बी के झा
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पटना/भोजपुर, 9 सितंबर
NSK विशेष रिपोर्ट
बिहार के भोजपुर के बिलौटी गांव में 17 जून 2026 को भरत भूषण तिवारी की पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद उठे सवाल अब सिर्फ एक एनकाउंटर तक सीमित नहीं हैं। यह मामला अब बिहार में पुलिस की जवाबदेही, राजनीतिक हस्तक्षेप, प्रशासनिक निर्णय-प्रक्रिया और कानून के शासन की परीक्षा बन चुका है।
करीब तीन महीने बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक इंटरव्यू में उस सवाल का जवाब दिया, जो इस पूरे प्रकरण की राजनीति के केंद्र में रहा है—
क्या भरत तिवारी के एनकाउंटर का आदेश मुख्यमंत्री ने दिया था?
मुख्यमंत्री का जवाब था कि पुलिस को उनका आदेश अपराधियों के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई करने का होता है। उन्होंने कहा कि जब उन्हें घटना की जानकारी मिली और पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठे तो उन्होंने न्यायिक जांच का आदेश दिया। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि यदि पुलिस से गलती हुई है तो कार्रवाई होगी और मामले की जांच चल रही है।
लेकिन यहीं से एक और बड़ा सवाल पैदा होता है—यदि मुख्यमंत्री ने किसी व्यक्ति विशेष के एनकाउंटर का आदेश नहीं दिया था, तो बिलौटी में कार्रवाई की वास्तविक कमान किस स्तर पर थी?
‘मेरा सिर्फ एक आदेश होता है…’—सम्राट का जवाब
विपक्ष की ओर से लगातार आरोप लगाया गया कि भरत तिवारी के खिलाफ कार्रवाई राजनीतिक या ऊपरी स्तर के निर्देश के बाद हुई।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस आरोप से सीधे तौर पर दूरी बनाते हुए कहा कि उनका आदेश सामान्य था—अपराधियों के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई की जाए। यह बयान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि सम्राट चौधरी बिहार के मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ गृह विभाग भी संभालते हैं।ऐसे में विपक्ष का सवाल है कि सामान्य ‘सख्ती’ के आदेश और किसी विशेष पुलिस कार्रवाई के बीच प्रशासनिक श्रृंखला कहां जुड़ती है?
इसका जवाब अब राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि जांच के दस्तावेजों से सामने आना चाहिए।—
घटनाक्रम ने क्यों बढ़ाया संदेह?
17 जून को बिलौटी में हुई कार्रवाई के बाद परिवार और विपक्ष ने इसे कथित फर्जी एनकाउंटर बताया। पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठे और सरकार ने उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में न्यायिक जांच कराने का फैसला किया।इसके बाद मामले में कई प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई हुई।तत्कालीन जगदीशपुर एसडीपीओ राजेश कुमार शर्मा को हटाया गया। एसडीओ को भी पद से हटाया गया। मामले में प्राथमिकी दर्ज होने और जांच आगे बढ़ने की खबरें सामने आईं।
फिर जुलाई में भरत तिवारी पर पहली गोली चलाने के आरोपी बताए गए STF जवान अक्षय कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस अधिकारियों ने कार्रवाई को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर बताया।
यानी सरकार की तरफ से कार्रवाई हुई—लेकिन क्या कार्रवाई का मतलब यह भी है कि एनकाउंटर की पूरी सच्चाई सामने आ गई?
जवाब है—अभी नहीं।—
सबसे बड़ा सवाल: गोली चलाने वाले से ऊपर कौन था?
किसी भी पुलिस ऑपरेशन में केवल यह जानना पर्याप्त नहीं होता कि गोली किसने चलाई।यह भी जानना आवश्यक है—- ऑपरेशन का आदेश किसने दिया?
मौके पर पुलिस टीम का नेतृत्व कौन कर रहा था?
गिरफ्तारी और मुठभेड़ की रणनीति किस स्तर पर तय हुई?
वायरलेस/फोन/मैसेज के जरिए किन अधिकारियों से संपर्क हुआ?
घटना से पहले और बाद में अधिकारियों के बीच क्या संवाद हुआ?
क्या बल प्रयोग की प्रक्रिया का पालन किया गया?
क्या भरत तिवारी के आत्मसमर्पण के दावे की स्वतंत्र पुष्टि हुई?
पोस्टमार्टम और बैलिस्टिक साक्ष्य घटनाक्रम से मेल खाते हैं या नहीं?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या किसी राजनीतिक या प्रशासनिक व्यक्ति ने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कोई विशेष निर्देश दिया था?
