बी के झा
NSK news Ind
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हैदराबाद, 10 अगस्त
नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च (NALSAR), हैदराबाद का आगामी दीक्षांत समारोह इस बार डिग्री, उपलब्धियों और शैक्षणिक गौरव से ज्यादा एक गंभीर संवैधानिक बहस का मंच बनता दिखाई दे रहा है। विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह का मुख्य अतिथि बनाए जाने के प्रस्ताव पर आपत्ति जताई है। छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से इस निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की है।छात्रों का कहना है कि उनका विरोध CJI के पद या न्यायपालिका की संस्था के प्रति नहीं, बल्कि 22 जुलाई को जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित पुलिस ज्यादती से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई उनकी टिप्पणियों को लेकर है।
Times of India की रिपोर्ट के अनुसार विश्वविद्यालय प्रशासन को अलग-अलग बैचों की ओर से कम से कम छह पत्र दिए गए हैं। छात्रों का दावा है कि इन पत्रों पर कुल मिलाकर लगभग 350 से 450 छात्रों के हस्ताक्षर हैं। हालांकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। विश्वविद्यालय की ओर से भी अभी तक इन पत्रों पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
सवाल सिर्फ एक मुख्य अतिथि का नहीं, संस्थागत मूल्यों का है
कानून के विद्यार्थियों की आपत्ति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है। छात्रों ने अपने पत्र में तर्क दिया है कि दीक्षांत समारोह महज डिग्री बांटने का औपचारिक आयोजन नहीं होता। यह वह अवसर होता है जब विश्वविद्यालय अपने विद्यार्थियों को यह संदेश देता है कि कानून, संविधान, न्याय और नागरिक अधिकारों के प्रति उसकी वास्तविक प्रतिबद्धता क्या है।छात्रों का कहना है कि जिस संस्थान में उन्हें संवैधानिक अधिकार, न्याय तक पहुंच, नागरिक स्वतंत्रता और शिकायतों पर तार्किक विचार-विमर्श की शिक्षा दी जाती है, वहां दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि का चयन भी इन्हीं मूल्यों का प्रतिबिंब होना चाहिए।यही वह बिंदु है जिसने NALSAR के विवाद को सामान्य विश्वविद्यालयी विरोध से उठाकर संवैधानिक विमर्श का विषय बना दिया है।
विवाद की जड़ में 22 जुलाई की सुनवाई
22 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ कथित पुलिस कार्रवाई से संबंधित मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने की मांग की गई थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार वकील ने कथित पुलिस कार्रवाई के वीडियो भी अदालत के सामने रखने की बात कही।इसी दौरान CJI सूर्यकांत की ओर से यह टिप्पणी सामने आई कि अदालत के पास वीडियो देखने का समय नहीं है और ‘हम आपका समय और अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहते’ जैसी टिप्पणी की रिपोर्ट हुई। इस टिप्पणी ने प्रदर्शनकारी छात्रों और कानून के विद्यार्थियों के एक वर्ग को नाराज कर दिया।NALSAR के छात्रों ने इसी प्रसंग को अपने विरोध का आधार बनाया है।लेकिन इस कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
CJI ने बाद में दी सफाई—कोई औपचारिक याचिका दाखिल ही नहीं हुई थी
24 जुलाई को CJI सूर्यकांत ने उन खबरों का खंडन किया जिनमें यह कहा जा रहा था कि उन्होंने पुलिस कार्रवाई के खिलाफ दाखिल याचिका की सुनवाई या लिस्टिंग से इनकार किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत के सामने उस समय कोई औपचारिक याचिका दाखिल नहीं हुई थी, बल्कि एक वकील ने प्रतिनिधित्व के जरिए मामला उठाया था।यानी छात्रों की आपत्ति जिस घटना को आधार बनाकर खड़ी हुई है, उसका कानूनी संदर्भ केवल एक टिप्पणी तक सीमित नहीं है। अदालत की प्रक्रिया और उस समय दाखिल दस्तावेज की स्थिति भी इस विवाद को समझने के लिए जरूरी है।
फिर सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया?
