बी के झा
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नई दिल्ली/ढाका, 10 अगस्त
बांग्लादेश के साथ रिश्तों में तल्खी, सीमा पर बढ़ती संवेदनशीलता, ढाका और इस्लामाबाद के बीच बढ़ता सैन्य-सामरिक संपर्क और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को लेकर दोनों देशों के बीच जारी मतभेदों के बीच एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने दिल्ली से ढाका तक सुरक्षा गलियारों में हलचल बढ़ा दी है।मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत के चार सुरक्षा अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल बांग्लादेश की सेना की खुफिया एजेंसी डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फोर्सेज इंटेलिजेंस (DGFI) के निमंत्रण पर ढाका पहुंचा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारतीय अधिकारी एयर इंडिया की उड़ान से ढाका पहुंचे और उनके ठहरने तथा अन्य व्यवस्थाओं का जिम्मा DGFI ने संभाला।
हालांकि, भारतीय या बांग्लादेशी सरकार की ओर से इस प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों, उनके पद या यात्रा के एजेंडे की सार्वजनिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। यही वजह है कि इस दौरे को लेकर जितने सवाल हैं, उतने ही जवाब फिलहाल पर्दे के पीछे हैं।लेकिन एक बात निर्विवाद है—जब दो पड़ोसी देशों के बीच राजनीतिक और सुरक्षा संबंध संवेदनशील दौर से गुजर रहे हों और उनकी सैन्य खुफिया एजेंसियां संपर्क में हों, तो ऐसी किसी भी बैठक का रणनीतिक महत्व सामान्य राजनयिक मुलाकात से कहीं अधिक होता है।
सवाल सबसे बड़ा—DGFI ने भारतीय अधिकारियों को क्यों बुलाया?
यदि रिपोर्ट सही है तो सबसे पहला सवाल यही है कि बांग्लादेश की सैन्य खुफिया एजेंसी DGFI ने भारतीय सुरक्षा अधिकारियों को किस उद्देश्य से बुलाया?
क्या यह नियमित सुरक्षा संवाद है?
क्या सीमा प्रबंधन, तस्करी, घुसपैठ और आतंकवाद पर बातचीत होनी है?
क्या पूर्वोत्तर भारत से जुड़े सुरक्षा मुद्दे एजेंडे में हैं?
या फिर दोनों देशों के बीच राजनीतिक रिश्तों में आई दरार के बावजूद सुरक्षा चैनल को सक्रिय रखने की रणनीति है?
इनमें से किसी संभावना की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन भारत और बांग्लादेश के बीच भौगोलिक निकटता ऐसी है कि दोनों देशों के लिए सुरक्षा संवाद पूरी तरह बंद कर देना व्यावहारिक विकल्प नहीं हो सकता।भारत की बांग्लादेश के साथ लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा, सीमा पार अपराध, अवैध आवाजाही, हथियार और मादक पदार्थों की तस्करी तथा उग्रवादी नेटवर्क से जुड़े मुद्दे दोनों देशों के सुरक्षा तंत्र को सीधे प्रभावित करते हैं।यानी राजनीति चाहे जितनी दूर चली जाए, सुरक्षा तंत्र को संवाद की खिड़की खुली रखनी पड़ती है।
तारिक रहमान से भारतीय उच्चायुक्त की मुलाकात ने बढ़ाई टाइमिंग की अहमियत
इस खबर की टाइमिंग इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि भारत और बांग्लादेश के बीच शीर्ष स्तर पर संपर्क जारी है।10 अगस्त को भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान से मुलाकात की। यह बैठक ऐसे समय हुई जब दोनों देशों के बीच संबंधों को नए सिरे से संतुलित करने की कोशिशें चल रही हैं।इससे पहले जुलाई के अंत में भारतीय उच्चायुक्त ने कहा था कि नई दिल्ली प्रधानमंत्री तारिक रहमान की भारत यात्रा का बेसब्री से इंतजार कर रही है। भारत ने उन्हें नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में विशेष अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया है। बांग्लादेश ने उस निमंत्रण को उस समय ‘विचाराधीन’ बताया था।इसलिए अगर DGFI के साथ भारतीय सुरक्षा अधिकारियों की बैठक की खबर सही है, तो इसे केवल अलग-थलग घटना मानना कठिन होगा।
एक तरफ राजनीतिक नेतृत्व के बीच संपर्क, दूसरी तरफ सुरक्षा तंत्र के बीच संभावित संवाद—क्या दिल्ली और ढाका रिश्तों को दो समानांतर पटरियों पर आगे बढ़ा रहे हैं?
