सम्राट का ‘बेचारा’ दांव, जन सुराज का ‘हत्यारा’ पलटवार: मुख्यमंत्री और प्रशांत किशोर के बीच जुबानी जंग तेज, जन सुराज ने पलटवार में लगाए गंभीर आरोप; सवाल- क्या बिहार की राजनीति मुद्दों से हटकर व्यक्तिगत हमलों की ओर बढ़ रही है?

बी के झा

NSK news Ind

पटना, 9 सितंबर

बिहार की राजनीति में चुनावी तापमान बढ़ने के साथ नेताओं की भाषा भी लगातार तीखी होती जा रही है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर के बीच शुरू हुई राजनीतिक खींचतान अब व्यक्तिगत टिप्पणियों तक पहुंचती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री ने एक इंटरव्यू में प्रशांत किशोर को ‘बेचारा’ कहकर टिप्पणी की तो जन सुराज ने पलटवार करते हुए मुख्यमंत्री को ‘हत्यारा’ तक कह दिया।दोनों पक्षों के बयानों ने बिहार की राजनीतिक मर्यादा, लोकतांत्रिक संवाद और सत्ता-विपक्ष के रिश्तों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।

‘व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है… वो बेचारा है, करने दीजिए’

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से जब प्रशांत किशोर के बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में उन्हें निशाना बनाए जाने से जुड़ा सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उनकी किसी से व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है।

सम्राट चौधरी ने कहा, “व्यक्तिगत हमारी किसी से लड़ाई नहीं है… तो मैं व्यक्तिगत होता नहीं हूं। वो बेचारा है, करने दीजिए।”मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि वह बिहार में काम करने के लिए आए हैं। उनके खिलाफ लोग सुप्रीम कोर्ट तक जाते हैं तो उन्हें जाने दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो बोलना चाहता है, उसे बोलने दिया जाए और अदालत को अपना काम करने दिया जाए।

इसी क्रम में मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि “अच्छी बात है न, सब सम्राट चौधरी से ही मोहब्बत कर रहा है।”राजनीतिक तौर पर देखें तो यह बयान केवल प्रशांत किशोर पर टिप्पणी नहीं है। इसमें मुख्यमंत्री ने अपने खिलाफ होने वाली राजनीतिक आलोचना को लेकर एक तरह से चुनौतीपूर्ण रवैया भी प्रदर्शित किया है।

जन सुराज का पलटवार- ‘हत्यारा होने से बेचारा होना ठीक

’मुख्यमंत्री के बयान के बाद जन सुराज ने भी आक्रामक रुख अपना लिया।जन सुराज के राष्ट्रीय प्रवक्ता कुमार सौरभ सिंह ने पलटवार करते हुए कहा कि “हत्यारा होने से बेचारा होना ठीक है।”उन्होंने प्रशांत किशोर का बचाव करते हुए कहा कि प्रशांत किशोर ने नाम, उम्र या डिग्री में फर्जीवाड़ा नहीं किया है। उन्होंने मुख्यमंत्री पर राजनीतिक नैतिकता का सवाल उठाते हुए बांकीपुर चुनाव परिणाम का भी उल्लेख किया और इस्तीफे की मांग तक कर डाली।कुमार सौरभ ने कहा कि नीतीश कुमार के चेहरे के बाद यह पहला चुनाव था जिसमें जनता ने सम्राट चौधरी के नेतृत्व और चेहरे पर अपना संदेश दिया है।

उन्होंने दावा किया कि बाकी राजनीतिक हिसाब 2029 और 2030 में बिहार की जनता करेगी।

असली सवाल- क्या राजनीति में ‘लेबल’ ही अब सबसे बड़ा हथियार है?

