नीतीश बिहार के 10 बेहतरीन नेताओं में होंगे शामिल’, प्रशांत किशोर की तारीफ के साथ तीखा हमला; बोले- सत्ता में थे, सरकार पर्दे के पीछे से कोई और चला रहा था!

बी.के. झा, एनएसके – बिहार राजनीतिक विश्लेषण

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पटना, 18 अक्टूबर

बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर ने एक बार फिर ऐसा बयान दिया है, जिसने सियासी बहस को नई दिशा दे दी है। जन सुराज पार्टी के संस्थापक ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तारीफ करते हुए उन्हें बिहार के अब तक के दस बेहतरीन राजनीतिक नेताओं में शामिल होने योग्य बताया। लेकिन यह तारीफ नीतीश कुमार की मौजूदा राजनीतिक भूमिका पर उनके तीखे सवालों के साथ आई।

प्रशांत किशोर ने आरोप लगाया कि नीतीश कुमार की मानसिक स्थिति को लेकर सवाल उठने के बावजूद उन्हें सत्ता में बनाए रखा गया और सरकार पर्दे के पीछे से दूसरे लोग चला रहे थे।एक ही बयान में प्रशंसा और आलोचना का यह मेल बिहार की राजनीति में खास मायने रखता है। पीके ने एक ओर नीतीश कुमार के ऐतिहासिक योगदान को स्वीकार किया, तो दूसरी ओर उनके कार्यकाल के अंतिम दौर में सत्ता संचालन और जवाबदेही पर सवाल खड़े किए।

इसी दौरान उन्होंने मोकामा विधायक अनंत सिंह के विवादित बयान और वैशाली नाव हादसे को लेकर भी अपनी राय रखी। उनके निशाने पर जदयू-राजद के बीच राजनीतिक विवाद के साथ मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की संवेदनशील मुद्दों पर प्रतिक्रिया भी रही।

नीतीश कुमार की तारीफ, लेकिन सत्ता संचालन पर सवाल

बिहार विधान परिषद चुनाव के प्रचार के दौरान पत्रकारों ने प्रशांत किशोर से पूछा कि क्या नीतीश कुमार अपने राजनीतिक विरोधियों की हत्या का आदेश दे सकते हैं। इस सवाल के जवाब में उन्होंने नीतीश कुमार को बिहार के सबसे समझदार नेताओं में से एक बताया।प्रशांत किशोर ने कहा कि नीतीश कुमार को बिहार के अब तक के दस बेहतरीन राजनीतिक नेताओं में गिना जाएगा। उन्होंने यह भी माना कि नीतीश कुमार को राज्य में सुधार की कोशिश करने वाले नेता के तौर पर याद किया जाएगा।

हालांकि, पीके ने अपनी पुरानी आलोचना को भी दोहराया। उन्होंने आरोप लगाया कि नीतीश कुमार की मानसिक स्थिति ठीक नहीं होने के बावजूद उन्हें सत्ता में बनाए रखा गया और सरकार पर्दे के पीछे से दूसरे लोग चला रहे थे।यहां महत्वपूर्ण है कि नीतीश कुमार की मानसिक स्थिति और सरकार के वास्तविक संचालन को लेकर प्रशांत किशोर के आरोपों को स्थापित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक दावे के रूप में देखा जाना चाहिए।

पीके के बयान का राजनीतिक संदेश यह है कि किसी नेता के ऐतिहासिक योगदान को स्वीकार करना और उसके कार्यकाल के किसी दौर की आलोचना करना एक-दूसरे के विपरीत नहीं हैं। उनके मुताबिक, नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत का मूल्यांकन उनके सुधारवादी प्रयासों और सत्ता संचालन से जुड़े सवालों—दोनों के आधार पर होना चाहिए।

क्या पीके ने नीतीश कुमार की विरासत और मौजूदा राजनीति के बीच खींची लकीर?

प्रशांत किशोर कभी नीतीश कुमार के राजनीतिक अभियान के अहम रणनीतिकार रहे हैं। वर्ष 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपनी सलाहकार कंपनी आई-पैक के माध्यम से नीतीश कुमार के चुनाव अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बाद में वह जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी बने, हालांकि आगे चलकर उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच मतभेद गहरे हो गए।इस राजनीतिक पृष्ठभूमि में नीतीश कुमार को बिहार के दस बेहतरीन नेताओं में शामिल करने वाला उनका बयान सामान्य प्रशंसा से अधिक महत्व रखता है। यह उस नेता के राजनीतिक योगदान की स्वीकारोक्ति है, जिसके साथ पीके ने काम भी किया और बाद में जिसका विरोध भी किया।

राजनीतिक विश्लेषण के नजरिए से इस बयान के दो पहलू हैं।

पहला, प्रशांत किशोर नीतीश कुमार की ऐतिहासिक भूमिका को पूरी तरह खारिज नहीं कर रहे हैं।