शेख हसीना के बाद बदले समीकरण
बांग्लादेश के राजनीतिक परिवर्तन के बाद भारत के लिए सबसे कठिन प्रश्नों में से एक पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का भारत में रहना और ढाका की ओर से उनके प्रत्यर्पण की मांग रहा है।भारत और बांग्लादेश के बीच यह मुद्दा लगातार संवेदनशील बना हुआ है। जुलाई के अंत में बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने भी भारत के साथ रिश्तों में मौजूद कुछ ‘इरिटेंट्स’ को दूर करने की जरूरत की बात कही थी और स्पष्ट किया था कि सभी द्विपक्षीय मुद्दों पर भविष्य में बातचीत होगी।ऐसे वातावरण में सुरक्षा एजेंसियों के बीच बातचीत का महत्व और बढ़ जाता है।क्योंकि कूटनीति का एक चेहरा सार्वजनिक होता है—प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री और राजदूत।लेकिन उसका दूसरा चेहरा सुरक्षा और खुफिया संवाद होता है, जो अक्सर सार्वजनिक बयानबाजी से अलग रास्ते पर चलता है।
क्या पाकिस्तान का फैक्टर भी है?
भारत के रणनीतिक हलकों में बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच बढ़ते संपर्क पर नजर बनी हुई है।पिछले समय में पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच सैन्य एवं रक्षा संबंधों को लेकर कई रिपोर्टें सामने आई हैं। हालांकि कथित ISI-DGFI संयुक्त तंत्र या भारत विरोधी किसी विशेष ऑपरेशनल नेटवर्क के बारे में उपलब्ध सार्वजनिक सामग्री में ठोस आधिकारिक पुष्टि नहीं है।इसलिए यह कहना कि ‘ढाका पूरी तरह ISI के हाथों में चला गया है’, तथ्यात्मक रूप से अभी उचित नहीं होगा।लेकिन यह भी रणनीतिक वास्तविकता है कि भारत किसी भी पड़ोसी देश में पाकिस्तान की सैन्य या खुफिया पहुंच को नजरअंदाज नहीं कर सकता।विशेषकर तब, जब बांग्लादेश भारत के पूर्वोत्तर के बेहद करीब हो।
रक्षा विशेषज्ञों के लिए यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र पहले से ही भौगोलिक और सुरक्षा दृष्टि से संवेदनशील है।
रक्षा विशेषज्ञों का मूल सवाल—संवाद कमजोरी है या रणनीति?
