बी के झा
NSK news Ind

ढाका/नई दिल्ली, 18 अगस्त
दक्षिण एशिया की कूटनीति एक बार फिर खुफिया गतिविधियों के केंद्र में आ गई है। बांग्लादेश की सैन्य खुफिया एजेंसी डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फोर्सेज इंटेलिजेंस (DGFI) के छह अधिकारियों का 15 अगस्त को इस्लामाबाद के लिए रवाना होना और उससे कुछ दिन पहले भारतीय खुफिया एजेंसी RAW प्रमुख पराग जैन का ढाका दौरा क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को लेकर नई चर्चा पैदा कर रहा है।हालांकि भारत, बांग्लादेश या पाकिस्तान—तीनों देशों ने इस कथित मिशन या संभावित ISI बैठक पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। इसलिए इसे फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों और रणनीतिक संकेतों के आधार पर देखा जा रहा है।
क्या है पूरा घटनाक्रम?
रिपोर्टों के अनुसार DGFI के छह अधिकारी कर्नल मगफुज-उल-बारी के नेतृत्व में ढाका से बैंकॉक होते हुए इस्लामाबाद रवाना हुए। बताया जा रहा है कि प्रतिनिधिमंडल में वायुसेना और सैन्य खुफिया से जुड़े अधिकारी भी शामिल हैं तथा उनका उद्देश्य पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के अधिकारियों से बातचीत हो सकता है।यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब बांग्लादेश के संभावित प्रधानमंत्री तारिक रहमान के भारत दौरे को लेकर ढाका “अनुकूल परिस्थितियों” की बात कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषण: तीन देशों की त्रिकोणीय रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक खुफिया यात्रा नहीं, बल्कि भारत–बांग्लादेश–पाकिस्तान के बीच बदलते सामरिक संतुलन का संकेत भी हो सकता है। उनके अनुसार बांग्लादेश अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता दिखाना चाहता है, जबकि भारत अपने पूर्वी पड़ोस में सुरक्षा सहयोग को बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि किसी खुफिया एजेंसी के अधिकारियों की विदेश यात्रा अपने आप में असामान्य नहीं होती; वास्तविक महत्व इस बात का होता है कि उसके बाद दोनों देशों के सुरक्षा संबंध किस दिशा में बढ़ते हैं।
रक्षा विशेषज्ञों की राय
रक्षा मामलों के जानकारों के अनुसार भारत की सबसे बड़ी चिंता पूर्वोत्तर सीमा, सीमा पार आतंकी नेटवर्क, अवैध घुसपैठ और संवेदनशील सैन्य सूचनाओं की सुरक्षा से जुड़ी रहती है।उनका कहना है कि यदि DGFI और ISI के बीच सुरक्षा सहयोग बढ़ता है, तो भारत स्वाभाविक रूप से उस पर कड़ी निगरानी रखेगा। वहीं यह भी संभव है कि यह बैठक केवल सैन्य प्रशिक्षण, क्षेत्रीय सुरक्षा या द्विपक्षीय समन्वय तक सीमित हो।
विदेश मंत्रालय की संभावित कूटनीतिक स्थिति
भारतीय विदेश मंत्रालय की सार्वजनिक नीति सामान्यतः पड़ोसी देशों के आंतरिक सुरक्षा मामलों पर संयमित रहती है। आधिकारिक स्तर पर भारत का जोर आतंकवाद विरोधी सहयोग, सीमा सुरक्षा और द्विपक्षीय विश्वास बनाए रखने पर रहता है।उधर बांग्लादेश ने तारिक रहमान के भारत दौरे पर केवल इतना कहा है कि यात्रा “उपयुक्त समय” आने पर होगी।
सीमावर्ती इलाकों की चिंता
भारत–बांग्लादेश सीमा से जुड़े राज्यों के सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि दोनों देशों के बीच किसी भी प्रकार का तनाव सबसे पहले सीमा पर रहने वाले लोगों को प्रभावित करता है। उनका मानना है कि सीमा सुरक्षा के साथ व्यापार, आवागमन और मानवीय संबंधों को भी संतुलित रखना आवश्यक है।
वरिष्ठ राजनयिकों का आकलन
पूर्व राजनयिकों के अनुसार दक्षिण एशिया में खुफिया संवाद और सार्वजनिक कूटनीति अक्सर समानांतर चलते हैं। इसलिए किसी एक यात्रा को अंतिम निष्कर्ष मानना जल्दबाज़ी होगी। उनका मानना है कि आने वाले हफ्तों में यदि भारत और बांग्लादेश के बीच उच्चस्तरीय राजनीतिक वार्ता आगे बढ़ती है, तो मौजूदा अटकलों की वास्तविक तस्वीर अधिक स्पष्ट होगी।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार से मांग की है कि यदि क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ी कोई संवेदनशील जानकारी है तो संसद और देश को भरोसे में लिया जाए। उनका कहना है कि पड़ोसी देशों की बदलती रणनीतियों पर राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
निष्कर्ष
RAW प्रमुख की ढाका यात्रा, DGFI अधिकारियों का पाकिस्तान दौरा और तारिक रहमान की प्रस्तावित भारत यात्रा—इन तीन घटनाओं ने दक्षिण एशिया की कूटनीतिक हलचल को तेज कर दिया है।
फिलहाल कई दावे आधिकारिक रूप से पुष्ट नहीं हैं, इसलिए अंतिम निष्कर्ष से पहले दोनों देशों की औपचारिक प्रतिक्रियाओं और आगे की राजनयिक गतिविधियों पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।