बिहार की राजनीति में नेताओं के बीच तीखी बयानबाजी कोई नई बात नहीं है। लेकिन ‘बेचारा’ और ‘हत्यारा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल बहस को नीतियों और जनहित के मुद्दों से निकालकर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की तरफ ले जाता है।लोकतंत्र में मुख्यमंत्री से लेकर विपक्ष के नेता तक किसी को भी सवालों से छूट नहीं मिल सकती। लेकिन सवाल पूछने और आरोप लगाने के बीच एक संवैधानिक तथा कानूनी सीमा भी होती है।किसी व्यक्ति को ‘हत्यारा’ कहना महज राजनीतिक विशेषण नहीं माना जा सकता। यदि ऐसा आरोप किसी विशिष्ट आपराधिक घटना से जोड़ा जा रहा है, तो उसके समर्थन में प्रमाण, प्राथमिकी, जांच या न्यायिक निष्कर्ष का होना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक बयान और कानूनी आरोप के बीच अंतर करना जरूरी हो जाता है।

शिक्षाविद की टिप्पणी ने बहस को और गंभीर बनाया

बिहार की इस राजनीतिक बयानबाजी पर एक वरिष्ठ शिक्षाविद ने नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा प्रशांत किशोर को ‘बेचारा’ कहना और उसके जवाब में जन सुराज के राष्ट्रीय प्रवक्ता द्वारा मुख्यमंत्री को ‘हत्यारा’ कहना राजनीतिक संवाद के गिरते स्तर का संकेत है।शिक्षाविद ने दावा किया कि बिहार में हुई कुछ हत्या और पुलिस मुठभेड़ों को लेकर समय-समय पर सरकार की भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं।

उन्होंने भरत तिवारी से जुड़े मामले का भी उल्लेख करते हुए गंभीर आरोप लगाए।हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। किसी व्यक्ति की हत्या में मुख्यमंत्री या सरकार की प्रत्यक्ष संलिप्तता जैसे गंभीर आरोपों को तब तक तथ्य के रूप में नहीं माना जा सकता जब तक जांच एजेंसी, न्यायालय या अन्य विश्वसनीय आधिकारिक प्रक्रिया से इसकी पुष्टि न हो।

यही पत्रकारिता की वह सीमा है जहां राजनीतिक आरोप को खबर तो बनाया जा सकता है, लेकिन उसे स्थापित तथ्य के रूप में नहीं लिखा जा सकता।

कानूनविदों की नजर में मामला क्यों गंभीर?

कानून के जानकारों के अनुसार राजनीतिक भाषण में आलोचना, व्यंग्य और तीखे शब्दों की अपनी जगह है, लेकिन किसी व्यक्ति को अपराधी बताने वाला आरोप अलग श्रेणी का विषय हो सकता है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई नेता या राजनीतिक संगठन किसी सार्वजनिक व्यक्ति पर हत्या जैसे गंभीर अपराध का आरोप लगाता है, तो उसे अपने दावे के आधार के बारे में भी जवाब देना चाहिए।लोकतंत्र में आरोप लगाने का अधिकार है, लेकिन आरोप को प्रमाणित करने की जिम्मेदारी भी है।इसलिए ‘हत्यारा’ शब्द का राजनीतिक इस्तेमाल केवल चुनावी बयानबाजी तक सीमित नहीं रहता। इससे संबंधित व्यक्ति की प्रतिष्ठा और राजनीतिक विश्वसनीयता पर भी सीधा असर पड़ सकता है।

आरजेडी और कांग्रेस के लिए भी यह राजनीतिक अवसर

सम्राट चौधरी और जन सुराज के बीच चल रही इस जुबानी जंग पर राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस की प्रतिक्रिया भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है।आरजेडी के लिए यह मुद्दा सरकार को घेरने का अवसर है। पार्टी यह सवाल उठा सकती है कि मुख्यमंत्री और सरकार के खिलाफ गंभीर आरोप लगाने वाली राजनीतिक ताकतों के दावों की जांच क्यों नहीं होती और बिहार में कानून-व्यवस्था पर सरकार का वास्तविक रिकॉर्ड क्या है।

वहीं कांग्रेस इस पूरे घटनाक्रम को बिहार की राजनीति में बढ़ती व्यक्तिगत बयानबाजी के उदाहरण के तौर पर पेश कर सकती है। कांग्रेस के लिए सवाल यह हो सकता है कि जनता जिन मुद्दों पर जवाब चाहती है—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, अपराध, पलायन और महंगाई—

उन पर राजनीतिक दलों की बहस क्यों पीछे छूट रही है?

