केरल के ‘लेफ्ट गढ़’ में ABVP का क्लीन स्वीप, 40 साल बाद बदला छात्रसंघ का सियासी समीकरण, SFI के लंबे दबदबे का अंत, नगर निकाय में BJP की सफलता के बाद कैंपस में भी बड़ा बदलाव

बी के झा

NSK news Ind

तिरुवनंतपुरम, 22 सितंबर

केरल की कैंपस राजनीति से निकला एक छात्रसंघ चुनाव परिणाम अब व्यापक राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। त्रिपुनिथुरा गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने छात्रसंघ चुनाव में सभी 12 सामान्य सीटों पर जीत दर्ज कर स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) के चार दशक पुराने प्रभाव को चुनौती देते हुए पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया है। पिछले चुनाव में बहुमत हासिल करने के बाद इस बार ABVP का प्रदर्शन क्लीन स्वीप में बदल गया।यह वही कॉलेज है जिसे लंबे समय से SFI के प्रभाव वाले परिसरों में गिना जाता रहा है। ऐसे में एक चुनाव में सभी सामान्य सीटों का एक संगठन के खाते में जाना महज पदों की अदला-बदली नहीं, बल्कि स्थानीय कैंपस राजनीति में संगठनात्मक समीकरण बदलने का संकेत है।

चार दशक की पकड़ टूटी, ABVP ने बनाई पूरी पकड़

त्रिपुनिथुरा गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज में SFI का लंबे समय से प्रभाव रहा है। इस बार ABVP ने पिछले चुनाव की अपनी बढ़त को आगे बढ़ाते हुए सभी 12 सामान्य सीटें अपने नाम कर लीं।ABVP के लिए यह परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संगठन पिछले चुनाव में बहुमत तक पहुंचा था और अब उसने अगले चुनाव में अपनी स्थिति को पूर्ण बहुमत में बदल दिया। यानी कैंपस में उसका विस्तार अचानक नहीं, बल्कि लगातार दो चुनावों में दिखाई देने वाली प्रक्रिया के रूप में सामने आया है।

कौन-कौन जीता?

चुनाव में ABVP से जुड़े उम्मीदवारों ने छात्रसंघ के विभिन्न पदों पर जीत हासिल की।

स्निग्धा एम. हरि — चेयरपर्सन

आदित्य टी. ए. — वाइस चेयरपर्सन

विग्नेश भट्ट — जनरल सेक्रेटरी-

विग्नेश डी. — मैगजीन एडिटर

अंजलि टी. — आर्ट्स क्लब सेक्रेटरी

निवेद्या के. एन. — यूनिवर्सिटी यूनियन काउंसलर

शिवानी आर. — सेकंड यूजी रिप्रेजेंटेटिव-

अवनी सी. बी. — सेकंड पीजी रिप्रेजेंटेटिवइन पदों पर ABVP समर्थित उम्मीदवारों की जीत ने संगठन को कैंपस की निर्णय प्रक्रिया में व्यापक प्रतिनिधित्व दिया है।

ABVP ने SFI के कामकाज पर उठाए सवाल

चुनाव परिणाम के बाद ABVP ने इसे छात्रों की प्राथमिकताओं में बदलाव के रूप में पेश किया है। संगठन की ओर से SFI की पिछली यूनियनों पर ‘छात्र-विरोधी नीतियों’ का आरोप लगाया गया।ABVP ने यह भी आरोप लगाया कि पिछले कार्यकाल में संस्कृत से जुड़ी गतिविधियों को पर्याप्त बढ़ावा नहीं दिया गया, छात्रों से एकत्र किए गए फंड के इस्तेमाल पर सवाल उठाए और पर्याप्त छात्र कार्यक्रम नहीं होने का दावा किया।हालांकि ये ABVP के आरोप और राजनीतिक आकलन हैं; उपलब्ध रिपोर्टों में इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

