कर्नाटक में आरक्षण की सियासत को हाईकोर्ट का बड़ा झटका, SC-ST कोटे में बढ़ोतरी वाला कानून असंवैधानिक करार; 56% आरक्षण पर उठे संवैधानिक सवाल; डिप्टी सीएम जी. परमेश्वर ने फैसले को गंभीर बताते हुए भाजपा और केंद्र सरकार की जवाबदेही पर उठाए सवाल

बी. के. झा . NSK DELHI – बड़ी खबर: विशेष राजनीतिक-न्यायिक विश्लेषण

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नई दिल्ली/बेंगलुरु, 13 अक्टूबर

आरक्षण केवल सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में सीटों के बंटवारे का सवाल नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, ऐतिहासिक वंचना और संविधान में निहित समान अवसरों की अवधारणा से भी जुड़ा है। लेकिन जब आरक्षण की सीमा और उसे बढ़ाने के लिए अपनाए गए संवैधानिक रास्ते पर सवाल उठते हैं, तो बहस अदालत की चौखट से निकलकर सीधे राजनीति के केंद्र में पहुंच जाती है। कर्नाटक में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में बढ़ोतरी से जुड़े वर्ष 2022 के कानून के अहम प्रावधानों को असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया है। अदालत के इस फैसले ने राज्य में आरक्षण की व्यवस्था, पिछली भाजपा सरकार के निर्णयों और मौजूदा राजनीतिक जवाबदेही को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।

मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और न्यायमूर्ति के. एस. हेमलेखा की पीठ ने स्पष्ट किया कि आरक्षण की कुल सीमा को 50 प्रतिशत से आगे बढ़ाने वाला संबंधित प्रावधान संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। अदालत ने कानून की धारा 3 को संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के उल्लंघन से जुड़ा माना, जबकि धारा 4 को अनुच्छेद 14 और 16 के प्रतिकूल ठहराते हुए निरस्त कर दिया। धारा 4 के तहत राज्य सरकार की सेवाओं में SC और ST समुदायों के लिए आरक्षण बढ़ाने का प्रावधान किया गया था।अदालत के इस फैसले का सबसे अहम पहलू यह है कि सामाजिक न्याय के उद्देश्य और उसे हासिल करने के लिए अपनाए गए कानूनी उपायों के बीच संवैधानिक कसौटी की अहमियत एक बार फिर सामने आई है। हालांकि, फैसले के व्यावहारिक प्रभाव, इसके लागू होने की स्थिति और आगे की कानूनी प्रक्रिया को समझने के लिए अदालत के विस्तृत आदेश तथा राज्य सरकार के अगले कदमों पर भी नजर रखनी होगी।

50 प्रतिशत की सीमा बनाम सामाजिक न्याय: फिर आमने-सामने दो संवैधानिक सवाल

कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के केंद्र में आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा है। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1992 में इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार मामले में सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत निर्धारित की थी। इस फैसले ने देश में आरक्षण संबंधी नीतियों और उनके संवैधानिक औचित्य के लिए एक महत्वपूर्ण आधार तैयार किया।हालांकि, आरक्षण से जुड़े संवैधानिक विवादों में केवल प्रतिशत का आंकड़ा ही निर्णायक नहीं होता। संबंधित प्रावधानों का कानूनी आधार, उनके समर्थन में प्रस्तुत सामग्री और लागू न्यायिक सिद्धांत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इसी कारण आरक्षण की सीमा से संबंधित हर विवाद का मूल्यांकन उसके विशिष्ट कानूनी तथ्यों के आधार पर किया जाता है।कर्नाटक में सरकार ने SC और ST समुदायों के लिए आरक्षण बढ़ाने का फैसला लिया था। इस कदम के पीछे इन समुदायों को अधिक प्रतिनिधित्व और अवसर उपलब्ध कराने का उद्देश्य बताया गया। लेकिन कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं में इसकी संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए। हाईकोर्ट का ताजा फैसला इसी विवाद का महत्वपूर्ण पड़ाव है।

यहां एक बुनियादी सवाल भी सामने आता है—क्या सामाजिक रूप से वंचित समुदायों के लिए आरक्षण बढ़ाने का उद्देश्य अपने आप किसी कानून को संवैधानिक बना देता है? अदालत के फैसले से यही स्पष्ट होता है कि उद्देश्य के साथ-साथ उस उद्देश्य को लागू करने का कानूनी तरीका भी संविधान की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।

आखिर 56 प्रतिशत तक कैसे पहुंचा था आरक्षण?