रक्षा मामलों के जानकारों के नजरिए से देखें तो किसी दूसरे देश की सुरक्षा एजेंसी से बातचीत करना अपने आप में कमजोरी का संकेत नहीं है।बल्कि कई बार सबसे कठिन परिस्थितियों में संवाद बनाए रखना ही रणनीतिक ताकत होता है।खुफिया एजेंसियों के बीच संपर्क का उद्देश्य केवल दोस्ती नहीं होता। इसका एक उद्देश्य गलतफहमी रोकना भी होता है।सीमा पर कोई अप्रत्याशित घटना हो जाए, कोई संदिग्ध नेटवर्क सक्रिय हो जाए या किसी तीसरे देश की गतिविधि से दोनों देशों की सुरक्षा प्रभावित होने लगे—तब सीधे संवाद का चैनल मौजूद होना महत्वपूर्ण होता है।
लेकिन दूसरी ओर विशेषज्ञ यह सवाल भी उठा सकते हैं कि यदि बांग्लादेश की सुरक्षा नीति में पाकिस्तान की भूमिका बढ़ रही है, तो भारत को सुरक्षा सहयोग करते समय अत्यधिक सावधानी, स्पष्ट शर्तों और पारस्परिक सत्यापन की नीति अपनानी चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में—दिल्ली की ‘दोहरी रणनीति’
राजनीतिक विश्लेषकों के लिए इस घटनाक्रम की सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारत एक तरफ बांग्लादेश के साथ अपने मतभेदों पर कठोर रुख बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर संवाद के दरवाजे बंद नहीं कर रहा।यह विरोधाभास नहीं, बल्कि कूटनीति का हिस्सा हो सकता है।नई दिल्ली शायद यह संदेश देना चाहती है कि—राजनीतिक असहमति अपनी जगह, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल पर संवाद बंद नहीं होगा।यही कारण है कि राजनयिक स्तर पर बातचीत जारी है और अब सुरक्षा स्तर पर संभावित संपर्क की खबर सामने आई है।भारत के लिए यह नीति इसलिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि बांग्लादेश में सत्ता बदल चुकी है और नई दिल्ली को नई राजनीतिक व्यवस्था के साथ काम करना ही होगा।
भारत के पास विकल्प दो ही हैं—या तो दूरी बनाकर घटनाक्रम को बाहर से देखे, या फिर संवाद के जरिए अपने हितों की रक्षा करे।
रणनीतिक दृष्टि से दूसरा विकल्प ज्यादा व्यावहारिक दिखाई देता है।
शिक्षाविदों की चिंता—क्या जनता को भी जानकारी मिलेगी?
यहां सवाल केवल विदेश नीति का नहीं, लोकतांत्रिक पारदर्शिता का भी है।राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकार हर जानकारी सार्वजनिक नहीं कर सकती। यह स्वाभाविक है।लेकिन यदि विदेश की किसी सुरक्षा एजेंसी के निमंत्रण पर भारतीय अधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल जाता है, तो कम से कम इतना स्पष्ट किया जा सकता है कि यात्रा का व्यापक उद्देश्य क्या था—सीमा सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग, अवैध गतिविधियां, या कोई अन्य विषय?
शिक्षाविदों का तर्क हो सकता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा की गोपनीयता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के बीच संतुलन बनाया जाना चाहिए। जनता को संवेदनशील ऑपरेशनल जानकारी नहीं चाहिए, लेकिन नीति की दिशा जानने का अधिकार लोकतंत्र में बना रहता है।
समाजसेवी संगठनों का सवाल—सीमा पर तनाव है तो सरकार बताए तस्वीर क्या है?
सीमा से जुड़े सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों के लिए सबसे बड़ा प्रश्न जमीनी स्थिति का है।यदि सीमा पर तनाव है, तो सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में है या नहीं।यदि बांग्लादेश के साथ सुरक्षा सहयोग जारी है, तो उसका लाभ सीमा पर रहने वाले भारतीय नागरिकों तक कैसे पहुंचेगा? और यदि दोनों देशों की एजेंसियां बातचीत कर रही हैं, तो क्या इसका उद्देश्य सीमा पार अपराध और अवैध गतिविधियों पर लगाम लगाना भी है?इन सवालों का जवाब केवल कूटनीतिक गलियारों में नहीं, बल्कि संसद और सार्वजनिक विमर्श में भी होना चाहिए।
विपक्ष क्या कहेगा—सरकार को संसद में जवाब देना चाहिए?
विपक्षी दलों की ओर से इस मामले पर कोई स्पष्ट, आधिकारिक प्रतिक्रिया फिलहाल उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी दल या नेता के नाम से काल्पनिक बयान देना उचित नहीं होगा।लेकिन विपक्ष की संभावित राजनीतिक आपत्ति का केंद्र स्वाभाविक रूप से यही हो सकता है कि सरकार बांग्लादेश के साथ संबंधों को लेकर अपनी नीति स्पष्ट करे।
यदि भारत के सुरक्षा अधिकारी वास्तव में DGFI के निमंत्रण पर गए हैं, तो विपक्ष यह पूछ सकता है—जब सीमा पर तनाव है, जब शेख हसीना का मुद्दा लंबित है और जब ढाका के पाकिस्तान के साथ संपर्क बढ़ रहे हैं, तब भारत की सुरक्षा नीति क्या है?
