बी के झा
नई दिल्ली/ढाका, 9 अगस्त
1971 में भारत की निर्णायक भूमिका से अस्तित्व में आया बांग्लादेश आज दक्षिण एशिया के बदलते सामरिक समीकरण में एक बार फिर केंद्र में है। कभी भारत का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय साझेदार रहा ढाका अब पाकिस्तान और चीन के साथ अपने संबंधों को नए सिरे से विस्तार दे रहा है। दूसरी ओर भारत-बांग्लादेश संबंधों में राजनीतिक अविश्वास और कूटनीतिक तनाव के दौर ने नई दिल्ली के रणनीतिक हलकों में एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है—
क्या भारत की पूर्वी सीमा पर ऐसा भू-राजनीतिक समीकरण तैयार हो रहा है, जिसे नजरअंदाज करना आने वाले वर्षों में महंगा पड़ सकता है?
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के अगस्त 2024 में सत्ता से बाहर होने के बाद बांग्लादेश की राजनीति में जो बदलाव आया, उसने भारत की सुरक्षा गणना को भी प्रभावित किया है। पाकिस्तान के साथ ढाका के बढ़ते संपर्क, चीन की पहले से मौजूद आर्थिक-सामरिक पैठ और बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में बढ़ते ध्रुवीकरण ने इस आशंका को जन्म दिया है कि भारत को पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान और उत्तरी सीमा पर चीन के साथ-साथ पूर्व में भी एक जटिल सुरक्षा चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि, इस समय बांग्लादेश को ‘दूसरा पाकिस्तान’ घोषित करना या पूर्वी सीमा पर तत्काल ‘तीसरे युद्ध मोर्चे’ की घोषणा कर देना तथ्यों से आगे निकलना होगा। लेकिन बदलते घटनाक्रम को सामान्य पड़ोसी कूटनीति मानकर छोड़ देना भी रणनीतिक भूल हो सकती है।
1971 का मित्र, 2026 की नई चुनौती
भारत और बांग्लादेश के रिश्तों की नींव युद्ध, शरणार्थी संकट और मुक्ति संग्राम के दौर में पड़ी थी।शेख हसीना के लंबे शासनकाल में दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग का एक मजबूत ढांचा विकसित हुआ। भारत को बांग्लादेश से आतंकवाद विरोधी सहयोग मिला, जबकि बांग्लादेश को भारत के साथ व्यापार, संपर्क, ऊर्जा और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के क्षेत्र में लाभ हुआ।भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक उपलब्धियों में से एक यह रही कि पूर्वोत्तर में सक्रिय कई उग्रवादी संगठनों के लिए बांग्लादेशी धरती पर सुरक्षित ठिकानों की गुंजाइश काफी हद तक कम हुई।लेकिन 2024 के राजनीतिक परिवर्तन के बाद समीकरण बदल गए।
अब ढाका अपनी विदेश नीति में अधिक व्यापक विकल्प तलाश रहा है। पाकिस्तान के साथ राजनयिक और आर्थिक संपर्क बढ़े हैं, जबकि चीन पहले से ही बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।यही बदलाव भारत के लिए चिंता का विषय है।
पाकिस्तान की ढाका में वापसी—सिर्फ कूटनीति या रणनीतिक अवसर?
बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच रिश्तों में आई गर्माहट को नई दिल्ली में बारीकी से देखा जा रहा है।सीधी संपर्क व्यवस्था, व्यापारिक संबंधों और राजनयिक संवाद को बढ़ावा देने की कोशिशें यह संकेत देती हैं कि दोनों देश 1971 के बाद बने लंबे राजनीतिक फासले को कम करना चाहते हैं।
पाकिस्तान के लिए बांग्लादेश का महत्व असाधारण है।
1971 से पहले पूर्वी पाकिस्तान रहा यह क्षेत्र भारत के पूर्वी भूभाग से जुड़ा हुआ है।
आज स्वतंत्र बांग्लादेश के रूप में वही भूगोल पाकिस्तान को भारत के पूर्वी रणनीतिक क्षेत्र में अप्रत्यक्ष पहुंच का अवसर देता है।लेकिन यहां सावधानी जरूरी है।
बांग्लादेश का पाकिस्तान के करीब आना अपने आप में भारत-विरोधी सैन्य गठबंधन का प्रमाण नहीं है।
ढाका अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार विभिन्न शक्तियों से संबंध बढ़ा सकता है।
समस्या तब शुरू होगी जब इस कूटनीतिक नजदीकी का इस्तेमाल भारत-विरोधी आतंकवाद, विदेशी खुफिया गतिविधियों या सीमा पार अस्थिरता के लिए होने लगे।
सबसे बड़ा सवाल: क्या ISI ने बढ़ाई सक्रियता?
