बी के झा
‘ लंदन/नई दिल्ली, 19 अगस्त
वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है और इसी बदलती दुनिया में ब्रिटेन के पूर्व कैबिनेट मंत्री सर विंस केबल ने भारत को भविष्य की सबसे निर्णायक ताकत बताया है। उन्होंने कहा कि भारत केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि ऐसा “स्विंग कंट्री” है जिसकी विदेश नीति और रणनीतिक दिशा आने वाले दशकों में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का स्वरूप बदल सकती है।
एक अंतरराष्ट्रीय पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान केबल ने कहा कि यदि भारत मौजूदा गति से आगे बढ़ता रहा तो 21वीं सदी के मध्य तक उसकी अर्थव्यवस्था अमेरिका के बराबर पहुंच सकती है।
भारत: नई वैश्विक व्यवस्था का निर्णायक खिलाड़ी
विंस केबल के अनुसार भारत लगभग 7 प्रतिशत की विकास दर के साथ दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। उनका कहना है कि अगले 10–20 वर्षों में भारत केवल आर्थिक महाशक्ति नहीं बनेगा, बल्कि वैश्विक संस्थाओं, व्यापार और भू-राजनीति में भी निर्णायक भूमिका निभाएगा।
उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों को भारत के साथ साझेदारी प्रतिस्पर्धा के बजाय सम्मान और समानता के आधार पर विकसित करनी चाहिए।
क्यों कहा ‘स्विंग कंट्री’?
केबल ने स्पष्ट किया कि भारत किसी एक गुट का स्थायी सदस्य बनकर नहीं चल रहा। एक ओर उसके रूस के साथ ऐतिहासिक संबंध हैं, वहीं दूसरी ओर वह अमेरिका, यूरोप, क्वाड, एससीओ और एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक जैसे विभिन्न मंचों पर समान रूप से सक्रिय है।उनके अनुसार यही बहुध्रुवीय कूटनीति भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है।
चीन सबसे बड़ी दीर्घकालिक चुनौती
पूर्व ब्रिटिश मंत्री ने कहा कि भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान चीन को सैन्य, आर्थिक और क्षेत्रीय दृष्टि से सबसे बड़ी दीर्घकालिक चुनौती मानता है। पाकिस्तान और सीमा विवादों के बीच भारत की सुरक्षा रणनीति लगातार विकसित हो रही है।
ट्रंप और अमेरिका पर भी टिप्पणी
विंस केबल ने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीतियों, टैरिफ और पाकिस्तान के साथ बढ़ती निकटता ने भारत में अमेरिका को लेकर भरोसे को प्रभावित किया है। उनके अनुसार भारत समझ चुका है कि अमेरिका के साथ संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे हमेशा समान प्राथमिकता वाले नहीं रहे।
विशेषज्ञों की राय
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत आज रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर आगे बढ़ रहा है। यही कारण है कि वह पश्चिम और पूर्व—दोनों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध बनाए रखता है।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार यदि भारत उच्च विकास दर, विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे की गति बनाए रखता है, तो मध्य सदी तक वैश्विक आर्थिक शक्ति संतुलन में उसकी स्थिति बेहद मजबूत हो सकती है।
निष्कर्ष
सर विंस केबल का आकलन केवल भारत की आर्थिक क्षमता की प्रशंसा नहीं, बल्कि उस बदलती विश्व व्यवस्था की ओर संकेत है जिसमें भारत किसी गुट का अनुयायी नहीं, बल्कि नियम तय करने वाली प्रमुख शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
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