जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा का जिक्र कर सौरभ दास की मुश्किलें बढ़ाना चाहते हैं गौरव भाटिया? याचिका में पुराने अवमानना मामले का हवाला

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 9 सितंबर

सोशल मीडिया पर एक कथित फर्जी पोस्ट साझा करने का विवाद अब अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। बीजेपी नेता गौरव भाटिया ने सौरभ दास के खिलाफ मानहानि की कार्रवाई की मांग को लेकर हाई कोर्ट का रुख किया है। इस मामले में अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सीजेपी को भी प्रतिवादी बनाया गया है।मामले की खास बात सिर्फ कथित फर्जी सोशल मीडिया पोस्ट नहीं है। भाटिया की याचिका में सौरभ दास के खिलाफ पहले से चल रहे अवमानना मामले का भी उल्लेख किया गया है।

यह वही मामला है जिसमें जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से संबंधित टिप्पणियों और सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर अदालत ने कार्रवाई शुरू की थी।यानी अब एक नया कानूनी विवाद पुराने न्यायिक विवाद से जुड़ता दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि यह मामला महज सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित न रहकर राजनीतिक बयानबाजी, न्यायपालिका की गरिमा और डिजिटल माध्यमों पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की सीमाओं से जुड़ा व्यापक प्रश्न बन गया है।

आखिर विवाद शुरू कैसे हुआ?

आरोप है कि सौरभ दास ने एक न्यूज पोर्टल के नाम से जारी कथित फर्जी सोशल मीडिया कार्ड को शेयर किया था। इस कार्ड में गौरव भाटिया के नाम से ऐसा बयान प्रदर्शित किया गया था, जिसमें हाल ही में गिरफ्तार किए गए स्वतंत्र भारद्वाज को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी दिखाई गई थी।गौरव भाटिया ने इस पोस्ट को फर्जी बताते हुए इसे हटाने और सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की। पोस्ट बाद में हटा दी गई, लेकिन भाटिया के मुताबिक माफी नहीं मांगी गई। इसके बाद उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया।

भाटिया ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर लिखा—“जब आरोप अपनी सीमा पार कर जाते हैं, तो कानून अपनी सीमा तय करता है।”उनका कहना है कि अब इस पूरे विवाद में तथ्यों, साक्ष्यों और कानून के आधार पर सच्चाई तय होगी।

याचिका में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा का जिक्र क्यों?

यही इस मामले का सबसे राजनीतिक और कानूनी रूप से महत्वपूर्ण पहलू है।गौरव भाटिया की याचिका में सौरभ दास की ओर से जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को लेकर की गई टिप्पणियों और उससे जुड़े अवमानना मामले का उल्लेख किया गया है।भाटिया की दलील का मूल आधार यह बताया गया है कि सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति, संस्था अथवा न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ बार-बार ऐसी सामग्री प्रसारित करना महज राजनीतिक आलोचना नहीं माना जा सकता, यदि वह तथ्यहीन या मानहानि कारक साबित होती है।

याचिका में कथित तौर पर यह भी तर्क दिया गया कि सौरभ दास पहले भी जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को लेकर टिप्पणियों के कारण कानूनी कार्रवाई का सामना कर चुके हैं और इसी पृष्ठभूमि में वर्तमान विवाद को देखा जाना चाहिए।

हालांकि, किसी पुराने मामले का उल्लेख अपने आप नए मामले में दोष सिद्ध नहीं करता। अदालत को प्रत्येक आरोप और उसके साक्ष्य की स्वतंत्र रूप से जांच करनी होगी।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से जुड़ा पुराना मामला क्या था?

