अमेरिका का ‘टैरिफ हथियार’ फिर भारत पर! रूसी तेल खरीदने पर 100% तक शुल्क का रास्ता साफ, ट्रंप के निशाने पर भारत-चीन; सवाल—यूक्रेन युद्ध की नाकामी का दबाव नई दिल्ली पर क्यों?

बी के झा

NSK news Ind

वॉशिंगटन/नई दिल्ली, 9 अगस्त

अमेरिका और भारत के रिश्तों में रणनीतिक साझेदारी की चमक के बीच व्यापारिक तनाव का एक और बादल मंडरा रहा है। रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर भारी शुल्क लगाने की अमेरिकी कोशिश ने नई दिल्ली के सामने एक बार फिर वही पुराना सवाल खड़ा कर दिया है—

क्या अमेरिका भारत को साझेदार मानता है या अपनी वैश्विक रणनीति के दबाव को लागू करने के लिए एक आसान लक्ष्य?

अमेरिकी सीनेट ने रूस के खिलाफ प्रतिबंधों से जुड़े संशोधित विधेयक को भारी बहुमत से आगे बढ़ा दिया है। विधेयक राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों के सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान करता है। भारत और चीन संभावित रूप से सबसे अधिक प्रभावित देशों में हैं।लेकिन यह समझना जरूरी है कि सीनेट की मंजूरी का अर्थ यह नहीं कि भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ तत्काल लग गया है। विधेयक को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से भी गुजरना होगा और कानून बनने के बाद भी शुल्क लगाना राष्ट्रपति के निर्णय पर निर्भर रहेगा। इसमें संभावित छूट की व्यवस्था भी है।फिर भी इसका राजनीतिक और रणनीतिक संदेश बेहद बड़ा है।वॉशिंगटन रूस पर दबाव बनाने के लिए नई दिल्ली और बीजिंग की ऊर्जा खरीद को निशाना बनाने की तैयारी कर रहा है।और यहीं से भारत-अमेरिका संबंधों की असली परीक्षा शुरू होती है।

रूस को चोट पहुंचाने की अमेरिकी रणनीति, कीमत भारत क्यों चुकाए?

अमेरिकी तर्क सीधा है।

रूस की ऊर्जा खरीद से मॉस्को को राजस्व मिलता है और उसी राजस्व का इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध को जारी रखने में किया जा सकता है। इसलिए अमेरिका उन देशों पर दबाव बनाना चाहता है जो रूसी ऊर्जा खरीदते हैं।सीनेट में आगे बढ़े विधेयक के समर्थकों का कहना है कि इसका उद्देश्य रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था पर अधिकतम आर्थिक दबाव डालना है। विधेयक के समर्थकों ने विशेष रूप से भारत, चीन और अन्य बड़े रूसी ऊर्जा खरीदारों पर दबाव बनाने को अमेरिकी नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है।

लेकिन भारत का सवाल अलग है—यदि रूस पर प्रतिबंध लगाना लक्ष्य है तो भारत के सामान पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने से अमेरिकी उपभोक्ता, अमेरिकी कंपनियां और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला भी प्रभावित होगी।यही वह बिंदु है जहां अमेरिकी रणनीति आर्थिक दबाव से आगे बढ़कर भू-राजनीतिक दबाव का रूप लेती दिखाई देती है।

‘100 प्रतिशत’ का मतलब क्या है?

100 प्रतिशत टैरिफ का अर्थ यह नहीं कि भारत का पूरा व्यापार तत्काल बंद हो जाएगा।इसका अर्थ है कि अमेरिकी बाजार में आने वाले संबंधित भारतीय उत्पादों पर मौजूदा शुल्क के ऊपर अत्यधिक अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है।ऐसी स्थिति में भारतीय निर्यातकों की अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर बड़ा असर पड़ सकता है।टेक्सटाइल, फार्मास्युटिकल उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान, ऑटो पार्ट्स, केमिकल, जेम्स एंड ज्वेलरी और अन्य विनिर्मित वस्तुएं—इन क्षेत्रों के लिए अमेरिकी बाजार महत्वपूर्ण है।लेकिन भारत के पास भी विकल्प हैं।और यही बात इस पूरे विवाद को केवल ‘टैरिफ विवाद’ नहीं रहने देती।

भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल—रणनीतिक स्वायत्तता या अमेरिकी दबाव?