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की बांग्लादेश में गतिविधियों को लेकर कई मीडिया रिपोर्टों और रणनीतिक विश्लेषणों में दावे किए गए हैं।कुछ रिपोर्टों में ढाका में पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान की संभावित बढ़ती सक्रियता का उल्लेख किया गया है।लेकिन इन दावों को अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्वतंत्र प्रमाणों के आधार पर निर्णायक तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।भारत के लिए असली सुरक्षा चुनौती तब बनेगी जब किसी विदेशी खुफिया एजेंसी को बांग्लादेशी धरती से भारत-विरोधी नेटवर्क संचालित करने की वास्तविक क्षमता या अनुमति मिलने लगे।
इसलिए भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान की नजर केवल इस बात पर नहीं होगी कि—ढाका में कौन आया?
बल्कि इस पर होगी कि—कौन किससे मिल रहा है, किस नेटवर्क से जुड़ रहा है और उसका असर भारत की सुरक्षा पर क्या पड़ रहा है?‘
थर्ड फ्रंट’ का खतरा: युद्ध से पहले सुरक्षा की लड़ाई
भारत की सुरक्षा व्यवस्था लंबे समय से पाकिस्तान और चीन की दोहरी चुनौती के लिए तैयार रहती है।
पश्चिम में पाकिस्तान
उत्तर में चीन
ऐसे में यदि बांग्लादेश की धरती पर भारत-विरोधी आतंकी या कट्टरपंथी नेटवर्क को संरक्षण मिलने लगे तो यह भौगोलिक रूप से एक गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है।लेकिन इसे पारंपरिक युद्ध का तीसरा मोर्चा मानना फिलहाल उचित नहीं।
वास्तविक खतरा अधिक जटिल हो सकता है—
घुसपैठ, आतंकवाद, हथियारों की तस्करी, ड्रग्स, मानव तस्करी, ड्रोन, साइबर हमले, फर्जी सूचना और कट्टरपंथी नेटवर्क।यानी भविष्य का ‘थर्ड फ्रंट’ सीमा पर टैंक लेकर खड़ी सेना के रूप में नहीं, बल्कि हाइब्रिड सुरक्षा चुनौती के रूप में सामने आ सकता है।
पूर्वी सीमा की असली परीक्षा—4,096 किलोमीटर की संवेदनशील पट्टीभारत-बांग्लादेश सीमा लगभग 4,096 किलोमीटर लंबी है।पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम इस सीमा से जुड़े हैं।नदियों, जंगलों, पहाड़ियों और घनी आबादी वाले इलाकों के कारण सीमा प्रबंधन अपने आप में चुनौतीपूर्ण है।यही कारण है कि भारत के लिए बांग्लादेश के साथ सीमा सुरक्षा सहयोग का महत्व अत्यधिक है।
यदि राजनीतिक रिश्ते खराब होते हैं लेकिन सीमा सुरक्षा तंत्र के बीच संवाद बना रहता है तो जोखिम को नियंत्रित किया जा सकता है।लेकिन यदि राजनीतिक अविश्वास सुरक्षा सहयोग को भी प्रभावित करने लगे तो समस्या तेजी से गंभीर हो सकती है।
महत्वपूर्ण संकेत: BSF-BGB संवाद अभी भी जारी, तनाव के बावजूद दोनों देशों की सीमा सुरक्षा एजेंसियों के बीच संवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है
जून 2026 में भारत और बांग्लादेश के सीमा सुरक्षा बलों के महानिदेशक स्तर की बैठक में सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने, संयुक्त गश्त, रीयल-टाइम सूचना साझा करने और सीमा पार अपराध के खिलाफ सहयोग मजबूत करने पर सहमति बनी।यह एक महत्वपूर्ण संकेत है, इससे पता चलता है कि राजनीतिक रिश्तों में उतार-चढ़ाव के बावजूद दोनों देशों के सुरक्षा प्रतिष्ठान यह समझते हैं कि सीमा पर किसी बड़े संकट को रोकना दोनों के हित में है।
सीमावर्ती राज्यों की चिंता—
युद्ध नहीं, रोजमर्रा की सुरक्षापूर्वी सीमा से जुड़े राज्यों के लिए सबसे बड़ी चिंता किसी संभावित युद्ध की कल्पना से ज्यादा रोजमर्रा की सुरक्षा है।
सीमा पार तस्करी
अवैध आवागमन
मानव तस्करी
नशीले पदार्थों की आवाजाही
हथियारों की तस्करी
संगठित अपराध, और संभावित कट्टरपंथी नेटवर्क, इनसे निपटना स्थानीय प्रशासन, पुलिस, BSF और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों की साझा जिम्मेदारी है।