नगरपालिका के बाद कैंपस में भी बदला समीकरण

त्रिपुनिथुरा में छात्रसंघ चुनाव का यह परिणाम स्थानीय राजनीति में हुए एक बड़े बदलाव के कुछ ही समय बाद सामने आया है।2025 के स्थानीय निकाय चुनाव में BJP त्रिपुनिथुरा नगरपालिका में 53 में से 21 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि LDF को 20 और UDF को 12 सीटें मिलीं। इसके बाद BJP ने नगरपालिका में चेयरपर्सन और वाइस चेयरपर्सन के पद हासिल किए। यह पहली बार था जब BJP ने त्रिपुनिथुरा नगरपालिका का नेतृत्व संभाला।यही वजह है कि अब कैंपस का यह नतीजा भी स्थानीय राजनीतिक घटनाक्रम के संदर्भ में देखा जा रहा है।

हालांकि नगरपालिका चुनाव और कॉलेज छात्रसंघ चुनाव अलग-अलग चुनाव हैं और इनके नतीजों को सीधे पूरे क्षेत्र या केरल के मतदाताओं की राजनीतिक पसंद का प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा।

स्निग्धा एम. हरि बोलीं—छात्रहित हमारी प्राथमिकता

नवनिर्वाचित चेयरपर्सन स्निग्धा एम. हरि ने कहा कि केरल से लेकर देश की राजनीति तक बदलाव दिखाई दे रहा है और नागरिकों तथा छात्रों के बीच नई ऊर्जा और सोच पैदा होना महत्वपूर्ण है।उन्होंने कहा कि उनकी प्राथमिकता फिलहाल राजनीतिक बयानबाजी से अधिक कॉलेज के छात्रों के हितों से जुड़े काम करना है। उनके मुताबिक छात्रसंघ को ऐसे काम करने चाहिए जिनका सीधा लाभ विद्यार्थियों को मिले।केरल के कैंपस में बढ़ेगी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा?

केरल की छात्र राजनीति में SFI लंबे समय से प्रभावशाली संगठनों में रहा है। ऐसे माहौल में त्रिपुनिथुरा जैसे कॉलेज में ABVP का बहुमत से क्लीन स्वीप तक पहुंचना संगठन के लिए महत्वपूर्ण संगठनात्मक उपलब्धि है।

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में भी ABVP ने चार में से तीन केंद्रीय पद जीते हैं, जबकि उपाध्यक्ष पद निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गया। ऐसे में अलग-अलग परिसरों के चुनाव परिणामों ने देश की छात्र राजनीति में विभिन्न संगठनों के बीच प्रतिस्पर्धा को फिर चर्चा में ला दिया है।त्रिपुनिथुरा में हालांकि तस्वीर अलग मायने रखती है। यहां चुनौती सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं थी, बल्कि ऐसे कैंपस में संगठनात्मक आधार मजबूत करने की थी जहां SFI का लंबा प्रभाव रहा है।

अब असली परीक्षा जीत के बादABVP के लिए यह परिणाम निश्चित तौर पर संगठनात्मक विस्तार का अवसर लेकर आया है। लेकिन चुनाव जीतना एक चरण है और छात्रसंघ चलाना दूसरा।अब निगाह इस बात पर होगी कि नई यूनियन छात्र सुविधाओं, अकादमिक गतिविधियों, संस्कृत अध्ययन, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, छात्र कल्याण और कॉलेज की रोजमर्रा की समस्याओं पर कितना काम करती है।त्रिपुनिथुरा का यह परिणाम इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि यहां पहले बहुमत, फिर क्लीन स्वीप का क्रम दिखाई दिया है। इससे केरल के दूसरे परिसरों में ABVP को संगठन विस्तार के लिए उत्साह मिल सकता है। लेकिन क्या यह बदलाव व्यापक कैंपस राजनीति में स्थायी रूप लेगा, इसका जवाब आने वाले छात्रसंघ चुनाव और संगठन के जमीनी प्रदर्शन से ही मिलेगा।

एनएसके विश्लेषण

त्रिपुनिथुरा की कहानी को सिर्फ ‘ABVP बनाम SFI’ की जीत-हार के रूप में पढ़ना अधूरा होगा। असली कहानी यह है कि चार दशक से एक छात्र संगठन के प्रभाव वाले परिसर में दूसरी ताकत ने पहले बहुमत हासिल किया और अगले ही चुनाव में सभी सामान्य सीटें जीत लीं।

यही लगातार बदलता कैंपस समीकरण अब केरल की छात्र राजनीति में नई प्रतिस्पर्धा की जमीन तैयार कर सकता है।

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