CEC नियुक्ति कानून पर सुप्रीम कोर्ट में फिर संग्राम, जज के बेटे का ECI से जुड़ाव बना सवाल; याचिका पर सुनवाई से इनकार, CJI के पास जाने को कहा

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 2 अक्टूबर

मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही संवैधानिक लड़ाई अब न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता से जुड़े सवालों तक पहुंच गई है।

CEC-EC नियुक्ति कानून को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता नमन श्रेष्ठ ने 23 सितंबर के उस आदेश को वापस लेने की मांग की है, जिसके तहत मामले को बड़ी पीठ के समक्ष भेजने का रास्ता खुला था।इस याचिका का जिक्र वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता के समक्ष किया। रिपोर्टों के मुताबिक जस्टिस दत्ता ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि वह इस मामले को मुख्य न्यायाधीश भारत (CJI) जस्टिस सूर्यकांत के समक्ष रखें, क्योंकि वह मास्टर ऑफ द रोस्टर हैं और इस मामले में क्यूरेटिव याचिका भी दायर की गई है।

मामला अब सिर्फ यह नहीं रह गया है कि CEC और EC की नियुक्ति कौन करेगा, बल्कि सवाल यह भी है कि इस संवैधानिक महत्व के मामले की सुनवाई किस प्रक्रिया और किन परिस्थितियों में होनी चाहिए।

विवाद की जड़ में क्या है?

साल 2023 में संसद ने CEC और EC की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित कानून बनाया। इसके तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल हैं।यानी 2023 के कानून ने उस व्यवस्था को बदल दिया, जिसमें 2023 के Anoop Baranwal फैसले के तहत संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और CJI वाली समिति को अंतरिम व्यवस्था के तौर पर नियुक्ति की जिम्मेदारी दी गई थी।

याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क है कि नई व्यवस्था में कार्यपालिका का प्रभाव अधिक है और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया में पर्याप्त संस्थागत संतुलन होना चाहिए।

23 सितंबर को क्यों आया था बंटा हुआ फैसला?

इस पूरे विवाद में 23 सितंबर का सुप्रीम कोर्ट का फैसला बेहद महत्वपूर्ण है।जस्टिस दीपांकर दत्ता ने केंद्र की ओर से मामले को संविधान पीठ के पास भेजने की मांग को स्वीकार नहीं किया। उनका मत था कि पहले के संवैधानिक फैसलों में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के संबंध में सिद्धांत तय हो चुके हैं और मौजूदा कानून की संवैधानिकता पर उन्हीं सिद्धांतों को लागू किया जा सकता है।वहीं जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने अलग राय रखते हुए कहा कि यह महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न है कि संसद ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली चयन समिति में किसी निष्पक्ष सदस्य को शामिल क्यों नहीं किया।

उनके अनुसार यह ऐसा संवैधानिक प्रश्न है जिस पर कम से कम पांच जजों की संविधान पीठ को विचार करना चाहिए।दोनों जजों की राय अलग होने के बावजूद मामला CJI के पास भेजने पर सहमति बनी, ताकि उचित संख्या वाली पीठ का गठन हो सके और मामले की आगे सुनवाई हो।

अब जज के बेटे का ECI से जुड़ाव क्यों बना मुद्दा?

23 सितंबर के फैसले के बाद सामने आई जानकारी के आधार पर याचिकाकर्ता पक्ष ने जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की उस पीठ में मौजूदगी पर सवाल उठाया है। याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया है कि जस्टिस शर्मा के बेटे सिद्धार्थ शर्मा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव आयोग के स्टैंडिंग काउंसल हैं और जुलाई 2024 से ECI की ओर से पेश होते रहे हैं। इस तथ्य का उल्लेख करते हुए याचिका में न्यायिक निष्पक्षता और reasonable apprehension of bias से जुड़े सवाल उठाए गए हैं।

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है—किसी न्यायाधीश के परिजन का किसी संस्था से पेशेवर संबंध होना अपने आप में न्यायिक पक्षपात सिद्ध नहीं करता।

मौजूदा विवाद इस बात पर है कि ऐसी परिस्थिति में क्या न्यायिक मर्यादा और निष्पक्षता की धारणा को देखते हुए न्यायाधीश को उस मामले की सुनवाई से अलग होना चाहिए था। इसका अंतिम निर्धारण संबंधित न्यायिक प्रक्रिया में ही होगा।

याचिकाकर्ता का कहना है कि मामले की पांच सुनवाइयों के दौरान यह तथ्य सामने नहीं आया और उन्हें इसकी जानकारी 23 सितंबर के आदेश के बाद प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों से हुई।

कानूनविदों के लिए असली सवाल: निष्पक्षता सिर्फ होनी चाहिए या दिखाई भी देनी चाहिए?

