बी के झा
NSK news Ind

पटना, 4 अक्टूबर
बिहार की राजनीति में गठबंधन सिर्फ सीटों का जोड़ नहीं होता, बल्कि यह राजनीतिक प्रभाव, संगठन और जमीन पर पकड़ का भी इम्तिहान होता है। ऐसे समय में राजद के कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव का MLC चुनाव को लेकर दिया गया बयान महागठबंधन के भीतर कांग्रेस की स्थिति पर नए सवाल खड़े करता है।राजद की चार सीटों पर कांग्रेस द्वारा प्रत्याशी उतारे जाने के सवाल पर तेजस्वी यादव ने कहा कि कांग्रेस के अलग चुनाव लड़ने से नतीजों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। उन्होंने दावा किया कि पिछली बार की तरह इस बार भी राजद की जीत होगी।
सियासत में एक बयान कई संदेश छोड़ जाता है।
तेजस्वी का यह बयान केवल चुनावी आत्मविश्वास है या इसके पीछे बिहार में कांग्रेस की राजनीतिक ताकत को लेकर राजद का आकलन भी छिपा है?
यही सवाल अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।
क्या कांग्रेस की चुनौती को RJD गंभीरता से नहीं ले रही?
तेजस्वी के बयान की राजनीतिक व्याख्या करें तो इसका सीधा संदेश यही निकलता है कि राजद को भरोसा है कि कांग्रेस के अलग मैदान में उतरने से उसके चुनावी समीकरण पर निर्णायक असर नहीं पड़ेगा।यानी राजद मानकर चल रही है कि कांग्रेस अपने उम्मीदवार उतार तो सकती है, लेकिन उसके पास इतना प्रभाव नहीं है कि वह RJD के मजबूत चुनावी आधार को नुकसान पहुंचा सके।
यह बात कांग्रेस के लिए इसलिए असहज करने वाली है क्योंकि जिस पार्टी के साथ वह बिहार में लंबे समय से राजनीतिक साझेदारी निभाती रही है, उसी गठबंधन के सबसे बड़े सहयोगी दल के शीर्ष नेता अब उसके अलग चुनाव लड़ने को नतीजों के लिहाज से लगभग महत्वहीन बता रहे हैं।
बड़ा सवाल यही है—क्या बिहार में कांग्रेस इतनी कमजोर हो चुकी है कि उसके अकेले लड़ने से राजद को कोई राजनीतिक नुकसान नहीं होता?
बार-बार क्यों उठता है ‘पिछलग्गू’ का सवाल?
बिहार में राजद और कांग्रेस के रिश्ते पर यह बहस नई नहीं है। कांग्रेस के भीतर भी समय-समय पर यह आवाज उठती रही है कि पार्टी को बिहार में अपने संगठन और राजनीतिक आधार को मजबूत करने के लिए राजद से अलग रास्ता अपनाने पर विचार करना चाहिए।
हालांकि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व अब तक राजद के साथ गठबंधन की राजनीति को बनाए रखने के पक्ष में रहा है।
इसी बीच चुनावी रणनीतिकार और जन सुराज के नेता प्रशांत किशोर ने जुलाई 2025 में बिहार में कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति पर तीखी टिप्पणी करते हुए उसे राजद की ‘पिछलग्गू पार्टी’ बताया था।
कांग्रेस के भीतर भले ही इस शब्द का सार्वजनिक इस्तेमाल करने से नेता बचते रहे हों, लेकिन पार्टी की चुनावी स्थिति और राजद के साथ उसके संबंध को लेकर असंतोष समय-समय पर सामने आता रहा है।
2025 के विधानसभा चुनाव ने बढ़ाई बेचैनी
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कांग्रेस का प्रदर्शन पार्टी के लिए बड़ा झटका रहा। चुनाव परिणाम 14 नवंबर 2025 को सामने आए और कांग्रेस महज 6 सीटों पर सिमट गई।इस हार ने पार्टी के भीतर गठबंधन की रणनीति पर सवाल खड़े किए। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पिछली विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता रहे शकील अहमद खान भी कटिहार के कदवा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए।हार के बाद शकील अहमद खान ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि राजद के साथ गठबंधन ने कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया और पार्टी को अब स्वतंत्र रास्ते पर विचार करना चाहिए।
उनका तर्क था कि कांग्रेस को बिहार में अपनी अलग राजनीतिक पहचान और संगठन खड़ा करने की जरूरत है।उम्मीदवारों की समीक्षा बैठक में भी उठा था सवाल
विधानसभा चुनाव के करीब दस-बारह दिन बाद दिल्ली में कांग्रेस की हार की समीक्षा के लिए बैठक हुई थी। इसमें बिहार चुनाव लड़ने वाले कांग्रेस के उम्मीदवार भी शामिल हुए थे।बैठक में कई नेताओं और उम्मीदवारों ने कथित तौर पर यह राय रखी कि राजद के साथ लगातार चुनावी समझौता कांग्रेस की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को कमजोर कर रहा है।बैठक में यह चिंता भी सामने आई कि गठबंधन की राजनीति के कारण कांग्रेस बिहार में खुद को एक स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के तौर पर स्थापित नहीं कर पा रही है और उसका पारंपरिक जनाधार धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है।
यहीं से कांग्रेस के भीतर एक और महत्वपूर्ण शब्द चर्चा में आया—‘अधीनस्थ सहयोगी’।
इसका राजनीतिक अर्थ साफ था। पार्टी के भीतर एक वर्ग को चिंता है कि अगर कांग्रेस लगातार राजद के सहारे चुनाव लड़ती रही तो बिहार में उसकी पहचान एक स्वतंत्र शक्ति के बजाय राजद की सहयोगी तक सीमित हो सकती है।
कांग्रेस के भीतर असली दुविधा क्या है?