हालांकि, आरजेडी और कांग्रेस की इस विशेष बयानबाजी पर इस रिपोर्ट के समय तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है। इसलिए उनकी ओर से कोई बयान आए बिना उसे उनके खाते में डालना पत्रकारिता की दृष्टि से उचित नहीं होगा।

राजनीतिक विश्लेषण: ‘सम्राट बनाम प्रशांत’ से ज्यादा बड़ा है यह खेल

राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में सम्राट चौधरी और प्रशांत किशोर की यह भिड़ंत केवल दो नेताओं के बीच व्यक्तिगत विवाद नहीं है।इसके पीछे बिहार की बदलती राजनीतिक जमीन भी दिखाई देती है।एक तरफ सत्ता में मौजूद नेतृत्व है, जिसे अपने काम और प्रशासनिक फैसलों का बचाव करना है। दूसरी तरफ जन सुराज है, जो खुद को पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।ऐसे में दोनों के बीच होने वाली हर राजनीतिक भिड़ंत का सीधा असर उस वोटर पर पड़ सकता है जो इस समय विकल्प तलाश रहा है।लेकिन यहां एक दिलचस्प विरोधाभास भी है।

प्रशांत किशोर सत्ता पक्ष पर हमला करते हैं तो जन सुराज की राजनीति मजबूत होती है।

सत्ता पक्ष प्रशांत किशोर पर हमला करता है तो प्रशांत किशोर को राजनीतिक दृश्यता मिलती है।

यानी दोनों पक्षों की जुबानी जंग, अनजाने में ही सही, एक-दूसरे को राजनीतिक स्पेस दे रही है।

क्या बिहार की जनता इस ‘नूराकुश्ती’ को स्वीकार करेगी?

यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है।यदि जनता के सामने चुनावी मुकाबला केवल ‘कौन किसे क्या कह रहा है’ तक सीमित हो जाता है, तो मूल सवाल पीछे छूट जाएंगे।

बिहार का मतदाता जानना चाहता है—- रोजगार के कितने अवसर पैदा हुए?

युवाओं के पलायन को रोकने की क्या रणनीति है?

शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में क्या बदलाव आया?

अपराध पर सरकार की वास्तविक पकड़ कितनी है?

किसानों और गरीबों की आय बढ़ाने के लिए क्या किया गया?

और सबसे महत्वपूर्ण—सरकार की जवाबदेही किसके सामने है?

राजनीति में तीखी बहस लोकतंत्र की ताकत हो सकती है, लेकिन व्यक्तिगत आरोप लोकतांत्रिक विमर्श की ताकत नहीं, उसकी कमजोरी बन सकते हैं।

निष्कर्ष

सम्राट चौधरी का ‘बेचारा’ और जन सुराज का ‘हत्यारा’—दोनों शब्द बिहार की मौजूदा राजनीतिक भाषा का आईना हैं।

एक तरफ सत्ता पक्ष विपक्षी चुनौती को हल्का बताने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी तरफ जन सुराज बेहद गंभीर आरोपों के जरिए सरकार पर नैतिक और राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।

लेकिन अंतिम फैसला सोशल मीडिया, प्रेस कॉन्फ्रेंस या इंटरव्यू में नहीं होगा।

फैसला बिहार की जनता करेगी।

और जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा—राजनीतिक नेता एक-दूसरे को क्या कहते हैं, यह नहीं; बल्कि सत्ता में आने के बाद वे जनता के लिए क्या करते हैं।

क्योंकि लोकतंत्र में किसी को ‘बेचारा’ या ‘हत्यारा’ कह देने से कोई व्यक्ति न तो दोषी सिद्ध होता है और न निर्दोष।

दोष और निर्दोषता का फैसला अदालत करती है, जबकि सरकार के कामकाज का फैसला जनता।

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