दिल्ली हाई कोर्ट में कथित शराब घोटाले से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ था। इसी दौरान सौरभ दास सहित कुछ लोगों की सोशल मीडिया टिप्पणियां भी विवाद के केंद्र में आईं।जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की ओर से इसे न्यायपालिका के खिलाफ कथित झूठे अभियान के रूप में देखा गया और इसके बाद अवमानना की कार्रवाई शुरू हुई।यहीं से वर्तमान मामले को जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

भाटिया का तर्क है कि यह एक अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के जरिए राजनीतिक विरोधियों और सार्वजनिक संस्थाओं को निशाना बनाने की कथित प्रवृत्ति का हिस्सा हो सकती है।लेकिन कानून के जानकारों के मुताबिक यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है—किसी व्यक्ति का पिछला विवाद उसके वर्तमान आरोप की सत्यता का स्वतः प्रमाण नहीं बन जाता।

वर्तमान मामले में कथित फर्जी पोस्ट की उत्पत्ति, उसे साझा करने वाले व्यक्ति की मंशा, पोस्ट की पहुंच और उससे हुई कथित प्रतिष्ठा-हानि जैसे सवाल निर्णायक होंगे।

राजनीतिक लड़ाई बनाम कानूनी जवाब

इस मामले ने एक बार फिर भारतीय राजनीति में सोशल मीडिया की भूमिका पर बहस तेज कर दी है।बीजेपी का तर्क स्वाभाविक रूप से यह होगा कि राजनीतिक विरोध का अर्थ यह नहीं हो सकता कि किसी नेता के नाम से फर्जी बयान तैयार कर उसे जनता के बीच प्रसारित कर दिया जाए। पार्टी के नजरिए से देखा जाए तो यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर गलत सामग्री फैलाता है और उससे सार्वजनिक प्रतिष्ठा प्रभावित होती है, तो लोकतांत्रिक बहस की आड़ में उसे संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।

दूसरी ओर, विपक्षी राजनीति से जुड़े लोग यह सवाल उठा सकते हैं कि मानहानि कानून और अदालतों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को दबाने के लिए तो नहीं किया जा रहा।

विपक्ष यह भी तर्क दे सकता है कि आलोचना, व्यंग्य और राजनीतिक टिप्पणी तथा जानबूझकर झूठी सूचना फैलाने के बीच स्पष्ट कानूनी अंतर किया जाना चाहिए।यानी असली सवाल यह नहीं है कि आरोप बीजेपी की ओर से आया है या विपक्ष की ओर से। असली सवाल यह है कि क्या साझा की गई सामग्री वास्तव में फर्जी थी, क्या आरोपी को इसकी जानकारी थी और क्या उसकी मंशा किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की थी?

कानूनविदों की नजर में असली कसौटी क्या होगी?

कानूनी विशेषज्ञों के नजरिए से इस मामले में कुछ सवाल बेहद अहम होंगे—

पहला— क्या सोशल मीडिया कार्ड वास्तव में फर्जी था?

दूसरा— क्या सौरभ दास को पोस्ट साझा करते समय उसके फर्जी होने की जानकारी थी?

तीसरा— क्या पोस्ट हटाना जिम्मेदारी स्वीकार करने के बराबर माना जा सकता है या यह केवल विवादित सामग्री को हटाने का कदम था?

चौथा— क्या कथित पोस्ट से गौरव भाटिया की प्रतिष्ठा को वास्तविक नुकसान हुआ?

पांचवां— क्या पुराने अवमानना मामले को वर्तमान मानहानि विवाद में पैटर्न या मंशा स्थापित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है?

इन सवालों का उत्तर अदालत में उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर ही तय होगा।

शिक्षाविदों का बड़ा सवाल—डिजिटल राजनीति की मर्यादा कहां?

