UCC पर JDU में उबाल, RJD ने फिर दिया नीतीश को न्योता; 48 घंटे में दूसरी बार RJD का ऑफर, भाई वीरेंद्र बोले- BJP का साथ छोड़ महागठबंधन में लौटें नीतीश; सवाल—क्या UCC फिर बदलेगा बिहार का सियासी समीकरण?

बी के झा

पटना, 17 सितंबर

बिहार की राजनीति में समान नागरिक संहिता यानी UCC अब सिर्फ कानून और संविधान का मुद्दा नहीं रह गया है। यह मुद्दा सत्तारूढ़ NDA के भीतर राजनीतिक असहजता और विपक्ष के लिए नए सियासी अवसर का कारण बनता दिखाई दे रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा NDA शासित राज्यों में 2029 से पहले UCC लागू करने के लक्ष्य की घोषणा के बाद जनता दल यूनाइटेड (JDU) के भीतर से अलग-अलग सुर सामने आए हैं। इसी बीच राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने एक बार फिर महागठबंधन में वापसी का दरवाजा खोल दिया है।

48 घंटे के भीतर दूसरी बार RJD की ओर से नीतीश कुमार को सार्वजनिक तौर पर गठबंधन बदलने का न्योता दिया गया है। मनेर से RJD विधायक भाई वीरेंद्र ने UCC के मुद्दे को आधार बनाते हुए नीतीश कुमार और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष निशांत कुमार से भाजपा के नेतृत्व वाले NDA से अलग होकर तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन सरकार बनाने में सहयोग करने की अपील की।भाई वीरेंद्र ने कहा कि जेडीयू की वैचारिक पृष्ठभूमि समाजवादी आंदोलन से जुड़ी रही है और पार्टी के कई नेताओं के पुराने बयानों से UCC को लेकर उसकी आपत्तियां सामने आती रही हैं।

उन्होंने अमित शाह के UCC संबंधी लक्ष्य को भी सवालों के घेरे में रखा और कहा कि ऐसे संवेदनशील विषय पर व्यापक सहमति जरूरी है।हालांकि, भाई वीरेंद्र ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी जेडीयू के किसी नेता से इस संबंध में बातचीत नहीं हुई है और उनका बयान राजनीतिक सिद्धांतों के आधार पर है।

RJD के ऑफर के पीछे क्या है सियासी गणित?

RJD का यह बयान ऐसे समय आया है जब UCC पर जेडीयू और भाजपा के बीच सार्वजनिक रूप से मतभेद के संकेत दिखाई दे रहे हैं। जेडीयू के वरिष्ठ नेता श्याम रजक ने बिहार में UCC लागू किए जाने का विरोध किया है, जबकि पार्टी के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से इस विषय पर बातचीत की बात कही है।यानी तस्वीर फिलहाल इतनी सीधी नहीं है कि जेडीयू UCC का पूरी तरह विरोध कर रहा है। पार्टी का दूसरा सुर यह है कि पहले विधेयक का ड्राफ्ट और उसके प्रावधान सामने आएं, उनका अध्ययन हो और फिर अंतिम निर्णय लिया जाए।

उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने भी जल्दबाजी में फैसला लेने के बजाय प्रावधानों को देखने की बात कही है।यही वह जगह है जहां बिहार की राजनीति का असली पेच दिखाई देता है। एक तरफ भाजपा UCC को अपने बड़े राजनीतिक एजेंडे के तौर पर आगे बढ़ा रही है, दूसरी तरफ जेडीयू अपने सामाजिक और राजनीतिक आधार को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर सावधानी बरतना चाहता है।

नीतीश की पुरानी लाइन फिर चर्चा में

UCC पर नीतीश कुमार का पुराना रुख भी अब राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। जनवरी 2017 में नीतीश कुमार ने विधि आयोग को लिखे पत्र में कहा था कि UCC जैसे विषय पर जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए और इसे व्यापक सहमति के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने धार्मिक समूहों और संबंधित पक्षों के बीच सहमति की आवश्यकता पर जोर दिया था।यही वजह है कि जेडीयू के कुछ नेता अब पुराने रुख का हवाला दे रहे हैं। उनका तर्क है कि संसद में किसी प्रस्ताव या विधेयक पर पार्टी का रुख और किसी राज्य में उसके क्रियान्वयन का सवाल अलग-अलग हो सकता है।

लेकिन राजनीतिक सवाल इससे आगे का है—अगर केंद्र और भाजपा शासित राज्यों में UCC लागू करने की दिशा में तेजी आती है तो बिहार में जेडीयू कितनी दूर तक अपने वर्तमान रुख पर कायम रह पाएगा?

