बी के झा
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नई दिल्ली, 28 सितंबर
मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर देश में चल रही बहस अब सीधे सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच गई है। योगेंद्र यादव, जवाहर सरकार, जयती घोष, पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल विष्णु भागवत, गौहर रज़ा और अन्य प्रमुख हस्तियों समेत 2,000 से अधिक नागरिकों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत को खुला पत्र भेजकर SIR की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है।
पत्र में कहा गया है कि जब तक इसकी वैधानिकता और प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर न्यायिक समीक्षा पूरी नहीं हो जाती, तब तक इस प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए।पत्र लिखने वाले नागरिकों ने CJI से इस मामले में स्वतः संज्ञान लेने और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े आरोपों की न्यायिक जांच कराने की अपील की है।
उनका कहना है कि मामला केवल मतदाता सूची में संशोधन तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता, मतदाता अधिकार और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही से भी जुड़ा है।
ECINET और Form-6 पर सबसे बड़ा सवाल
खुले पत्र में निर्वाचन आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINET और नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में किए गए बदलावों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
हस्ताक्षरकर्ताओं का आरोप है कि इन बदलावों के लिए आवश्यक वैधानिक प्रक्रिया और व्यापक सहमति का पालन नहीं किया गया। उनका दावा है कि इसका असर नए मतदाताओं और मतदाता सूची में नाम जुड़वाने की प्रक्रिया पर पड़ रहा है।विशेष रूप से Form-6 में अतिरिक्त घोषणा और डिजिटल प्रक्रिया में बदलाव को लेकर चुनाव आयोग के भीतर भी सवाल उठने की रिपोर्ट सामने आई है।
चुनाव आयोग के भीतर असहमति की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
मामले को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि SIR और आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की ओर से पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है।रिपोर्टों के मुताबिक, इन आपत्तियों में Form-6 में बदलाव, ECINET तक फील्ड अधिकारियों की पहुंच, डेटाबेस के केंद्रीकरण और प्रशासनिक निर्णयों से जुड़े मुद्दे शामिल थे।
इसी आधार पर पत्र लिखने वाले नागरिकों ने मांग की है कि पूरे मामले की स्वतंत्र और न्यायिक निगरानी में जांच कराई जाए तथा ECINET प्लेटफॉर्म का व्यापक तकनीकी और प्रशासनिक ऑडिट कराया जाए।
नाम हटने और तकनीकी अड़चनों पर भी चिंता
पत्र में मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने की आशंका और स्थानीय स्तर पर अधिकारियों को पेश आ रही कथित तकनीकी दिक्कतों का भी उल्लेख किया गया है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा है कि मतदाता सूची में किसी भी प्रकार का बदलाव नागरिक के मतदान के अधिकार पर सीधा प्रभाव डाल सकता है, इसलिए पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है।
हालांकि, निर्वाचन आयोग ने सामने आए आरोपों पर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। आयोग का कहना है कि उसके सभी अंतिम निर्णय पूरे आयोग की सहमति से लिए गए हैं और आंतरिक स्तर पर सुझाव या अलग-अलग राय होना संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है।
ECINET को लेकर आयोग ने यह भी कहा है कि वैधानिक अधिकार संबंधित फील्ड अधिकारियों के पास ही रहते हैं।
अब निगाह सुप्रीम कोर्ट पर
यही वजह है कि 2,000 से अधिक नागरिकों का यह पत्र महज एक प्रशासनिक शिकायत नहीं, बल्कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता, चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निर्वाचन संस्थान की जवाबदेही से जुड़े व्यापक सवालों को न्यायपालिका के सामने रखने की कोशिश के रूप में सामने आया है।
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इस पत्र में उठाए गए सवालों पर स्वतः संज्ञान लेगा?
क्या SIR की प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगेगी?
और क्या ECINET तथा मतदाता सूची में बदलावों की स्वतंत्र जांच होगी?
इन सवालों का जवाब न्यायालय की आगामी कार्रवाई और सुनवाई से तय होगा।