संवैधानिक कानून के जानकारों के लिए इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू judicial propriety यानी न्यायिक औचित्य है।न्यायपालिका से जुड़े मामलों में केवल वास्तविक निष्पक्षता ही नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियों से बचना भी महत्वपूर्ण माना जाता है जिससे किसी पक्ष को निष्पक्षता पर उचित संदेह पैदा हो सके।

दूसरी ओर, यह भी ध्यान रखना होगा कि जस्टिस शर्मा की 23 सितंबर की राय अपने आप में चुनाव आयोग के पक्ष में किसी अंतिम फैसले के बराबर नहीं थी। उनका मत मुख्यतः इस सवाल पर था कि 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता से जुड़े प्रश्न को संविधान पीठ के समक्ष रखा जाना चाहिए।

केंद्र सरकार का पक्ष क्या रहा है?

केंद्र सरकार ने इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग की थी। सरकार की दलील का आधार यह था कि 2023 के कानून में संसद द्वारा बनाए गए नियुक्ति तंत्र की संवैधानिक वैधता से जुड़े गंभीर प्रश्न हैं और ऐसे प्रश्नों पर संविधान पीठ का विचार आवश्यक है।वहीं जस्टिस दत्ता ने केंद्र की इस मांग को स्वीकार नहीं किया और कहा कि मामले को मौजूदा पीठ द्वारा भी तय किए गए संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर सुना जा सकता है।इस तरह सरकार और याचिकाकर्ताओं के तर्कों के बीच मूल टकराव नियुक्ति प्रक्रिया में संसद की भूमिका बनाम चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता के प्रश्न पर है।

विपक्ष के लिए मुद्दा, लेकिन कानूनी फैसला अभी बाकी

CEC की नियुक्ति व्यवस्था विपक्षी दलों के लिए लंबे समय से राजनीतिक और संवैधानिक बहस का विषय रही है। विपक्षी पक्षों और याचिकाकर्ताओं का तर्क रहा है कि चुनाव आयोग जैसी संस्था की नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार का प्रभाव सीमित रखने के लिए अधिक स्वतंत्र तंत्र होना चाहिए।

दूसरी तरफ, केंद्र का रुख यह है कि संविधान का अनुच्छेद 324(2) संसद को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के संबंध में कानून बनाने का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट के 23 सितंबर के फैसले में भी इस संवैधानिक प्रावधान और Anoop Baranwal फैसले की व्याख्या पर विस्तार से चर्चा हुई।इसलिए राजनीतिक बयानबाजी से अलग कानूनी रूप से सबसे महत्वपूर्ण सवाल अभी यही है—क्या 2023 का कानून संविधान के उस ढांचे के अनुरूप है जो चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्ष चुनाव को सुरक्षित करता है?

शिक्षाविदों और सामाजिक संगठनों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है मामला?

चुनाव आयोग केवल चुनाव कराने वाली संस्था नहीं है। मतदाता सूची, चुनाव कार्यक्रम, आचार संहिता और निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े फैसलों के कारण उसकी संस्थागत विश्वसनीयता लोकतांत्रिक व्यवस्था के केंद्र में है।इसीलिए संवैधानिक कानून से जुड़े शिक्षाविदों और नागरिक समाज के लिए नियुक्ति प्रक्रिया का सवाल केवल CEC की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। इसका संबंध इस व्यापक प्रश्न से है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को किस तरह संस्थागत रूप से सुरक्षित किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनौती देने वाले पक्षों ने भी इसी तर्क पर जोर दिया है कि चुनाव आयोग को कार्यपालिका के विशिष्ट नियंत्रण से सुरक्षित रखना जरूरी है।

अब गेंद CJI सूर्यकांत के पाले में

23 सितंबर के आदेश के बाद मामला पहले ही CJI के पास संविधान पीठ के गठन के लिए पहुंच चुका है। अब नई याचिका ने उसी घटनाक्रम के एक दूसरे पहलू—न्यायिक औचित्य और संभावित हित-संघर्ष—को सामने ला दिया है।

यानी आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट के सामने दो समानांतर प्रश्न महत्वपूर्ण रहेंगे—

पहला: क्या 2023 का CEC-EC नियुक्ति कानून संविधान की कसौटी पर खरा उतरता है?

दूसरा: 23 सितंबर के आदेश को लेकर उठाई गई न्यायिक निष्पक्षता संबंधी आपत्ति पर क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी?

फिलहाल किसी भी पक्ष को अंतिम जीत या हार का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। कानून की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला अभी नहीं आया है और न्यायिक औचित्य से जुड़ी नई आपत्ति भी अभी न्यायिक परीक्षण के अधीन है।

लेकिन इतना स्पष्ट है कि CEC की कुर्सी से शुरू हुआ विवाद अब चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, संसद की कानून बनाने की शक्ति और न्यायपालिका की निष्पक्षता—तीनों को एक ही संवैधानिक बहस के केंद्र में ले आया है।

NSK विशेष, बी. के. झा

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