भारत ने रूस से संबंध अचानक नहीं बनाए।भारत-रूस संबंध दशकों पुराने हैं।रक्षा सहयोग, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, तकनीक और ऊर्जा—इन सभी क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच लंबे समय से संबंध रहे हैं।यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में सस्ता कच्चा तेल खरीदा।भारत का तर्क रहा है कि वह अपने राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा के आधार पर फैसले करता है।

नई दिल्ली का मूल संदेश यही रहा है—भारत किसी सैन्य गुट का हिस्सा नहीं है और उसकी विदेश नीति किसी तीसरे देश की अनुमति से नहीं चल सकती।यही रणनीतिक स्वायत्तता अमेरिका के लिए चुनौती भी है।वॉशिंगटन चाहता है कि भारत रूस के खिलाफ अमेरिकी दबाव अभियान में अधिक स्पष्ट रूप से शामिल हो।

नई दिल्ली का जवाब है—भारत अमेरिका का साझेदार है, लेकिन अमेरिकी सहयोगी नहीं,

यह अंतर मामूली नहीं है।

यही अंतर मौजूदा टैरिफ विवाद के पीछे की असली भू-राजनीति को समझने की कुंजी है।

ट्रंप की ‘America First’ नीति और भारत डोनाल्ड ट्रंप की विदेश और व्यापार नीति का केंद्रीय सिद्धांत रहा है—अमेरिकी हित पहले, टैरिफ उनके लिए केवल राजस्व जुटाने का माध्यम नहीं, बल्कि बातचीत और दबाव का हथियार भी है।यही कारण है कि भारत को लेकर वॉशिंगटन की नीति में एक विरोधाभास दिखाई देता है।

एक ओर अमेरिका भारत को इंडो-पैसिफिक में चीन के मुकाबले महत्वपूर्ण साझेदार मानता है।दूसरी ओर रूस से भारत की ऊर्जा खरीद पर वह अत्यधिक दबाव डालता है।एक ओर दोनों देश रक्षा और तकनीक में सहयोग बढ़ाना चाहते हैं।दूसरी ओर व्यापार के मोर्चे पर भारी टैरिफ की धमकी सामने आती है।

क्या यह साझेदारी है या दबाव के साथ साझेदारी?

यही सवाल अब अमेरिकी नीति निर्माताओं के सामने भी है।यूक्रेन युद्ध खत्म करने का दबाव और ट्रंप की परीक्षा

ट्रंप ने अपने राजनीतिक अभियान में यूक्रेन युद्ध को जल्दी खत्म करने की क्षमता का दावा किया था।लेकिन युद्ध जारी रहने के बीच अब अमेरिकी प्रशासन पर यह दबाव भी है कि रूस पर प्रभावी आर्थिक और राजनीतिक दबाव कैसे बनाया जाए।यहीं रूस प्रतिबंध विधेयक ट्रंप प्रशासन के लिए उपयोगी राजनीतिक हथियार बनता है।इसमें एक साथ कई अमेरिकी राजनीतिक हित दिखाई देते हैं—यूक्रेन समर्थकों को कठोर रूस नीति का संदेश, अमेरिकी संरक्षणवादी वर्ग को टैरिफ की नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा प्रतिष्ठान को रूस पर दबाव, और—भारत तथा चीन को अमेरिकी प्राथमिकताओं के साथ अधिक मजबूती से जोड़ने का प्रयास।

इसलिए यह विधेयक केवल रूस के खिलाफ प्रतिबंध नहीं है।यह अमेरिका की व्यापक भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।

भारत आसान निशाना है?

यह आरोप राजनीतिक बहस का विषय हो सकता है, लेकिन एक तथ्य स्पष्ट है।भारत अमेरिकी बाजार से जुड़ी बड़ी अर्थव्यवस्था है।भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध खराब नहीं करना चाहता।इसलिए वॉशिंगटन को लगता है कि आर्थिक दबाव के माध्यम से नई दिल्ली को रूस से दूरी बनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।लेकिन यही रणनीति उलटा असर भी डाल सकती है।

भारत यदि यह महसूस करता है कि अमेरिकी बाजार को उसकी विदेश नीति प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है तो वह अपनी रणनीतिक विविधता को और तेज कर सकता है, यानी—रूस के साथ ऊर्जा संबंध, मध्य-पूर्व के साथ ऊर्जा और व्यापार, यूरोप के साथ नए व्यापारिक समझौते, एशिया में वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखलाएं और ग्लोबल साउथ के साथ व्यापक सहयोग। इससे अमेरिकी दबाव का प्रभाव सीमित हो सकता है।