क्या यह विश्वास बहाली की पहल है?
क्या यह बैक-चैनल डिप्लोमेसी है?
या केवल पेशेवर सुरक्षा संवाद?
सरकार की स्पष्टता इस बहस को राजनीतिक अटकलों से बाहर निकाल सकती है।
भारत के लिए असली चुनौती—ढाका को नाराज किए बिना अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना
भारत के सामने सबसे कठिन संतुलन यही है।बांग्लादेश भारत का पड़ोसी है। दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं, सीमाएं, नदियां, व्यापार और लोगों के बीच संबंध एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं।इसलिए भारत के लिए बांग्लादेश को पूरी तरह अलग-थलग करना व्यावहारिक रणनीति नहीं है।लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही गंभीर है।मित्रता की नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा की नीति में अंतर होता है।भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि द्विपक्षीय सहयोग का इस्तेमाल भारत की सुरक्षा चिंताओं के विरुद्ध न हो।
विशेष रूप से पूर्वोत्तर, पश्चिम बंगाल और सीमा से लगे क्षेत्रों की सुरक्षा के मामले में कोई जोखिम नहीं लिया जा सकता।अगर चार अधिकारी सचमुच पहुंचे हैं, तो तीन सवाल सबसे महत्वपूर्ण
पहला—किसके निमंत्रण पर गए?यदि निमंत्रण DGFI का था तो किस स्तर पर संपर्क हुआ और उसका उद्देश्य क्या था?
दूसरा—एजेंडा क्या था?क्या सीमा सुरक्षा, आतंकवाद, कट्टरपंथ, तस्करी और उग्रवाद पर बातचीत हुई?
तीसरा—क्या कोई आगे की व्यवस्था बनी?क्या दोनों देशों की सुरक्षा एजेंसियों के बीच नियमित संवाद या हॉटलाइन जैसे किसी तंत्र को मजबूत करने पर बात हुई?
इन तीन सवालों के जवाब ही यह तय करेंगे कि यह यात्रा सामान्य सुरक्षा संपर्क थी या भारत-बांग्लादेश संबंधों में किसी बड़े रणनीतिक बदलाव का संकेत।
निष्कर्ष:
रिश्ते बिगड़े हैं, लेकिन संवाद खत्म नहीं हुआ
भारत-बांग्लादेश संबंध आज उस मोड़ पर हैं जहां भावनाओं से ज्यादा रणनीति की जरूरत है।ढाका की राजनीति बदल चुकी है। नई दिल्ली को नई वास्तविकता के साथ तालमेल बैठाना है, पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश के बढ़ते संपर्क पर नजर रखनी है, सीमा की सुरक्षा करनी है।
शेख हसीना से जुड़े विवाद का समाधान तलाशना है। साथ ही दोनों देशों के बीच आर्थिक और जनस्तरीय संबंधों को भी बचाए रखना है।ऐसे समय में यदि DGFI के निमंत्रण पर भारतीय सुरक्षा अधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल ढाका पहुंचा है, तो इसे महज एक यात्रा मानना भूल होगी।
यह संभवतः उस संदेश का हिस्सा है कि भारत राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सुरक्षा संवाद की डोर अपने हाथ से नहीं छोड़ना चाहता।
लेकिन जनता के मन में उठ रहा सवाल भी जायज है—जब पड़ोसी के साथ रिश्तों में खटास है, सीमा पर संवेदनशीलता है और क्षेत्र में पाकिस्तान-चीन की सक्रियता बढ़ रही है, तब ढाका में भारतीय सुरक्षा अधिकारियों की मौजूदगी आखिर किस बड़े समीकरण की भूमिका लिख रही है?
इस सवाल का पूरा जवाब शायद अभी सार्वजनिक न हो।लेकिन इतना तय है कि दक्षिण एशिया की कूटनीति में सबसे महत्वपूर्ण बातचीत कई बार प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं, बंद दरवाजों के पीछे होती है।और ढाका में हुई यह कथित सुरक्षा बैठक उसी बंद दरवाजे के पीछे चल रही किसी बड़ी बातचीत की दस्तक हो सकती है।