इन सवालों का उत्तर किसी दल के प्रवक्ता या राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि न्यायिक जांच की रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों से मिलना चाहिए।
तेजस्वी यादव का आरोप: ‘बिना ऊपर से अनुमति के ऐसा नहीं हो सकता
‘नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इस मामले में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि किसी बड़े अधिकारी के जरिए संदेश भेजे जाने के बाद एनकाउंटर हुआ और मुख्यमंत्री की अनुमति के बिना ऐसा करने की हिम्मत कोई नहीं कर सकता।तेजस्वी ने इससे पहले भी कार्रवाई को कथित फर्जी एनकाउंटर बताते हुए मुख्यमंत्री से माफी मांगने की मांग की थी।लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को नहीं भूलना चाहिए—आरोप और प्रमाण एक चीज नहीं हैं।
तेजस्वी यादव का दावा राजनीतिक रूप से गंभीर है, लेकिन इसे तब तक स्थापित तथ्य नहीं कहा जा सकता जब तक जांच एजेंसी अथवा न्यायिक आयोग को इसका प्रमाण न मिल जाए।
प्रशांत किशोर ने भी सरकार को घेरा
जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भी इस मामले को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने इसे एनकाउंटर नहीं बल्कि हत्या बताया और सरकार से जवाबदेही तय करने की मांग की। बिलौटी की महापंचायत में उन्होंने सरकार को समयसीमा में न्याय सुनिश्चित करने की मांग करते हुए आंदोलन की चेतावनी भी दी थी।
राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर देखें तो भरत तिवारी प्रकरण विपक्ष के लिए केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है। यह सरकार की प्रशासनिक जवाबदेही और ‘पुलिस एक्शन’ की राजनीतिक व्याख्या का मुद्दा भी बन गया है।
सरकार के भीतर से भी उठी थीं आवाजें
इस प्रकरण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सवाल केवल विपक्षी दलों ने नहीं उठाए।
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी कहा था कि यदि किसी निर्दोष व्यक्ति पर गोली चली है या एनकाउंटर की आड़ में कार्रवाई हुई है तो दोषी अधिकारियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए। उन्होंने सभी दोषियों पर कार्रवाई की मांग की थी।वहीं बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी ने भी सार्वजनिक रूप से एनकाउंटर को गलत बताते हुए दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की बात कही थी।इसके विपरीत केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने जांच रिपोर्ट आने से पहले अधिकारियों को दोषी ठहराने की राजनीति पर सवाल उठाते हुए कहा था कि यदि बिना जांच किसी को दोषी माना जा रहा है तो फिर सीधे सजा देने की बात कीजिए।
यानी सत्तारूढ़ खेमे के भीतर भी इस मामले को लेकर एक समान राजनीतिक स्वर नहीं रहा।
कानूनविदों की नजर में असली कसौटी क्या?
कानून के नजरिए से किसी भी पुलिस मुठभेड़ की वैधता का सवाल केवल इस बात से तय नहीं होता कि मृतक के पास हथियार था या वह पुलिस के सामने मौजूद था।
जांच में घटनाक्रम की पूरी श्रृंखला महत्वपूर्ण होती है।
एक स्वतंत्र कानूनी विश्लेषण में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न होंगे—क्या पुलिस ने गिरफ्तारी का प्रयास किया?
क्या पुलिस को तत्काल जान का खतरा था?
बल प्रयोग आवश्यक और आनुपातिक था या नहीं?
क्या घटनास्थल के साक्ष्य पुलिस के संस्करण से मेल खाते हैं?
क्या फोरेंसिक और बैलिस्टिक रिपोर्ट पुलिस के दावे की पुष्टि करती हैं?
और यदि किसी अधिकारी ने कानून की सीमा पार की, तो उसकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
–कार्रवाई हुई है, लेकिन क्या जवाबदेही पूरी हुई?
सरकार यह कह सकती है कि—- न्यायिक जांच का आदेश दिया गया,
अधिकारियों को हटाया गया,
प्राथमिकी दर्ज हुई,
STF जवान अक्षय कुमार गिरफ्तार हुआ,
जांच जारी है।
ये सभी कदम महत्वपूर्ण हैं।
लेकिन लोकतंत्र में प्रशासनिक कार्रवाई और अंतिम न्याय अलग-अलग चीजें हैं।
किसी अधिकारी का तबादला या गिरफ्तारी अपने आप यह साबित नहीं करती कि पूरा एनकाउंटर अवैध था।
उसी तरह केवल पुलिस का यह कहना भी अंतिम सत्य नहीं हो सकता कि कार्रवाई कानून के अनुसार हुई।
सत्य का अंतिम निर्धारण साक्ष्यों और निष्पक्ष जांच से होना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषण: क्या यह चुनावी मुद्दा बन चुका है?
