बी के झा
NSK news India


नई दिल्ली, 8 सितंबर
भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक ऐसा मोड़ आने की संभावना है, जिसका इंतजार देश को सुप्रीम कोर्ट की स्थापना के बाद से है। 1950 में देश की सर्वोच्च अदालत अस्तित्व में आई, लेकिन 75 साल से ज्यादा के इस सफर में आज तक किसी महिला ने भारत के मुख्य न्यायाधीश यानी CJI का पद नहीं संभाला।
अब यह इतिहास बदलने की दहलीज पर है।
नाम है जस्टिस बी.वी. नागरत्ना।
अगर वरिष्ठता का मौजूदा क्रम कायम रहता है तो जस्टिस नागरत्ना सितंबर 2027 में भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बन सकती हैं। हालांकि, उनका संभावित कार्यकाल बेहद छोटा होगा। 30 अक्टूबर 2027 को 65 वर्ष की आयु पूरी होने के कारण वह करीब 36 दिनों तक CJI के पद पर रह सकती हैं।लेकिन कार्यकाल भले ही छोटा हो, इतिहास में दर्ज होने वाला उनका नाम बेहद लंबा होगा।
पिता भी थे देश के मुख्य न्यायाधीश, बेटी भी उसी कुर्सी तक पहुंचने की राह पर
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना का पूरा नाम बेंगलुरु वेंकटरामैया नागरत्ना है। उनका जन्म 30 अक्टूबर 1962 को बेंगलुरु में हुआ था। उनके पिता जस्टिस ई.एस. वेंकटरामैया भी भारत के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं। उन्होंने 19 जून 1989 से दिसंबर 1989 तक देश के 19वें CJI के रूप में जिम्मेदारी संभाली थी।
यानी अगर जस्टिस नागरत्ना CJI बनती हैं तो भारतीय न्यायिक इतिहास में यह एक असाधारण संयोग होगा—एक ही परिवार से पिता और बेटी, दोनों भारत के मुख्य न्यायाधीश।और इससे भी बड़ी बात यह होगी कि वह देश की पहली महिला CJI होंगी।
इतिहास से कानून तक, नागरत्ना का सफर
जस्टिस नागरत्ना ने दिल्ली के जीसस एंड मैरी कॉलेज से इतिहास में बीए ऑनर्स किया। इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ सेंटर से 1987 में एलएलबी की डिग्री हासिल की।उसी साल उन्होंने वकालत शुरू की। संवैधानिक कानून, प्रशासनिक कानून, वाणिज्यिक कानून और पारिवारिक कानून जैसे क्षेत्रों में उन्होंने लंबे समय तक काम किया।इसके बाद उनका न्यायिक सफर आगे बढ़ा और वह कर्नाटक हाई कोर्ट की न्यायाधीश बनीं।
2021 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया।लेकिन जस्टिस नागरत्ना की पहचान सिर्फ उनकी पदयात्रा से नहीं बनी। उनकी पहचान उनके फैसलों, स्वतंत्र कानूनी दृष्टिकोण और कई मामलों में अलग राय रखने के साहस से बनी।
जब अदालत के बाहर खड़ा था दबाव, लेकिन नागरत्ना नहीं झुकीं
जस्टिस नागरत्ना के न्यायिक जीवन का एक प्रसंग उनकी दृढ़ता की मिसाल के तौर पर सामने आता है।2009 में कर्नाटक हाई कोर्ट परिसर में विरोध कर रहे वकीलों के एक समूह ने उन्हें जबरन हिरासत में ले लिया था। हालात तनावपूर्ण थे, लेकिन उन्होंने प्रदर्शनकारियों के दबाव के सामने झुकने से इनकार कर दिया।
उनका संदेश साफ था—कानून की शपथ लेने वाला न्यायाधीश किसी दबाव के आगे अपनी गरिमा से समझौता नहीं कर सकता।यही तेवर आगे चलकर उनके कई महत्वपूर्ण न्यायिक विचारों में भी दिखाई दिए।
नोटबंदी पर बहुमत से अलग खड़ी हुईं जस्टिस बी.वी. नागरत्ना
उन मामलों में अलग राय रखने के लिए भी चर्चित रही हैं, जिनके फैसलों का व्यापक राजनीतिक और आर्थिक असर रहा।नोटबंदी मामला इसका बड़ा उदाहरण है। 2016 में 500 और 1000 रुपये के नोटों को बंद करने के केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने जनवरी 2023 में फैसला सुनाया।