चीन को भी निशाना, लेकिन असली परीक्षा अमेरिका की

विधेयक भारत के अलावा चीन जैसे बड़े रूसी ऊर्जा खरीदारों को भी निशाना बनाता है।लेकिन यहां अमेरिका के सामने एक कठिन गणित है।चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और अमेरिकी कंपनियों तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए उसका महत्व बहुत बड़ा है।यदि वॉशिंगटन चीन पर अत्यधिक शुल्क लगाता है तो जवाबी कार्रवाई का जोखिम भी उतना ही बड़ा है।भारत के मामले में अमेरिका को अपेक्षाकृत अधिक उम्मीद हो सकती है कि व्यापारिक दबाव से नई दिल्ली को बातचीत की मेज पर लाया जा सके।

लेकिन भारत को चीन समझ लेना अमेरिकी रणनीति की बड़ी भूल हो सकती है।भारत दबाव में झुकने के बजाय विकल्पों का विस्तार करने की नीति अपना सकता है।

सबसे बड़ा खतरा—रूस, भारत और चीन की दूरी कम होना

अमेरिका की रणनीति का सबसे बड़ा अनपेक्षित परिणाम यही हो सकता है।यदि भारत और चीन को एक ही अमेरिकी प्रतिबंधात्मक ढांचे में रखा जाता है तो दोनों देशों के बीच राजनीतिक मतभेदों के बावजूद ऊर्जा, भुगतान व्यवस्था, आपूर्ति श्रृंखला और वैकल्पिक व्यापार मार्गों के मुद्दे पर समान हित पैदा हो सकते हैं।

रूस के लिए यह और भी महत्वपूर्ण होगा

मॉस्को को पश्चिमी बाजारों के दबाव के बीच भारत और चीन जैसे बड़े खरीदार मिलते रहेंगे।इस प्रकार—रूस को अलग-थलग करने की अमेरिकी रणनीति कहीं रूस को एशियाई बाजारों पर और अधिक निर्भर न कर दे।यह अमेरिकी नीति की सबसे बड़ी रणनीतिक पहेली है।

भारत के लिए भी आसान रास्ता नहीं

हालांकि इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

भारत अमेरिकी बाजार को खोने का जोखिम नहीं उठा सकता।

अमेरिका भारत के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों में से एक है।

भारतीय आईटी कंपनियों से लेकर दवा उद्योग और विनिर्माण क्षेत्र तक, अमेरिकी बाजार का महत्व बहुत बड़ा है।इसलिए नई दिल्ली के सामने दोहरे लक्ष्य होंगे—रूस से अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप संबंध बनाए रखना और साथ ही—अमेरिकी बाजार तथा भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को सुरक्षित रखना। यही कारण है कि भारत को इस पूरे विवाद में भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय बेहद सावधानी से कदम उठाना होगा।

भारत के पास क्या विकल्प हैं?

नई दिल्ली के सामने कम से कम पांच रास्ते हैं

पहला—सीधी बातचीत

भारत अमेरिका को यह समझा सकता है कि रूसी तेल की खरीद भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी है और इसे केवल भू-राजनीतिक समर्थन के रूप में नहीं देखा जा सकता।

दूसरा—वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतभारत धीरे-धीरे ऊर्जा स्रोतों में विविधता बढ़ा सकता है ताकि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता न रहे।

तीसरा—निर्यात बाजारों का विस्तार यदि अमेरिकी बाजार पर दबाव बढ़ता है तो यूरोप, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, पश्चिम एशिया और एशिया के अन्य बाजारों में भारतीय निर्यात बढ़ाने की रणनीति तेज की जा सकती है।

चौथा—रुपये और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था

भारत रूस और अन्य साझेदारों के साथ स्थानीय मुद्राओं और वैकल्पिक भुगतान तंत्र को विकसित करने की कोशिश कर सकता है।

पांचवां—रणनीतिक स्वायत्तता सबसे महत्वपूर्ण— भारत को यह स्पष्ट करना होगा कि साझेदारी और संधि-आधारित गठबंधन दो अलग चीजें हैं।

क्या भारत को अमेरिकी दबाव के आगे झुक जाना चाहिए?