NDA में बातचीत या राजनीतिक दूरी?

जेडीयू ने फिलहाल NDA छोड़ने का कोई ऐलान नहीं किया है। उलटे, पार्टी की ओर से केंद्रीय नेतृत्व से बातचीत का रास्ता चुना गया है। संजय झा के अमित शाह से मुलाकात करने की बात इसी राजनीतिक संवाद का हिस्सा है।इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि UCC के कारण नीतीश कुमार NDA से अलग होने जा रहे हैं। लेकिन इतना जरूर है कि इस मुद्दे ने NDA के भीतर एक महत्वपूर्ण नीतिगत मतभेद को सार्वजनिक कर दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में असली सवाल

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, UCC का विवाद बिहार में केवल कानून के स्वरूप का सवाल नहीं है। इसके साथ गठबंधन की राजनीति, सामाजिक समीकरण और जेडीयू की अपनी राजनीतिक पहचान भी जुड़ी हुई है।

जेडीयू के लिए चुनौती दोहरी है

भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए उसे NDA की साझा राजनीति के साथ तालमेल बनाए रखना है, वहीं बिहार में अपनी अलग राजनीतिक पहचान और विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच स्वीकार्यता को भी बनाए रखना है।दूसरी ओर RJD इस मतभेद को गठबंधन की राजनीति में अवसर के रूप में देख रहा है। इसलिए नीतीश कुमार को बार-बार महागठबंधन में लौटने का सार्वजनिक निमंत्रण दिया जा रहा है।

आम नागरिकों के बीच भी चर्चा तेज

पटना की राजनीतिक गलियों से लेकर आम चाय दुकानों तक इन दिनों एक सवाल खूब सुनाई दे रहा है—क्या UCC बिहार की राजनीति में एक बार फिर कोई बड़ा मोड़ ला सकता है?

एक युवा नागरिक ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि अगर गठबंधन बदलना ही राजनीति की मजबूरी बन जाए तो जनता के बीच नेताओं की स्थिरता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। उसका कहना था कि बिहार के लोग अब केवल यह नहीं देखते कि कौन किसके साथ है, बल्कि यह भी देखते हैं कि गठबंधन बदलने के पीछे मुद्दा क्या है और उसका असर राज्य की राजनीति पर क्या पड़ेगा।

वहीं शिक्षाविदों का मानना है कि UCC जैसे संवेदनशील विषय को केवल राजनीतिक गठबंधन के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और पारिवारिक कानूनों से जुड़े किसी भी बड़े बदलाव में संविधान, व्यक्तिगत अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक विविधता—सभी पहलुओं पर व्यापक चर्चा जरूरी है।

अब गेंद नीतीश के पाले में?

फिलहाल तीन बातें स्पष्ट हैं।

पहली—भाजपा UCC को लेकर समयसीमा के साथ आगे बढ़ने की बात कर रही है।

दूसरी—जेडीयू ने बिहार में इसके क्रियान्वयन पर आपत्ति जताने वाले नेताओं की आवाज सुनी है, लेकिन पार्टी ने अंतिम फैसला ड्राफ्ट देखने और बातचीत के बाद करने की बात कही है।

तीसरी—RJD इस मतभेद को नीतीश कुमार को NDA से दूर करने के राजनीतिक अवसर के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।

अब असली परीक्षा नीतीश कुमार और जेडीयू की है।

क्या पार्टी NDA के भीतर रहकर UCC पर अपनी शर्तों और आपत्तियों को मनवाने की कोशिश करेगी?

क्या केंद्र के साथ बातचीत के बाद कोई साझा रास्ता निकलेगा?

या UCC आने वाले दिनों में बिहार के गठबंधन की राजनीति का नया ट्रिगर बनेगा?

अभी कोई अंतिम जवाब सामने नहीं है। लेकिन इतना तय है कि UCC ने बिहार में एक बार फिर गठबंधन की राजनीति के पुराने अध्यायों की यादें ताजा कर दी हैं।

RJD ने दरवाजा खोल दिया है, भाजपा अपनी नीति पर आगे बढ़ रही है और जेडीयू बातचीत की राह पर है।

अब बिहार की राजनीति की नजर इस बात पर है कि नीतीश कुमार अगला कदम क्या उठाते हैं।

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