कांग्रेस के सामने समस्या केवल राजद से गठबंधन करने या न करने की नहीं है। असली सवाल यह है कि अगर पार्टी अकेले चुनाव लड़ती है तो क्या उसके पास इतना संगठन, नेतृत्व और जमीनी नेटवर्क है कि वह बिहार में अपने दम पर मुकाबला कर सके?
दूसरी तरफ, अगर वह राजद के साथ रहती है तो सीटों और चुनावी तालमेल का लाभ तो मिल सकता है, लेकिन अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन तैयार करने की उसकी क्षमता पर लगातार सवाल उठते रहेंगे।यही कांग्रेस की सबसे बड़ी रणनीतिक दुविधा है।
एक तरफ बिहार कांग्रेस के कुछ नेता अलग राह की वकालत करते हैं, दूसरी तरफ पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व राजद के साथ गठबंधन को बनाए रखने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई देता है।
हाईकमान की हरी झंडी के सामने प्रदेश नेतृत्व कितना मजबूत?
बिहार कांग्रेस के एक नेता के मुताबिक, अगर पार्टी राज्य में अपना आधार मजबूत कर सकती है तो उसे निश्चित रूप से स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने पर विचार करना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि अंतिम फैसला किसके हाथ में है?
जब गठबंधन से जुड़े बड़े फैसले कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व करता है, तब प्रदेश स्तर के नेताओं की असहमति आखिर कितनी दूर तक प्रभाव डाल सकती है?
यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस का आंतरिक संकट सामने आता है।प्रदेश कांग्रेस के नेता अगर राजद के साथ गठबंधन को नुकसानदेह बताते हैं, लेकिन पार्टी हाईकमान गठबंधन जारी रखने का फैसला करता है, तो प्रदेश नेतृत्व के सामने विकल्प सीमित हो जाते हैं।
MLC चुनाव बना रिश्तों का नया आईना
MLC चुनाव इस पूरे विवाद को एक अलग राजनीतिक मंच दे रहा है।तेजस्वी यादव का यह कहना कि कांग्रेस के अलग लड़ने से चुनाव परिणाम पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा, महज चुनावी बयान मानकर खारिज किया जा सकता है। लेकिन इसके राजनीतिक संकेतों को नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है।
क्योंकि चुनाव में असली ताकत सिर्फ उम्मीदवारों की संख्या से नहीं, बल्कि वोट ट्रांसफर, संगठन, सामाजिक समीकरण और मतदाताओं के बीच स्वीकार्यता से तय होती है।
अगर राजद का आकलन सही साबित होता है और कांग्रेस के अलग उम्मीदवार उतारने के बावजूद RJD अपने प्रभाव को बनाए रखती है, तो यह कांग्रेस की बिहार रणनीति के लिए गंभीर संदेश होगा।
और अगर कांग्रेस अपने दम पर अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन करती है, तो राजद के इस आत्मविश्वास पर भी सवाल उठेंगे।
NSK विश्लेषण:
सवाल कांग्रेस की सीटों का नहीं, राजनीतिक पहचान का है
बिहार MLC चुनाव का यह मुकाबला भले सीमित सीटों का हो, लेकिन इसके राजनीतिक संकेत बड़े हो सकते हैं।तेजस्वी यादव का बयान कांग्रेस के लिए सिर्फ एक चुनावी चुनौती नहीं, बल्कि एक राजनीतिक आईना भी है।
संदेश यह है कि राजद को भरोसा है कि कांग्रेस के अलग लड़ने से उसके चुनावी आधार में कोई बड़ा सेंध नहीं लगेगा।
अब कांग्रेस के सामने दो रास्ते हैं—या तो वह गठबंधन की छतरी के नीचे अपनी सीमित भूमिका स्वीकार करते हुए आगे बढ़े, या फिर बिहार में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन तैयार करने का जोखिम उठाए।
राजनीति में किसी दल की ताकत केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि वह कितनी सीटें जीतता है। उसकी असली ताकत इस बात से तय होती है कि सहयोगी दल उसे कितनी गंभीरता से लेते हैं।
MLC चुनाव में तेजस्वी का बयान इसी कसौटी पर कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है—क्या कांग्रेस बिहार में राजद की साझेदार है, या धीरे-धीरे उसकी राजनीतिक छाया बनती जा रही है?
इस सवाल का जवाब सिर्फ बयान नहीं देगा। जवाब चुनावी नतीजे और उसके बाद बिहार की राजनीति में कांग्रेस की अगली रणनीति देगी।