यह प्रश्न राजनीतिक रूप से जितना सरल दिखाई देता है, आर्थिक रूप से उतना नहीं है।यदि भारत पूरी तरह अमेरिकी दबाव स्वीकार करता है तो रूस के साथ उसके ऊर्जा और रक्षा संबंध प्रभावित होंगे।यदि भारत अमेरिकी दबाव पूरी तरह खारिज करता है तो अमेरिकी बाजार और द्विपक्षीय व्यापार में नुकसान का खतरा बढ़ सकता है।

इसलिए भारत की सबसे समझदार नीति होगी—न झुकना, न टकराना—बल्कि बातचीत के जरिए अपने हित सुरक्षित करना।

भारत को अमेरिका को यह समझाना होगा कि—रणनीतिक साझेदारी का अर्थ रणनीतिक अधीनता नहीं है।

अमेरिका के लिए भी है बड़ा जोखिम

वॉशिंगटन को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत केवल कोई छोटा व्यापारिक साझेदार नहीं है।भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में है।वह इंडो-पैसिफिक की रणनीतिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में भारत अमेरिकी रणनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ है।

यदि व्यापारिक दबाव इतना बढ़ जाता है कि भारत-अमेरिका संबंधों में रणनीतिक अविश्वास पैदा हो जाए तो इसका लाभ किसे मिलेगा?

रूस को, चीन को, और संभवतः उन सभी शक्तियों को जो अमेरिकी प्रभुत्व से अलग एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था चाहती हैं।

इसलिए भारत पर अत्यधिक आर्थिक दबाव लगाना अमेरिका के लिए भी जोखिम-मुक्त रणनीति नहीं है।

टैरिफ की लड़ाई से बड़ा सवाल—किसकी शर्तों पर चलेगी दुनिया?

आज का विवाद केवल रूसी तेल का नहीं है।यह उस बड़े संघर्ष का हिस्सा है जिसमें अमेरिका चाहता है कि दुनिया की प्रमुख शक्तियां उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं के अनुरूप चलें।भारत चाहता है कि वह अमेरिका के साथ साझेदारी करे, लेकिन अपने स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार भी बनाए रखे।रूस चाहता है कि उसके ऊर्जा संसाधनों के लिए एशियाई बाजार खुले रहें।

चीन अमेरिकी प्रतिबंधों और दबाव के बीच अपनी आर्थिक-सामरिक क्षमता मजबूत करना चाहता है और यूरोप रूस के साथ संबंधों, ऊर्जा जरूरतों और अमेरिकी सुरक्षा छतरी के बीच संतुलन खोज रहा है।

इसलिए यह केवल—‘भारत बनाम अमेरिका’का विवाद नहीं है। यह आने वाली विश्व व्यवस्था की लड़ाई का भी एक हिस्सा है।

संपादकीय निष्कर्ष: भारत को ‘बलि का बकरा’ नहीं, बराबरी का साझेदार बनना होगा

अमेरिका के प्रस्तावित 100 प्रतिशत तक टैरिफ की व्यवस्था भारत के लिए निश्चित रूप से गंभीर चुनौती है।

लेकिन इसे केवल ‘अमेरिका भारत को बलि का बकरा बना रहा है’ कहकर समाप्त कर देना भी पर्याप्त नहीं होगा।

वॉशिंगटन के पास रूस पर दबाव डालने का अपना रणनीतिक तर्क है।

भारत के पास अपनी ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति की स्वतंत्रता का तर्क है।

दोनों तर्कों के बीच टकराव अब व्यापारिक विवाद का रूप ले चुका है।

अमेरिका यदि भारत को रूस से दूर करना चाहता है तो उसे धमकी से ज्यादा विश्वसनीय रणनीतिक विकल्प देने होंगे और भारत को भी यह साबित करना होगा कि उसकी रणनीतिक स्वायत्तता केवल भाषण नहीं, बल्कि आर्थिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता से समर्थित नीति है।

आज सवाल यह नहीं है कि—भारत अमेरिका का साथ देगा या रूस का।

सवाल इससे कहीं बड़ा है—क्या भारत अपने हितों के साथ अमेरिका से साझेदारी कर सकता है, बिना अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता खोए?और अमेरिकी नीति निर्माताओं के लिए भी एक बड़ा सवाल है—क्या रूस को कमजोर करने के लिए भारत को आर्थिक रूप से दंडित करना उस भारत को कमजोर नहीं करेगा, जिसे अमेरिका चीन के मुकाबले अपनी सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारियों में से एक मानता है?

यदि वॉशिंगटन इस विरोधाभास को नहीं समझता, तो 100 प्रतिशत टैरिफ रूस से ज्यादा अमेरिका-भारत रणनीतिक भरोसे को नुकसान पहुंचा सकता है

और यदि नई दिल्ली दबाव के जवाब में अपनी ऊर्जा, व्यापार और भुगतान व्यवस्था को तेजी से विविध बनाती है, तो यह टैरिफ युद्ध भारत के लिए केवल संकट नहीं रहेगा—यह रणनीतिक आत्मनिर्भरता की अगली परीक्षा बन जाएगा।

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