राजनीतिक संचार पर नजर रखने वाले शिक्षाविदों का मानना है कि सोशल मीडिया ने राजनीतिक विमर्श की गति तो कई गुना बढ़ा दी है, लेकिन इसके साथ गलत सूचना के प्रसार का खतरा भी उतना ही बढ़ा है।पहले किसी अखबार में छपी गलत खबर के खिलाफ संपादकीय प्रक्रिया, स्पष्टीकरण और कानूनी उपायों की एक श्रृंखला होती थी। आज एक फर्जी कार्ड कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है।ऐसे में राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों की जिम्मेदारी पहले से अधिक बढ़ जाती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन आलोचना और दुष्प्रचार के बीच की सीमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

राजनीतिक विश्लेषण: क्या यह सिर्फ मानहानि का मामला है?

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह विवाद तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण है।पहला, बीजेपी बनाम विपक्ष की डिजिटल लड़ाई।

सोशल मीडिया अब सिर्फ प्रचार का माध्यम नहीं रहा।

यह राजनीतिक प्रतिष्ठा बनाने और बिगाड़ने का सबसे प्रभावशाली मंच बन चुका है।

दूसरा, न्यायपालिका की गरिमा का प्रश्न ?

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से जुड़े पुराने मामले का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे वर्तमान विवाद को सिर्फ दो राजनीतिक व्यक्तियों के बीच की लड़ाई के बजाय न्यायपालिका और सार्वजनिक संस्थाओं पर सोशल मीडिया विमर्श की सीमा से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।

तीसरा, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की कानूनी जवाबदेही।

यदि अदालत में यह साबित होता है कि किसी व्यक्ति ने जानते-बूझते फर्जी सामग्री साझा की, तो यह भविष्य के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकती है।

वहीं यदि आरोप पर्याप्त साक्ष्य के बिना साबित नहीं होते, तो यह मामला राजनीतिक मानहानि के आरोपों के इस्तेमाल पर भी सवाल खड़े कर सकता है।

बीजेपी के लिए संदेश साफ, विपक्ष के लिए चुनौती भी

बीजेपी के नजरिए से यह मामला एक व्यापक राजनीतिक संदेश देने का अवसर है—सोशल मीडिया पर फर्जी सामग्री के जरिए नेताओं को बदनाम करने की कोशिश का जवाब राजनीतिक बयान से नहीं, कानून के जरिए दिया जाएगा।

विपक्ष के सामने चुनौती यह होगी कि वह आलोचना के अधिकार और तथ्यहीन आरोपों के बीच स्पष्ट रेखा खींचे। क्योंकि यदि राजनीतिक दल स्वयं सोशल मीडिया पर गलत सूचना के खिलाफ सख्त रुख की मांग करते हैं, तो वही कसौटी उनके नेताओं और समर्थकों पर भी लागू होनी चाहिए।

निष्कर्ष:

फैसला अदालत करेगी, लेकिन संदेश राजनीति से कहीं बड़ा है

गौरव भाटिया की याचिका में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से जुड़े पुराने अवमानना मामले का उल्लेख निश्चित रूप से राजनीतिक और कानूनी बहस को और तीखा करता है।

लेकिन अंतिम फैसला इस आधार पर नहीं होगा कि किसका राजनीतिक प्रभाव अधिक है।

अदालत के सामने मूल प्रश्न यही रहेगा कि कथित पोस्ट किसने बनाई, उसे किसने और किस उद्देश्य से साझा किया, उसमें क्या गलत था और उससे कथित रूप से किस प्रकार की प्रतिष्ठा-हानि हुई।

यह मामला एक और बड़ी सच्चाई सामने रखता है—डिजिटल राजनीति में पोस्ट डिलीट करने से विवाद हमेशा खत्म नहीं होता।

स्क्रीनशॉट, डिजिटल रिकॉर्ड और पोस्ट की पूरी ट्रेल बाद में अदालत में साक्ष्य का हिस्सा बन सकती है।

इसलिए आने वाले दिनों में यह मामला सिर्फ गौरव भाटिया बनाम सौरभ दास की कानूनी लड़ाई नहीं रह सकता।

यह भारतीय राजनीति में सोशल मीडिया की जवाबदेही, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा के अधिकार के बीच संतुलन की परीक्षा भी बन सकता है।

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