सीमावर्ती गांवों के नागरिकों के लिए भी सबसे बड़ा सवाल यही है—सीमा शांत रहे और उनका जीवन सामान्य रहे।
क्योंकि सीमा पर तनाव बढ़ता है तो उसका पहला असर आम नागरिक पर पड़ता है।
स्थानीय प्रशासन के लिए नई चुनौती—सुरक्षा और सामाजिक संतुलन दोनों
पूर्वी सीमा पर किसी भी बड़े सुरक्षा खतरे का असर केवल सैन्य प्रतिष्ठानों पर नहीं पड़ेगा, स्थानीय प्रशासन को एक साथ कई मोर्चों पर काम करना होगा, सीमा सुरक्षा।कानून-व्यवस्था, अवैध प्रवास की निगरानी, साइबर और सोशल मीडिया अफवाहों पर नियंत्रण, सामुदायिक तनाव रोकना और सीमावर्ती इलाकों में नागरिक सुविधाओं को मजबूत करना।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी विदेशी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करते समय पूरे समुदाय को संदेह की नजर से देखना उलटा नुकसान कर सकता है।
सुरक्षा एजेंसियों को व्यक्ति, संगठन और नेटवर्क के आधार पर कार्रवाई करनी होगी—समुदाय के आधार पर नहीं।
भारत सरकार के सामने कठिन संतुलन
नई दिल्ली के सामने सबसे बड़ी चुनौती है—सुरक्षा और कूटनीति का संतुलन
यदि भारत बांग्लादेश से पूरी तरह दूरी बना लेता है तो ढाका में चीन और पाकिस्तान के लिए जगह बढ़ सकती है
यदि भारत सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज करता है तो संभावित भारत-विरोधी नेटवर्क के लिए जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए भारत के लिए सबसे व्यावहारिक रणनीति होगी—कूटनीतिक संवाद जारी रखना, सीमा पर निगरानी बढ़ाना, आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस, आर्थिक और व्यापारिक संपर्क बनाए रखना, BSF-BGB तंत्र को सक्रिय रखना, बांग्लादेशी संस्थाओं और समाज के साथ संवाद बढ़ाना
रक्षा मंत्रालय के सामने सवाल—क्या पूर्वी मोर्चे को नए सिरे से देखना होगा?
भारत को बांग्लादेश के साथ युद्ध की तैयारी नहीं, बल्कि किसी भी संभावित सुरक्षा संकट के लिए तैयारी करनी होगी।इसके लिए पूर्वोत्तर में—आधुनिक सीमा निगरानी प्रणाली,ड्रोन और एंटी-ड्रोन क्षमता,बेहतर खुफिया नेटवर्क,तेज प्रतिक्रिया बल,साइबर निगरानी,सीमा सड़कों और संचार व्यवस्था,और तीनों सेनाओं तथा केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वयपर ध्यान बढ़ाना होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की तैयारी रक्षात्मक और निवारक होनी चाहिए, आक्रामक नहीं क्योंकि मजबूत सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य युद्ध शुरू करना नहीं, बल्कि युद्ध की संभावना को समाप्त करना होता है।
चीन का कोण—सबसे बड़ा अनदेखा किया गया पहलू बांग्लादेश में पाकिस्तान की बढ़ती सक्रियता की चर्चा के बीच चीन के प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।चीन बांग्लादेश का महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार है और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में उसकी बड़ी भूमिका रही है यदि पाकिस्तान और चीन दोनों ढाका में अपना प्रभाव बढ़ाते हैं तो भारत की रणनीतिक चुनौती निश्चित रूप से जटिल होगी।लेकिन इसे सीधे ‘भारत की घेराबंदी’ कहना भी उचित नहीं।बांग्लादेश स्वयं भी चीन, भारत, पाकिस्तान, अमेरिका और अन्य शक्तियों के बीच संतुलन बनाकर अपने आर्थिक और रणनीतिक हित साधने की कोशिश कर सकता है।इसीलिए भारत की सबसे बड़ी जरूरत होगी—ढाका को किसी एक शक्ति के पाले में जाने से रोकना नहीं, बल्कि भारत के साथ उसके रणनीतिक हितों को इतना मजबूत बनाना कि संबंधों में स्थायी दूरी पैदा न हो।
विपक्ष के सामने भी बड़ी जिम्मेदारी
बांग्लादेश की बदलती स्थिति पर विपक्ष सरकार से सवाल जरूर उठा सकता है।
क्या पूर्वी सीमा पूरी तरह सुरक्षित है?