चार न्यायाधीशों के बहुमत ने केंद्र के फैसले को बरकरार रखा, लेकिन जस्टिस नागरत्ना ने अलग राय दी।उनका मानना था कि इतने बड़े पैमाने पर मुद्रा को चलन से बाहर करने के लिए संसद के कानून का रास्ता अपनाया जाना चाहिए था। उन्होंने संबंधित अधिसूचना को कानूनी आधार पर सही नहीं माना।
यानी जहां बहुमत एक तरफ था, वहां जस्टिस नागरत्ना ने संविधान और कानून की अपनी व्याख्या के आधार पर अलग रास्ता चुना।
खनिज रॉयल्टी से लेकर भ्रष्टाचार कानून तक—अलग नजरिया बना पहचान
2024 के खनिज रॉयल्टी मामले में भी जस्टिस नागरत्ना नौ सदस्यीय संविधान पीठ का हिस्सा थीं और उन्होंने बहुमत से अलग राय रखी।उन्होंने खनिजों पर दी जाने वाली रॉयल्टी को कर यानी टैक्स की प्रकृति का मानने वाली राय व्यक्त की।वहीं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े नीरज दत्ता बनाम राज्य मामले में उन्होंने पांच सदस्यीय संविधान पीठ के सर्वसम्मत फैसले का नेतृत्व किया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के मामलों में परिस्थितिजन्य या अप्रत्यक्ष साक्ष्य के आधार पर भी दोषसिद्धि संभव है।
महिला न्यायाधीशों के मामले में भी दिखाई संवेदनशीलता
जस्टिस नागरत्ना का न्यायिक दृष्टिकोण सिर्फ संवैधानिक और आर्थिक मामलों तक सीमित नहीं रहा।मध्य प्रदेश की बर्खास्त महिला सिविल जजों की बहाली से जुड़े मामले में उन्होंने न्यायपालिका के भीतर महिलाओं के प्रति असंवेदनशीलता और भेदभाव के सवाल को गंभीरता से उठाया।यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि इसमें अदालत के भीतर मौजूद संस्थागत सोच और महिला न्यायिक अधिकारियों के साथ व्यवहार पर गंभीर सवाल सामने आए।
सितंबर 2027 क्यों है खास?
सुप्रीम कोर्ट में CJI की नियुक्ति के लिए परंपरागत रूप से वरिष्ठता के सिद्धांत का पालन किया जाता है। मौजूदा उत्तराधिकार क्रम में जस्टिस सूर्यकांत के बाद जस्टिस विक्रम नाथ और फिर जस्टिस बी.वी. नागरत्ना का नाम आता है।इसी वरिष्ठता क्रम के आधार पर जस्टिस नागरत्ना के सितंबर 2027 में CJI बनने की संभावना जताई जा रही है।
हालांकि उनकी उम्र को देखते हुए यह कार्यकाल करीब 36 दिनों का ही होगा।लेकिन सवाल कार्यकाल की लंबाई का नहीं है।सवाल यह है कि क्या भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार किसी महिला के नाम के आगे ‘Chief Justice of India’ लिखा जाएगा?
अगर ऐसा हुआ तो जस्टिस नागरत्ना का कार्यकाल भले ही कुछ सप्ताह का हो, लेकिन उसका प्रतीकात्मक और ऐतिहासिक महत्व कई दशकों तक कायम रहेगा।
एक कुर्सी, दो पीढ़ियां और इतिहास का इंतजार
भारतीय न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ी है, लेकिन शीर्ष अदालत के सर्वोच्च पद तक अभी तक कोई महिला नहीं पहुंची।ऐसे में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की संभावित नियुक्ति सिर्फ एक व्यक्ति की पदोन्नति नहीं होगी। यह उस लंबी न्यायिक यात्रा का नया अध्याय होगा, जिसमें महिलाओं ने अदालत की निचली सीढ़ियों से लेकर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठों तक अपनी जगह बनाई है।
सबसे दिलचस्प बात यह होगी कि जिस परिवार में कभी पिता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी संभाली थी, उसी परिवार की बेटी उसी पद तक पहुंचेगी।
इतिहास कभी-कभी लंबी उम्र वाले कार्यकाल से नहीं, बल्कि एक सही समय पर लिए गए फैसले से बनता है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना के सामने अब वही ऐतिहासिक संभावना खड़ी है।