बिहार में राजनीतिक तापमान को देखते हुए भरत तिवारी प्रकरण का चुनावी इस्तेमाल होना स्वाभाविक है। विपक्ष इसे सरकार की पुलिस व्यवस्था और कथित सत्ता संरक्षण से जोड़ रहा है, जबकि सरकार जांच और कार्रवाई को अपनी पारदर्शिता का प्रमाण बता सकती है।
प्रशांत किशोर के लिए यह मुद्दा सरकार विरोधी राजनीतिक अभियान का हिस्सा बन सकता है।
वहीं तेजस्वी यादव के लिए यह कानून-व्यवस्था और शासन की जवाबदेही पर सरकार को घेरने का अवसर है।लेकिन यहां राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यदि जांच से विपक्ष के आरोप सही नहीं निकलते तो उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होगी; और यदि जांच में पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल साबित होते हैं तो सरकार के सामने राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
शिक्षाविद और समाज के लिए बड़ा सवाल
एक शिक्षाविद के नजरिए से यह प्रकरण युवाओं के सामने राज्य और कानून की विश्वसनीयता का प्रश्न भी खड़ा करता है।
लोकतंत्र में नागरिकों को यह विश्वास होना चाहिए कि—पुलिस अपराध से लड़ेगी, लेकिन कानून की सीमा में रहकर।
यदि अपराधी है तो न्यायालय में मुकदमा चले।
यदि पुलिस कार्रवाई वैध है तो उसके प्रमाण सामने आएं।
और यदि किसी पुलिसकर्मी ने कानून तोड़ा है तो वर्दी उसे संरक्षण न दे।
यही किसी लोकतांत्रिक राज्य की संस्थागत विश्वसनीयता की बुनियाद है।
NSK का बड़ा सवाल: अब गेंद किसके पाले में?
भरत तिवारी की मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल था—किसने गोली चलाने का आदेश दिया?
अब दूसरा सवाल उससे भी बड़ा हो चुका है—क्या न्यायिक जांच यह बताएगी कि 17 जून को बिलौटी में वास्तव में क्या हुआ था?
क्या घटनास्थल के वैज्ञानिक साक्ष्य पुलिस के दावे की पुष्टि करेंगे?
क्या किसी अधिकारी की भूमिका सामने आएगी?
क्या किसी ऊपरी स्तर के निर्देश का प्रमाण मिलेगा?
या जांच यह साबित करेगी कि पुलिस कार्रवाई कानून के दायरे में थी?
और यदि जांच में मुख्यमंत्री या सरकार के खिलाफ लगाए गए राजनीतिक आरोप निराधार साबित होते हैं, तो क्या विपक्ष उन आरोपों को वापस लेने की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करेगा?
वहीं यदि जांच में पुलिस कार्रवाई में गंभीर अनियमितता या सत्ता-प्रशासन की भूमिका प्रमाणित होती है, तो क्या सरकार सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई करके मामला समाप्त करेगी या राजनीतिक जवाबदेही भी तय होगी?
NSK की संपादकीय टिप्पणी
भरत तिवारी प्रकरण को न तो केवल ‘पुलिस बनाम अपराधी’ के चश्मे से देखा जाना चाहिए और न ही केवल ‘सरकार बनाम विपक्ष’ के राजनीतिक चश्मे से।
यह सवाल एक व्यक्ति की मौत से आगे बढ़ चुका है।यह सवाल है कि बिहार में कानून किसके लिए समान है?
यदि भरत तिवारी अपराधी थे तो कानून को अपना काम करने दिया जाना चाहिए था।
यदि पुलिस ने कानून के अनुसार कार्रवाई की तो जांच में उसे प्रमाणित किया जाना चाहिए।और यदि किसी स्तर पर कानून की सीमा पार की गई, तो दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का यह कहना कि उनका आदेश अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का है, राजनीतिक रूप से स्पष्ट जवाब है।
लेकिन ‘किसने आदेश दिया?’
अंतिम और विश्वसनीय जवाब अभी राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि न्यायिक जांच की रिपोर्ट दे सकती है।
यही रिपोर्ट तय करेगी कि यह सिर्फ एक विवादित पुलिस मुठभेड़ थी, प्रशासनिक चूक थी, कानून से बाहर जाकर की गई कार्रवाई थी या फिर इसके पीछे किसी बड़े स्तर का निर्देश था।
जब तक रिपोर्ट सामने नहीं आती, किसी भी पक्ष को दोषी या निर्दोष घोषित करना जल्दबाजी होगी।
लेकिन जनता का सवाल बिल्कुल जायज है—’सच आखिर कब सामने आएगा?
‘NSK की नजर अब न्यायिक जांच की रिपोर्ट पर है।