क्या सरकार के पास बांग्लादेश में बदलते राजनीतिक और सुरक्षा समीकरण की पर्याप्त जानकारी है?
क्या पूर्वोत्तर को किसी संभावित हाइब्रिड सुरक्षा चुनौती के लिए तैयार किया गया है?
क्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच पर्याप्त समन्वय है?
ये सवाल लोकतंत्र में जरूरी हैं।लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में सरकार और विपक्ष को एक बुनियादी सहमति भी बनानी होगी—बांग्लादेश के राजनीतिक घटनाक्रम पर राजनीति हो सकती है, लेकिन भारत की सुरक्षा पर दलगत राजनीति नहीं होनी चाहिए।
क्या बांग्लादेश ‘दूसरा पाकिस्तान’ बनेगा?
यह सवाल जितना राजनीतिक रूप से आकर्षक है, रणनीतिक रूप से उतना ही जटिल।बांग्लादेश की अपनी अलग राष्ट्रीय पहचान है।उसका राजनीतिक इतिहास पाकिस्तान से अलग है।उसकी अर्थव्यवस्था, समाज और विदेश नीति की प्राथमिकताएं भी अलग हैं।इसलिए केवल पाकिस्तान के साथ बढ़ते संबंधों के आधार पर बांग्लादेश को पाकिस्तान की दूसरी प्रति मानना उचित नहीं।लेकिन भारत को यह भी समझना होगा कि विदेश नीति में जोखिमों का इंतजार नहीं किया जाता।
संभावित जोखिम को वास्तविक खतरा बनने से पहले रोकना ही रणनीतिक समझदारी है।
नई दिल्ली के लिए संदेश साफ है—घबराहट नहीं, तैयारी चाहिए
बांग्लादेश में बदलता राजनीतिक समीकरण भारत के लिए चुनौती जरूर है, लेकिन अभी इसे युद्ध का संकेत मानना उचित नहीं।भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी भौगोलिक स्थिति, आर्थिक क्षमता, सैन्य शक्ति और क्षेत्रीय कूटनीतिक प्रभाव है।नई दिल्ली को इसी ताकत का इस्तेमाल करना होगा।
सीमा पर सतर्कता
कूटनीति में सक्रियता
खुफिया तंत्र में मजबूती
पूर्वोत्तर का विकास।पड़ोसी देशों के साथ संपर्क और—आतंकवाद के खिलाफ कठोर कार्रवाई।
संपादकीय निष्कर्ष: ‘दूसरा पाकिस्तान’ नहीं बनने देना है—और बांग्लादेश को खोना भी नहीं है
भारत के लिए बांग्लादेश केवल एक पड़ोसी देश नहीं है।वह भारत के पूर्वोत्तर की सुरक्षा, बंगाल की खाड़ी की रणनीतिक स्थिरता, क्षेत्रीय संपर्क, व्यापार और दक्षिण एशिया की भू-राजनीति से सीधे जुड़ा हुआ है।
इसलिए ढाका में होने वाला हर बड़ा राजनीतिक बदलाव नई दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण है।पाकिस्तान से बढ़ती नजदीकी चिंता का कारण हो सकती है।
चीन का प्रभाव रणनीतिक चुनौती हो सकता है।
कट्टरपंथी संगठनों की संभावित सक्रियता सुरक्षा जोखिम बन सकती है।
लेकिन इन सभी आशंकाओं को प्रमाण के बिना अंतिम सत्य मान लेना भी उतना ही खतरनाक होगा।भारत को न तो आंखें बंद करनी हैं और न ही घबराकर दरवाजे बंद करने हैं।उसे सीमा पर चौकन्ना और कूटनीति में सक्रिय रहना है।
क्योंकि भारत की पूर्वी सीमा पर सबसे बड़ा खतरा किसी ‘तीसरे युद्ध मोर्चे’ का नाम नहीं है।सबसे बड़ा खतरा यह है कि एक मित्र पड़ोसी धीरे-धीरे किसी बाहरी शक्ति के रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र में चला जाए और भारत को इसका एहसास तब हो, जब बहुत देर हो चुकी हो।
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