मेरा एनकाउंटर हो सकता है…’ सोनम वांगचुक का बड़ा दावा, अमित शाह के इस्तीफे की मांग; अब उठे बयान की जांच के सवाल; पुलिस ने आरोपों को बताया ‘झूठा और भ्रामक’

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली/लेह, 25 सितंबर लद्दाख में 24 सितंबर

2025 को हुई हिंसा की पहली बरसी पर आंदोलन का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक बहस के केंद्र में आ गया है। जलवायु कार्यकर्ता और लद्दाख के अधिकारों की मांग को लेकर सक्रिय सोनम वांगचुक ने अपनी जान को लेकर गंभीर आशंका जताते हुए दावा किया कि उन्हें चेतावनियां मिल रही हैं कि उनका ‘एनकाउंटर’ किया जा सकता है। साथ ही उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग की और पिछले वर्ष की हिंसा की न्यायिक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग दोहराई।

वांगचुक ने एक सभा में कहा कि उन्हें जेल में डाला गया और अब उन्हें आशंका है कि कहीं उन्हें मुठभेड़ में न मार दिया जाए। उन्होंने कहा कि यदि उनके साथ ऐसा होता है और उससे देश लद्दाख के हालात को लेकर जागता है, तो वह उसके लिए भी तैयार हैं। उनके बयान की रिपोर्ट कई मीडिया संस्थानों ने प्रकाशित की है।

‘अमित शाह इस्तीफा दें’—वांगचुक का सीधा हमला

वांगचुक ने 24 सितंबर 2025 की हिंसा के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को राजनीतिक रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए उनके इस्तीफे की मांग की। उन्होंने पुलिस कार्रवाई में स्वचालित हथियारों के इस्तेमाल का आरोप लगाया और कहा कि गोलीबारी में लोगों को सिर और सीने में गोलियां लगीं।उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के रुख का भी संदर्भ दिया और सवाल उठाया कि यदि राहुल गांधी ने दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर अमित शाह के इस्तीफे की मांग की थी, तो लद्दाख में हुई मौतों पर भी उसी तरह सवाल उठना चाहिए।

ये वांगचुक के राजनीतिक आरोप और मांगें हैं, जिन पर सरकार या संबंधित पक्ष का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है।

न्यायिक जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें

दरअसल, 24 सितंबर 2025 की घटना के बाद केंद्र सरकार ने न्यायिक जांच का आदेश दिया था। लद्दाख प्रशासन के अनुसार जांच आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान कर रहे हैं। आयोग ने अधिकारियों और आम लोगों के हलफनामे तथा बयान दर्ज करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई है। मार्च 2026 में प्रशासन ने बताया था कि जांच की प्रक्रिया जारी है और बड़ी संख्या में प्रशासनिक गवाहों तथा सार्वजनिक हलफनामों की जांच की जा रही है।

यही वजह है कि वांगचुक अब जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने रिपोर्ट जारी नहीं होने की स्थिति में पुलिस कार्रवाई की जांच के लिए एक स्वतंत्र ‘जन न्यायाधिकरण’ बनाने की चेतावनी भी दी है।

वांगचुक के आरोपों पर पुलिस का जवाब भी सामने

वांगचुक ने बरसी के कार्यक्रम में भारी सुरक्षा व्यवस्था और पाबंदियों के कारण लोगों की कम भागीदारी का आरोप लगाया। इसके विपरीत लद्दाख पुलिस ने इन आरोपों को ‘झूठा, निराधार और भ्रामक’ बताया। पुलिस के अनुसार श्रद्धांजलि सभा की अनुमति दी गई थी और किसी व्यक्ति को कार्यक्रम में पहुंचने से नहीं रोका गया। पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था को यातायात और भीड़ प्रबंधन की सामान्य प्रक्रिया बताया।

यानी लद्दाख में इस समय दो अलग-अलग दावे आमने-सामने हैं—वांगचुक इसे भय और दमन के माहौल से जोड़ रहे हैं, जबकि पुलिस इसे सामान्य सुरक्षा व्यवस्था बता रही है। इन दावों के बीच अंतिम तस्वीर न्यायिक जांच के निष्कर्षों के बाद ही स्पष्ट होगी।

अब बयान पर भी उठे सवाल—’राजनीतिक पहचान बनाने का रास्ता तो नहीं?

‘वांगचुक के ‘एनकाउंटर’ वाले बयान के बाद एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर इस तरह की बयानबाजी पर तीखी टिप्पणी की। अधिकारी के अनुसार: “आजकल की राजनीति में अपनी पहचान बनाने के लिए इस तरह की बयानबाजी को कुछ लोग आसान रास्ता समझने लगे हैं। उन्हें लगता है कि इस तरह के घटिया बयान देकर आम जनता के बीच हमदर्दी हासिल की जा सकती है और बिना किसी मेहनत के भारतीय राजनीति में किसी न किसी राजनीतिक दल में पद मिल सकता है।

”सेवानिवृत्त अधिकारी ने आगे कहा कि किसी केंद्रीय गृह मंत्री, मंत्री या प्रशासनिक अधिकारी को वांगचुक का कथित ‘एनकाउंटर’ कराने से आखिर क्या लाभ होगा—यह सवाल भी सार्वजनिक बहस में पूछा जाना चाहिए।

उन्होंने इसे “बकवास” बताते हुए कहा कि ऐसे गंभीर दावों को केवल राजनीतिक बयान मानकर छोड़ने के बजाय उनकी तथ्यात्मक जांच होनी चाहिए।अधिकारी ने कहा कि गृह मंत्रालय को वांगचुक द्वारा लगाए गए इस दावे की सीबीआई या किसी अन्य सक्षम एजेंसी से जांच कराने पर विचार करना चाहिए, ताकि यदि कोई वास्तविक खतरा है तो उसकी पहचान हो और यदि दावा तथ्यहीन है तो उसकी भी स्थिति जनता के सामने स्पष्ट हो सके।

मुद्दा अब सिर्फ बयान का नहीं, प्रमाण का है

लद्दाख की राजनीति में सोनम वांगचुक लंबे समय से राज्य का दर्जा, पर्यावरणीय सुरक्षा और संविधान की छठी अनुसूची के तहत संरक्षण जैसे मुद्दे उठाते रहे हैं। सितंबर 2025 की हिंसा के बाद उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिया गया था और मार्च 2026 में केंद्र सरकार ने उनकी हिरासत तत्काल प्रभाव से समाप्त करने की घोषणा की थी।

अब एक साल बाद उनका ‘एनकाउंटर’ वाला बयान बहस को एक नए मोड़ पर ले आया है। एक तरफ वांगचुक इसे अपने ऊपर मंडरा रहे खतरे के रूप में पेश कर रहे हैं, दूसरी तरफ पुलिस इन आरोपों को खारिज कर रही है और एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी ने ऐसे दावों की जांच की मांग उठाई है।

ऐसे में असली सवाल यही है—क्या वांगचुक को वास्तव में किसी खतरे की चेतावनी मिली है?

यदि मिली है तो उसका स्रोत क्या है?

और यदि कोई खतरा नहीं है तो इतना गंभीर दावा किस आधार पर किया गया?

इन सवालों का जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि ठोस प्रमाण, स्वतंत्र जांच और न्यायिक जांच के निष्कर्ष से ही मिल सकता है।

लद्दाख की जनता और देश, दोनों की नजर अब उसी पर है।

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