जंतर-मंतर हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट की समिति का बड़ा कदम, पीड़ितों और पुलिसकर्मियों के लिए खुला शिकायत पोर्टल; गोपनीय रखी जा सकेगी पहचान, प्रभावित लोगों से शिकायतें और प्रतिवेदन मांगे गए।

बी.के. झा, एनएसके विशेष रिपोर्ट

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नई दिल्ली, 18 अक्टूबर

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुई हिंसा और उससे जुड़े घटनाक्रम की जांच को आगे बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने महत्वपूर्ण पहल की है। समिति ने हिंसा से प्रभावित लोगों और पुलिसकर्मियों की शिकायतें सुनने के लिए एक विशेष पोर्टल शुरू किया है। इसका उद्देश्य घटना से जुड़े तथ्यों, आरोपों और प्रत्यक्ष अनुभवों को एकत्र करना तथा सुप्रीम कोर्ट के आदेश में निर्धारित मुद्दों की जांच में सहायता करना है।

अधिकारियों के मुताबिक, प्रभावित लोग hpec.nic.in पोर्टल के माध्यम से अपनी शिकायतें और प्रतिवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। इस व्यवस्था में पुलिसकर्मियों को भी अपनी बात रखने का अवसर दिया गया है। समिति विशेष रूप से पेलेट गन के इस्तेमाल, महिला प्रदर्शनकारियों के कथित उत्पीड़न, किसी भी पक्ष की ओर से अत्यधिक हिंसा और सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से संबंधित मामलों को प्राथमिकता देगी।

इस पहल का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि हिंसक घटनाओं की जांच में अक्सर अलग-अलग पक्षों के आरोप, प्रत्यारोप और परस्पर विरोधी दावे सामने आते हैं। ऐसे में शिकायतों को एक निर्धारित माध्यम से दर्ज कराना, साक्ष्यों को व्यवस्थित करना और प्रभावित लोगों की बात सुनना जांच प्रक्रिया को अधिक व्यापक बनाने में मदद कर सकता है।

पीड़ितों के साथ पुलिसकर्मियों को भी शिकायत का अधिकार

इस पोर्टल की एक अहम विशेषता यह है कि शिकायत दर्ज कराने का अवसर केवल प्रदर्शनकारियों या आम नागरिकों तक सीमित नहीं रखा गया है। घटना के दौरान प्रभावित हुए पुलिसकर्मी भी अपनी शिकायतें और प्रतिवेदन समिति के समक्ष रख सकते हैं। इससे जांच में दोनों पक्षों के अनुभव और आरोप सामने लाने का अवसर मिलेगा।

यदि किसी प्रदर्शनकारी ने पुलिस की कार्रवाई को अनुचित बताया है, तो वह संबंधित घटनाक्रम का विवरण दे सकता है। इसी तरह, यदि किसी पुलिसकर्मी को हिंसा, हमले या अन्य नुकसान का सामना करना पड़ा है, तो वह भी अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है।हालांकि, शिकायत दर्ज होने का अर्थ आरोप सिद्ध होना नहीं है। प्रत्येक शिकायत की विश्वसनीयता, उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित परिस्थितियों के आधार पर जांच की आवश्यकता होगी। जांच की निष्पक्षता इसी में है कि किसी भी पक्ष को पहले से दोषी मानने के बजाय सभी प्रासंगिक तथ्यों की पड़ताल की जाए।

पेलेट गन के इस्तेमाल और अत्यधिक बल प्रयोग की होगी पड़ताल

समिति ने जिन मामलों को प्राथमिकता देने की बात कही है, उनमें पेलेट गन के इस्तेमाल और अत्यधिक बल प्रयोग से संबंधित शिकायतें विशेष महत्व रखती हैं।ऐसे मामलों में यह जांचना आवश्यक हो सकता है कि बल प्रयोग किन परिस्थितियों में किया गया, उसका आधार क्या था, क्या वह परिस्थितियों के अनुपात में था और उससे किसी व्यक्ति को चोट या अन्य नुकसान पहुंचा। यदि किसी शिकायत में पेलेट गन के इस्तेमाल का आरोप है, तो संबंधित रिकॉर्ड, चिकित्सकीय दस्तावेजों, वीडियो और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण महत्वपूर्ण हो सकता है।इसी प्रकार, महिला प्रदर्शनकारियों के कथित उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतों की जांच करते समय संबंधित व्यक्तियों की सुरक्षा, सम्मान और गोपनीयता का ध्यान रखना आवश्यक होगा।समिति की ओर से इन मुद्दों को प्राथमिकता देना इस बात को रेखांकित करता है कि जांच का दायरा केवल हिंसा की सामान्य घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि बल प्रयोग के तरीके और उसके परिणामों से जुड़े आरोप भी उसके विचार के दायरे में हैं।

संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामलों पर भी नजर

हिंसा के दौरान सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाए जाने की शिकायतें भी जांच के प्राथमिकता वाले विषयों में शामिल हैं।ऐसे मामलों में नुकसान की प्रकृति, घटनास्थल की परिस्थितियां, उपलब्ध वीडियो फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य संबंधित साक्ष्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं। समिति को यह देखना होगा कि प्रस्तुत शिकायतों और साक्ष्यों से क्या तथ्य सामने आते हैं।यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिंसक घटनाओं के बाद नुकसान की जिम्मेदारी को लेकर अक्सर अलग-अलग पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं। ऐसे में तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय करना ही निष्पक्ष जांच का आधार बन सकता है।

संवेदनशील गवाहों की सुरक्षा, पहचान गोपनीय रखने की सुविधा

पोर्टल को इस तरह तैयार किए जाने की जानकारी दी गई है कि संवेदनशील गवाहों की सुरक्षा का ध्यान रखा जा सके और प्रभावित लोग अपनी पहचान गोपनीय रखने का विकल्प चुन सकें।हिंसा से संबंधित मामलों में कई लोग संभावित दबाव, सामाजिक प्रतिक्रिया या अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हो सकते हैं। ऐसे में गोपनीयता की व्यवस्था उन्हें अपनी बात सामने रखने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है।हालांकि, शिकायत दर्ज करने से पहले पोर्टल पर उपलब्ध गोपनीयता संबंधी निर्देशों और प्रक्रिया को ध्यान से पढ़ना जरूरी होगा।

पहचान गोपनीय रखने का विकल्प किस सीमा तक लागू होगा और शिकायतकर्ता की जानकारी का इस्तेमाल किस प्रकार किया जाएगा, इसकी पुष्टि संबंधित पोर्टल के आधिकारिक निर्देशों से की जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के दायरे में होगी जांच

उच्चाधिकार प्राप्त समिति का कार्य सुप्रीम कोर्ट के आदेश में निर्धारित मुद्दों की जांच करना है। इसलिए पोर्टल पर प्राप्त शिकायतों और प्रतिवेदनों का परीक्षण उसी दायरे में किया जाना अपेक्षित है।इस प्रक्रिया से प्रभावित लोगों को अपनी बात रखने का एक औपचारिक माध्यम मिलेगा। साथ ही, समिति को विभिन्न पक्षों के दावों और उपलब्ध साक्ष्यों का तुलनात्मक मूल्यांकन करने में सहायता मिल सकती है।फिर भी, पोर्टल शुरू होने को किसी पक्ष के खिलाफ निष्कर्ष या दोष सिद्ध होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। जांच के नतीजे शिकायतों की प्रकृति, साक्ष्यों और समिति की पड़ताल पर निर्भर करेंगे।

एनएसके विश्लेषण:

हिंसा की जांच में निष्पक्षता ही सबसे बड़ी कसौटी

जंतर-मंतर हिंसा से जुड़े मामलों में शिकायत पोर्टल की शुरुआत जांच प्रक्रिया को व्यवस्थित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्देश्य प्रभावित लोगों और पुलिसकर्मियों को अपनी बात रखने का अवसर देना तथा उन आरोपों की पड़ताल में सहायता करना है, जिनका उल्लेख सुप्रीम कोर्ट के आदेश में किया गया है।इस प्रक्रिया की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि कितनी शिकायतें दर्ज हुईं।

असली कसौटी यह होगी कि शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो, संवेदनशील गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तथ्यों को सामने लाया जाए।

न्याय का तकाजा है कि न तो किसी प्रदर्शनकारी की शिकायत को पूर्वाग्रह के आधार पर खारिज किया जाए और न ही किसी पुलिसकर्मी के आरोप को बिना जांच के सही या गलत मान लिया जाए।

प्रत्येक मामले का मूल्यांकन तथ्यों और लागू कानून के आधार पर होना चाहिए।

अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि समिति शिकायतों के परीक्षण के दौरान किन तथ्यों को सामने लाती है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है।

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