कर्नाटक में आरक्षण बढ़ाने की प्रक्रिया तत्कालीन मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के कार्यकाल में आगे बढ़ी थी। वर्ष 2022 के कानून के माध्यम से अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और अनुसूचित जनजातियों के लिए 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत करने का प्रावधान किया गया था।इस बदलाव के बाद राज्य में SC, ST और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से बढ़कर 56 प्रतिशत हो गया था। विधेयक को 11 जनवरी 2023 को राज्यपाल की मंजूरी मिली और 12 जनवरी 2023 को इसे कर्नाटक राजपत्र में प्रकाशित किया गया। इसके बाद कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए दो याचिकाएं दायर की गईं।

इन्हीं याचिकाओं पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने संबंधित प्रावधानों को निरस्त करने का फैसला सुनाया।इस घटनाक्रम का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है, क्योंकि आरक्षण में बढ़ोतरी का निर्णय भाजपा सरकार ने लिया था, जबकि अब उसके कानूनी आधार पर अदालत ने सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, किसी कानून को अदालत में असंवैधानिक ठहराया जाना और उसके पीछे की राजनीतिक मंशा पर अंतिम निष्कर्ष निकालना दो अलग-अलग बातें हैं। राजनीतिक जवाबदेही का आकलन कानून बनाने की प्रक्रिया, उपलब्ध तथ्यों और सरकार के फैसलों के आधार पर किया जाना चाहिए।

SC-ST समुदायों पर क्या पड़ सकता है असर?

आरक्षण में बढ़ोतरी का उद्देश्य SC और ST समुदायों के लिए शिक्षा तथा सरकारी सेवाओं में अवसरों का विस्तार करना था। ऐसे में इस कानून के अहम प्रावधानों का निरस्त होना स्वाभाविक रूप से सामाजिक और राजनीतिक चिंता का विषय बन सकता है।फिर भी यह समझना जरूरी है कि हाईकोर्ट के फैसले का वास्तविक प्रभाव किन नियुक्तियों, दाखिलों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर पड़ेगा, यह संबंधित आदेश, उसके क्रियान्वयन और राज्य सरकार के अगले कदमों पर निर्भर करेगा। केवल फैसले की घोषणा के आधार पर यह मान लेना उचित नहीं होगा कि पहले से पूरी हो चुकी सभी नियुक्तियां या प्रवेश स्वतः निरस्त हो जाएंगे।

राज्य सरकार के सामने अब कानूनी विकल्पों का परीक्षण करने, फैसले के प्रभावों का आकलन करने और जरूरत पड़ने पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया अपनाने जैसी चुनौतियां हो सकती हैं। यदि सरकार इस फैसले को उच्चतर अदालत में चुनौती देने का निर्णय लेती है, तो मामले की आगे की दिशा न्यायिक आदेशों पर निर्भर करेगी।इसलिए इस विवाद को केवल आरक्षण का प्रतिशत घटने या बढ़ने की खबर के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके केंद्र में यह प्रश्न भी है कि सामाजिक न्याय की नीतियों को संवैधानिक रूप से टिकाऊ कैसे बनाया जाए, ताकि उनके लाभार्थियों के हितों की रक्षा भी हो और कानूनी अनिश्चितता भी कम हो।

