक शुरुआत जरूर है।
अंतिम फैसला अदालत करेगी—लेकिन तब तक बिहार की राजनीति में सवाल चलता रहेगा:
क्या IRCTC का कानूनी साया तेजस्वी की राजनीतिक उड़ान को रोक पाएगा, या RJD इसे एक और राजनीतिक संघर्ष में बदलकर अपने नेतृत्व को और मजबूत करने की कोशिश करेगी?