दूसरा, वह उनके राजनीतिक कार्यकाल के उस हिस्से पर सवाल उठा रहे हैं, जिसमें उनके अनुसार सत्ता संचालन की वास्तविक जिम्मेदारी किसी और के हाथ में थी। यही अंतर पीके के बयान को राजनीतिक रूप से दिलचस्प बनाता है। हालांकि, नीतीश कुमार की विरासत का अंतिम आकलन उनके शासनकाल, नीतियों, उपलब्धियों, कमियों और राज्य पर पड़े दीर्घकालिक प्रभाव के व्यापक मूल्यांकन से ही किया जा सकता है।

अनंत सिंह के ‘नौ हत्याओं’ वाले बयान पर पीके की प्रतिक्रिया

मोकामा विधायक अनंत सिंह के उस बयान को लेकर भी प्रशांत किशोर से सवाल किया गया, जिसमें उन्होंने नीतीश कुमार के साथ रहने के संदर्भ में नौ हत्याओं का उल्लेख किया था। बाद में अनंत सिंह ने सफाई देते हुए दावा किया कि उनका आशय अपने परिवार के सदस्यों की हत्या से था। उन्होंने कहा था कि राजद शासन के दौरान नीतीश कुमार से उनकी नजदीकी के कारण उनके परिवार के लोगों की हत्या हुई थी और उनकी बात को गलत समझा गया।इस विवाद पर प्रशांत किशोर ने कहा कि अनंत सिंह जदयू से जुड़े हैं और जदयू सरकार का हिस्सा है, जबकि राजद मुख्य विपक्षी दल है। ऐसे में दोनों दलों को आपस में बात करनी चाहिए। यदि दोनों दल उचित समझें, तो मामले की जांच भी कराई जा सकती है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि जन सुराज पार्टी को इस विवाद में कुछ नहीं कहना है।पीके की इस प्रतिक्रिया में सीधे आरोप लगाने के बजाय संबंधित राजनीतिक दलों को जवाबदेही तय करने की सलाह दिखाई देती है। हालांकि, यदि किसी बयान से किसी अपराध के संबंध में जांच योग्य तथ्य सामने आते हैं, तो मामले का परीक्षण सक्षम एजेंसियों द्वारा कानून के अनुसार किया जाना चाहिए। राजनीतिक दलों के बीच बातचीत और औपचारिक कानूनी जांच अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।

वैशाली नाव हादसा: 13 बच्चों की मौत पर सरकार को घेरा

प्रशांत किशोर ने वैशाली जिले में हुए नाव हादसे को लेकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर भी निशाना साधा। उपलब्ध विवरण के अनुसार, हादसे में 13 बच्चों की मौत हुई थी। यह घटना प्रभावित परिवारों और स्थानीय समुदाय के लिए गहरा सदमा लेकर आई।

पीके ने इसे गंभीर दुर्घटना बताते हुए कहा कि किसी विकसित देश में इतनी बड़ी घटना होने पर सरकार को गंभीर जवाबदेही का सामना करना पड़ता। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी घटनास्थल वाले गांव में नहीं गए, क्योंकि वह नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के विधानसभा क्षेत्र में आता है।यह आरोप राजनीतिक रूप से गंभीर है, लेकिन मुख्यमंत्री के दौरा नहीं करने के पीछे यही कारण था, इसे स्वतंत्र पुष्टि के बिना स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।

फिर भी, हादसे में बच्चों की मौत ने प्रशासनिक जवाबदेही, सुरक्षा इंतजामों और प्रभावित परिवारों को दी जाने वाली सहायता पर महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। ऐसी घटनाओं के बाद सरकार से अपेक्षा होती है कि वह बचाव कार्य, राहत, मुआवजा, दुर्घटना के कारणों की जांच और भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के उपायों की स्पष्ट जानकारी दे।

प्रशांत किशोर ने कहा कि हादसे में जान गंवाने वाले बच्चों के परिवारों को मदद और संवेदना की जरूरत है। उन्होंने दशहरा के दिन, 20 अक्टूबर को गांव जाने और शोकाकुल परिवारों के साथ समय बिताने का निर्णय भी बताया था।परिवारों के साथ समय बिताने और उनकी जरूरतों को समझने का यह ऐलान जन सुराज के लिए सामाजिक संपर्क का अवसर भी बन सकता है।

लेकिन इस घटना की गंभीरता को देखते हुए राजनीतिक दौरे से आगे ठोस सहायता, जवाबदेही और सुरक्षा सुधार अधिक महत्वपूर्ण होंगे।

सम्राट चौधरी सरकार के सामने जवाबदेही की कसौटी

वैशाली हादसे पर पीके की आलोचना ऐसे समय आई है, जब बिहार में नई सरकार के कामकाज और कानून-व्यवस्था को लेकर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं।इस प्रकरण में सरकार के सामने कुछ बुनियादी सवाल हैं:

हादसे के कारणों की जांच किस स्तर तक पहुंची है?

मृत बच्चों के परिवारों को क्या सहायता दी गई और क्या कोई राहत बाकी है?

भविष्य में नदी पार करने, नाव संचालन और बच्चों की सुरक्षा को लेकर क्या अतिरिक्त इंतजाम किए जाएंगे?