विवाद को समझने में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इसके कुछ दिनों बाद सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर और अन्य स्थानों पर प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस ज्यादती से जुड़े मामलों पर गंभीरता से सुनवाई की।28 जुलाई की सुनवाई में CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ तत्काल कठोर कार्रवाई पर रोक संबंधी निर्देश दिए और बिना आपराधिक पृष्ठभूमि वाले हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को रिहा करने का निर्देश दिया। अदालत ने कथित पुलिस excesses के आरोपों को प्रथमदृष्टया स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच योग्य माना तथा CCTV, ड्रोन, बॉडी-कैमरा और पुलिस रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के निर्देश दिए।27 जुलाई की सुनवाई में भी अदालत ने स्पष्ट किया कि महज प्रदर्शन करना पुलिस को लाठीचार्ज या अत्यधिक बल प्रयोग का स्वतः अधिकार नहीं देता। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों की हिंसा और पुलिस के अत्यधिक बल प्रयोग—दोनों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।यहीं से NALSAR विवाद में एक बड़ा विरोधाभास सामने आता है।
एक ओर छात्र 22 जुलाई की टिप्पणी को न्यायिक संवेदनशीलता की कसौटी पर परख रहे हैं, दूसरी ओर उसी न्यायपालिका ने बाद की सुनवाई में प्रदर्शनकारियों के अधिकारों और पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए।
क्या छात्रों का विरोध न्यायपालिका विरोधी है?
NALSAR के छात्र इससे इनकार कर रहे हैं।स्टूडेंट बार काउंसिल से जुड़े एक छात्र के अनुसार, CJI के पद का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन कानून के विद्यार्थियों के रूप में वे संविधान और संवैधानिक मूल्यों को सर्वोपरि मानते हैं।यहां एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रश्न पैदा होता है—क्या किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की आलोचना उस संस्था का विरोध मानी जानी चाहिए?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसका उत्तर सहज रूप से ‘नहीं’ होना चाहिए। न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि न्यायाधीशों या न्यायिक टिप्पणियों पर सार्वजनिक विमर्श समाप्त हो जाए। इसी प्रकार विद्यार्थियों की असहमति का अर्थ भी यह नहीं कि वे न्यायपालिका की संस्था को अस्वीकार कर रहे हैं। कानून विश्वविद्यालयों में असहमति स्वयं लोकतांत्रिक प्रशिक्षण का हिस्सा है।
राजनीतिक रंग भी गहराने लगा
जंतर-मंतर आंदोलन का मूल विवाद शिक्षा व्यवस्था और NEET-UG 2026 से जुड़े आरोपों से जुड़ा था, लेकिन धीरे-धीरे यह आंदोलन राजनीतिक बहस का हिस्सा भी बन गया।भाजपा ने आंदोलन के आयोजकों के राजनीतिक संबंधों पर सवाल उठाए और इसे AAP तथा अरविंद केजरीवाल से जोड़कर राजनीतिक परियोजना बताया। दूसरी ओर विपक्ष के कुछ नेताओं ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल खड़े किए। शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की कथित चुप्पी पर हमला बोला।
लेकिन NALSAR के मामले में अभी तक केंद्र सरकार की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, जिसमें विश्वविद्यालय के मुख्य अतिथि के रूप में CJI सूर्यकांत को लेकर छात्रों की आपत्ति पर प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया दी गई हो।इसलिए इस विवाद को सीधे ‘सरकार बनाम छात्र’ या ‘विपक्ष बनाम न्यायपालिका’ का रंग देना फिलहाल जल्दबाजी होगी।
शिक्षाविदों के लिए भी परीक्षा की घड़ी
इस पूरे विवाद का एक दूसरा पहलू विश्वविद्यालय की स्वायत्तता से जुड़ा है।एक कानून विश्वविद्यालय को अपने दीक्षांत समारोह में किसे मुख्य अतिथि बनाना चाहिए—यह मूलतः अकादमिक और संस्थागत निर्णय है। लेकिन जब चयन को लेकर विद्यार्थियों का एक बड़ा वर्ग लिखित आपत्ति दर्ज कराता है, तब प्रशासन के सामने केवल अतिथि तय करने का सवाल नहीं रहता।उसे यह भी तय करना होता है कि वह असहमति को कैसे सुनेगा।यदि विश्वविद्यालय बिना किसी संवाद के छात्रों की आपत्ति खारिज करता है, तो यह प्रशासनिक कठोरता के रूप में देखा जा सकता है। दूसरी ओर यदि केवल छात्र दबाव में आकर मुख्य अतिथि बदल दिया जाता है, तो इससे भविष्य में किसी भी संवैधानिक या राजनीतिक रूप से विवादित व्यक्ति के खिलाफ अभियान चलाने की परंपरा भी बन सकती है। इसलिए सबसे लोकतांत्रिक रास्ता शायद निर्णय से पहले संवाद का है।