जी. परमेश्वर का भाजपा पर हमला, केंद्र की भूमिका पर भी उठाए सवाल

हाईकोर्ट के फैसले के बाद कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने इसे गंभीर मामला बताया। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण में वृद्धि को रद्द किए जाने का राज्य में सामाजिक न्याय, शैक्षणिक अवसरों और सरकारी नौकरियों पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।परमेश्वर ने न्यायपालिका और संवैधानिक व्यवस्था के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए पूर्ववर्ती भाजपा सरकार की राजनीतिक जवाबदेही तथा केंद्र की भाजपा-नीत सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए।उनका कहना था कि राज्य में आरक्षण बढ़ाने से जुड़ा मामला केवल कानूनी विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ उन समुदायों के अवसरों का सवाल भी जुड़ा है, जिनके प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया था।

परमेश्वर की प्रतिक्रिया से साफ है कि कांग्रेस इस फैसले को भाजपा सरकार के पूर्ववर्ती निर्णयों और केंद्र की भूमिका के संदर्भ में राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर सकती है। दूसरी ओर, कानून की संवैधानिक वैधता का अंतिम निर्धारण न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसलिए राजनीतिक आरोपों और अदालत के निष्कर्षों के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है।

भाजपा के लिए असहज सवाल, कांग्रेस के सामने भी चुनौती

कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला भाजपा के लिए राजनीतिक असहजता पैदा कर सकता है, क्योंकि आरक्षण बढ़ाने वाला कानून उसी की सरकार के कार्यकाल में पारित हुआ था। अब सवाल उठना स्वाभाविक है कि कानून तैयार करते समय संवैधानिक सीमाओं और न्यायिक दृष्टांतों का आकलन किस तरह किया गया था।लेकिन कांग्रेस के सामने भी चुनौती कम नहीं है। सत्ता में रहते हुए उसे यह तय करना होगा कि वह SC और ST समुदायों के लिए आरक्षण बढ़ाने के अपने राजनीतिक वादों और सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता को किस तरह संवैधानिक रूप से टिकाऊ उपायों में बदलती है।

आरक्षण का मुद्दा कर्नाटक सहित देश के अनेक राज्यों में सामाजिक प्रतिनिधित्व, चुनावी राजनीति और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा रहा है। ऐसे में इस फैसले पर होने वाली राजनीतिक बयानबाजी के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही रहेगा कि प्रभावित समुदायों के हितों की रक्षा कानून के दायरे में किस प्रकार की जा सकती है।

निष्कर्ष:

आरक्षण पर बहस जारी, संवैधानिक रास्ता तलाशना होगा

कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला आरक्षण नीति को लेकर चल रही व्यापक बहस में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। एक ओर SC और ST समुदायों को अधिक अवसर देने की मांग है, तो दूसरी ओर आरक्षण की सीमा, समानता के संवैधानिक सिद्धांतों और कानून की वैधता से जुड़े प्रश्न हैं।

इस मामले में किसी भी राजनीतिक दल के लिए केवल आरोप-प्रत्यारोप पर्याप्त नहीं होंगे। सरकार को अदालत के आदेश का अध्ययन कर अपने कानूनी विकल्पों पर विचार करना होगा और यह स्पष्ट करना होगा कि सामाजिक न्याय के उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए वह कौन-सा संवैधानिक रास्ता अपनाना चाहती है।

कर्नाटक का यह विवाद एक बड़ा सवाल छोड़ता है—सामाजिक न्याय की मंजिल तक पहुंचने के लिए बनाई गई नीतियां कितनी प्रभावी हैं, और क्या उनका कानूनी आधार इतना मजबूत है कि वे अदालत की कसौटी पर भी टिक सकें?

फिलहाल, हाईकोर्ट के फैसले ने आरक्षण की सीमा और उसके संवैधानिक औचित्य पर बहस को फिर केंद्र में ला दिया है।

आगे की दिशा राज्य सरकार की कानूनी रणनीति, विस्तृत न्यायिक आदेश और संभावित आगामी कार्यवाही से तय होगी।

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