दुर्घटना के लिए यदि कोई प्रशासनिक लापरवाही जिम्मेदार पाई जाती है, तो जवाबदेही कैसे तय होगी?

इन सवालों का जवाब राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि आधिकारिक जांच, राहत के विवरण और प्रशासनिक कार्रवाई से मिलना चाहिए।

राजनीतिक विश्लेषण: पीके के बयान में तीन अलग संदेश

प्रशांत किशोर की टिप्पणियों को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है।

पहला—नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत।

नीतीश कुमार को बिहार के दस बेहतरीन नेताओं में शामिल करने की बात उनके शासनकाल के योगदान को स्वीकार करने का संकेत है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि पीके की आलोचना का हर पहलू नीतीश कुमार के पूरे राजनीतिक जीवन को खारिज करने के समान नहीं है।

दूसरा—अनंत सिंह प्रकरण में दूरी।

पीके ने इस विवाद में सीधे किसी पक्ष का समर्थन करने के बजाय जदयू और राजद को आपस में बात करने की सलाह दी। इससे जन सुराज ने तत्काल विवाद में किसी पक्ष के साथ खड़े होने से परहेज किया।

तीसरा—सम्राट चौधरी सरकार की जवाबदेही।

वैशाली नाव हादसे के जरिए पीके ने सरकार की संवेदनशीलता और दुर्घटना के बाद उसकी प्रतिक्रिया पर सवाल उठाया। यह आलोचना तभी ठोस राजनीतिक आधार हासिल करेगी, जब घटनास्थल के दौरे, राहत और जांच से जुड़े तथ्य भी स्पष्ट हों।

इन तीनों मुद्दों को एक साथ देखने पर पता चलता है कि पीके की राजनीति केवल एक नेता की तारीफ या दूसरे की आलोचना तक सीमित नहीं है। वह पुराने नेतृत्व की विरासत, मौजूदा सत्ता की जवाबदेही और अपनी पार्टी की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान—तीनों को एक साथ सामने रख रहे हैं।

विपक्ष की राजनीति और जन सुराज की रणनीति

नीतीश कुमार पर प्रशांत किशोर की टिप्पणी को राजद और कांग्रेस सहित विपक्षी दल अपने-अपने राजनीतिक नजरिए से देख सकते हैं। वैशाली हादसे पर सरकार की आलोचना विपक्ष को प्रशासनिक जवाबदेही का मुद्दा उठाने का अवसर देती है। वहीं, नीतीश कुमार की प्रशंसा यह संकेत देती है कि पीके बिहार की राजनीति को केवल मौजूदा सत्ता बनाम विपक्ष के पारंपरिक खांचे में नहीं रख रहे हैं।

हालांकि, इन बयानों पर राजद, कांग्रेस या अन्य विपक्षी नेताओं की कोई विशिष्ट सत्यापित प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं होने के कारण उनके नाम से बयान जोड़ना उचित नहीं होगा।जन सुराज के लिए चुनौती यह भी है कि वह अपनी आलोचना को ठोस नीतिगत प्रस्तावों में बदले। यदि पार्टी सरकार की जवाबदेही, दुर्घटना से सुरक्षा और प्रशासनिक सुधार की बात करती है, तो उसे अपने सुझावों और संभावित समाधानों को भी सामने रखना होगा।

एनएसके निष्कर्ष:

तारीफ के पीछे सियासत, आलोचना के केंद्र में जवाबदेही

प्रशांत किशोर का नीतीश कुमार को बिहार के दस बेहतरीन नेताओं में शामिल करने का बयान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उस नेता के योगदान की स्वीकारोक्ति है जिसका वह लंबे समय से विरोध करते रहे हैं। लेकिन इसके साथ सत्ता संचालन पर लगाए गए आरोप यह भी दिखाते हैं कि पीके नीतीश कुमार की विरासत और उनके कार्यकाल के विवादित पहलुओं को अलग-अलग करके देखना चाहते हैं।

अनंत सिंह के बयान पर उन्होंने जदयू और राजद को आपस में बातचीत करने की सलाह दी, जबकि वैशाली नाव हादसे पर सम्राट चौधरी सरकार से जवाबदेही की मांग की।

बिहार की राजनीति में असली सवाल अब यह है कि नेताओं की तारीफ और आलोचना से आगे बढ़कर जनता को क्या मिलता है—बेहतर शासन, सुरक्षित परिवहन, दुर्घटनाओं के बाद प्रभावी राहत और प्रशासनिक जवाबदेही या केवल एक-दूसरे पर आरोप लगाने का नया दौर?

नीतीश कुमार की ऐतिहासिक भूमिका का मूल्यांकन समय करेगा। लेकिन वैशाली में जान गंवाने वाले बच्चों के परिवारों के लिए जवाबदेही और सहायता का सवाल आज का है।

सरकार, विपक्ष और जन सुराज—सभी की राजनीतिक विश्वसनीयता इसी कसौटी पर परखी जाएगी कि वे इस त्रासदी के बाद क्या ठोस कदम उठाते हैं।

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