कानूनविदों के सामने मूल प्रश्न
कानून के क्षेत्र से जुड़े जानकारों के लिए विवाद का केंद्रीय प्रश्न यह है कि किसी न्यायिक टिप्पणी को उसके तत्काल संदर्भ में पढ़ा जाए या उसे न्यायाधीश की व्यापक संवैधानिक प्रतिबद्धता का संकेत माना जाए।कानून में प्रक्रिया का महत्व उतना ही है जितना परिणाम का। यदि औपचारिक याचिका दाखिल ही नहीं हुई थी, तो ‘याचिका खारिज करने’ का आरोप तकनीकी रूप से गलत हो सकता है। लेकिन अदालत में किसी वकील के साथ इस्तेमाल की गई भाषा के सार्वजनिक प्रभाव को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।विशेषकर तब, जब सामने बैठे लोग कानून के विद्यार्थी हों और वे अपने भविष्य को न्यायपालिका तथा संविधान की अवधारणाओं से जोड़कर देखते हों।
समाजसेवी संगठनों के लिए मुद्दा—प्रदर्शन का अधिकार और पुलिस की जवाबदेही
सिविल सोसायटी के दृष्टिकोण से यह विवाद दो मूल अधिकारों के बीच संतुलन की मांग करता है—शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की राज्य की जिम्मेदारी।संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता देता है, लेकिन ये अधिकार पूर्णतः निरंकुश नहीं हैं। वहीं राज्य की शक्ति भी असीमित नहीं है।यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट की बाद की टिप्पणियां महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
अदालत ने एक ओर पुलिस के अत्यधिक बल प्रयोग पर चिंता जताई, तो दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों के आचरण में अनुशासन की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
NALSAR प्रशासन के सामने अब तीन रास्ते
अब निगाहें NALSAR प्रशासन पर हैं।पहला रास्ता यह है कि विश्वविद्यालय छात्रों की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए अपने पारंपरिक निर्णय पर कायम रहे।
दूसरा रास्ता यह है कि वह CJI को निमंत्रण देने के निर्णय पर पुनर्विचार करे।
तीसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण रास्ता यह है कि विश्वविद्यालय छात्र प्रतिनिधियों, शिक्षकों और प्रशासन के बीच औपचारिक संवाद कराए और उसके बाद निर्णय ले।तीसरा रास्ता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे न तो न्यायपालिका के पद की गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगेगा और न विद्यार्थियों की असहमति को दबाने का संदेश जाएगा।
असली सवाल—डिग्री कौन देगा या कानून क्या सिखाएगा?
NALSAR का यह विवाद अंततः एक मुख्य अतिथि के चयन से कहीं बड़ा हो चुका है।यह उस बुनियादी सवाल तक पहुंच गया है कि कानून पढ़ाने वाली संस्था अपने विद्यार्थियों को आखिर क्या सिखाना चाहती है?
क्या कानून केवल अदालत की चारदीवारी में लागू होने वाले नियमों का संग्रह है?
या कानून नागरिक की आवाज, राज्य की शक्ति पर नियंत्रण, असहमति का सम्मान और संवैधानिक मर्यादा का भी नाम है?
यदि छात्र अपने विश्वविद्यालय से इन सवालों पर जवाब मांग रहे हैं, तो इसे केवल विरोध कहकर खारिज करना आसान जरूर है, लेकिन शायद पर्याप्त नहीं।और यदि विश्वविद्यालय CJI सूर्यकांत को ही मुख्य अतिथि बनाए रखता है, तब भी यह विवाद समाप्त नहीं होगा। बल्कि संभव है कि दीक्षांत समारोह स्वयं एक बड़े लोकतांत्रिक संवाद में बदल जाए।
क्योंकि उस दिन मंच पर केवल एक CJI नहीं होंगे—उनके सामने वे विद्यार्थी भी होंगे जिन्होंने कानून पढ़ते-पढ़ते यह सवाल पूछने का साहस किया है कि संविधान की किताब में लिखे आदर्श और सार्वजनिक जीवन में दिखाई देने वाला आचरण—इन दोनों के बीच दूरी कितनी होनी चाहिए?
यही NALSAR विवाद का सबसे गंभीर और सबसे असहज प्रश्न है।फिलहाल विश्वविद्यालय की ओर से छात्रों के पत्रों पर कोई औपचारिक उत्तर सामने नहीं आया है। इसलिए अंतिम निर्णय और उसके पीछे प्रशासन की दलील पर नजर बनी रहेगी।
