बी के झा
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लखनऊ, 6 अक्टूबर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक शब्द लगातार सुनाई दे रहा है—PDA। समाजवादी पार्टी इसे पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक भागीदारी के राजनीतिक फॉर्मूले के रूप में पेश कर रही है। अखिलेश यादव इस सामाजिक गठजोड़ को अब पंडितों समेत दूसरे वर्गों तक विस्तार देने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। बीजेपी दूसरी ओर ‘सबका साथ, सबका विकास’ और सामाजिक समरसता की बात करती है।लेकिन चुनावी राजनीति में नारों की अपनी जगह है और सामाजिक गणित की अपनी ताकत।यही वजह है कि उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए बीजेपी ने जिन आठ चेहरों पर दांव लगाया है, उन्हें केवल आठ नियुक्तियों के तौर पर देखना शायद बड़ी तस्वीर को छोटा करके देखना होगा।यह सूची दरअसल 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले BJP के सामाजिक-संगठनात्मक होमवर्क का संकेत भी मानी जा रही है।
सबसे खास बात यह है कि पार्टी ने इस बार बड़े सेलिब्रिटी चेहरों या अचानक चर्चा में आए नामों की बजाय ऐसे लोगों को तरजीह दी है जिनका संगठन, संघ, क्षेत्रीय राजनीति या पार्टी के सामाजिक नेटवर्क से लंबा जुड़ाव रहा है।
अर्थात संदेश साफ है—राज्यसभा सिर्फ दिल्ली जाने का टिकट नहीं, 2027 के लिए यूपी की जमीन पर राजनीतिक संदेश भेजने का माध्यम भी है।
PDA बनाम BJP: राज्यसभा में सामाजिक गणित का जवाब
राज्यसभा के लिए बीजेपी के नए चेहरों की सामाजिक और क्षेत्रीय पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो तस्वीर दिलचस्प दिखाई देती है।जिन आठ सदस्यों का कार्यकाल खत्म हो रहा है, उनके सामाजिक प्रतिनिधित्व की तुलना में इस बार पार्टी ने अलग संतुलन बनाने की कोशिश की है।नई सूची में ब्राह्मण, दलित, OBC और क्षत्रिय प्रतिनिधित्व का मिश्रण दिखाई देता है। महिलाओं को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है।यानी BJP का संदेश यह है कि यदि विपक्ष PDA को सामाजिक भागीदारी का अपना राजनीतिक हथियार बनाता है, तो BJP भी सामाजिक प्रतिनिधित्व को अपने तरीके से विस्तार दे सकती है।यही कारण है कि इस सूची को केवल ‘राज्यसभा की सूची’ कहना शायद पर्याप्त नहीं होगा।यह सामाजिक संदेश की सूची भी है।
धर्मपाल सिंह: संगठन से सत्ता के ऊपरी सदन तक
योगी सरकार में पशुधन मंत्री धर्मपाल सिंह का राज्यसभा जाना कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है।रुहेलखंड की राजनीति से आने वाले धर्मपाल सिंह लंबे समय से बीजेपी के सक्रिय नेता रहे हैं। वे कई सरकारों में मंत्री रह चुके हैं और संगठन के स्तर पर भी उनका अनुभव व्यापक है।उनका राज्यसभा जाना पार्टी के लिए दोहरा फायदा माना जा सकता है।एक तरफ संगठन के पुराने चेहरे को राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारी मिलती है, दूसरी तरफ रुहेलखंड के सामाजिक समीकरण को साधने का प्रयास होता है।धर्मपाल सिंह का नाम पहले भी प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में चर्चा में रहा है। ऐसे में राज्यसभा उनके राजनीतिक कद को बढ़ाने के साथ-साथ पार्टी द्वारा लंबे समय से किए जा रहे राजनीतिक समायोजन का हिस्सा भी माना जा रहा है।यानी बीजेपी ने एक पुराने दावेदार को सिर्फ सदन नहीं दिया, बल्कि संगठनात्मक सम्मान को भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बदला है।
राधाकांत ओझा: कानून, ब्राह्मण समीकरण और प्रतापगढ़ कनेक्शन
राधाकांत ओझा का चयन भी कम राजनीतिक अर्थ नहीं रखता।इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में उनकी पहचान राजनीति से बाहर के कानूनी-सामाजिक क्षेत्र तक जाती है।उनका प्रयागराज-प्रतापगढ़ क्षेत्र से संबंध ऐसे समय में महत्वपूर्ण हो जाता है जब यूपी की राजनीति में ब्राह्मण प्रतिनिधित्व को लेकर लगातार बहस होती रही है।प्रतापगढ़ से कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष अराधना मिश्रा जैसे ब्राह्मण चेहरे की मौजूदगी के बीच बीजेपी का राधाकांत ओझा पर दांव सामाजिक संतुलन के लिहाज से भी देखा जा सकता है।
संदेश यह कि—ब्राह्मण वोट की राजनीति को BJP विपक्ष के भरोसे नहीं छोड़ना चाहती।
प्रकाश पाल: OBC मोर्चे से राज्यसभा तक
प्रकाश पाल का चयन बीजेपी की संगठनात्मक राजनीति की एक अलग कहानी बताता है।संघ पृष्ठभूमि से बीजेपी संगठन में आए प्रकाश पाल ने प्रदेश संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां संभाली हैं और फिलहाल OBC मोर्चे की राजनीति से जुड़े रहे हैं।कानपुर-बुंदेलखंड और सेंट्रल यूपी के सामाजिक समीकरण में पाल बिरादरी की भूमिका कई सीटों पर महत्वपूर्ण मानी जाती है।ऐसे में प्रकाश पाल का राज्यसभा जाना सिर्फ व्यक्तिगत राजनीतिक उपलब्धि नहीं बल्कि OBC सामाजिक आधार को संगठनात्मक प्रतिनिधित्व देने का संदेश भी है।
यहां BJP की रणनीति समझी जा सकती है—जिस सामाजिक समूह को विपक्ष अपने साथ जोड़ने का दावा करता है, उसी समूह के भीतर BJP अपने संगठनात्मक चेहरे खड़े कर रही है।-
विद्यासागर सोनकर: पूर्वांचल का पुराना संगठनात्मक चेहरा
विद्यासागर सोनकर का नाम बीजेपी की पुरानी संगठनात्मक राजनीति से जुड़ा रहा है।जौनपुर से आने वाले सोनकर 1996 में लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। बाद में विधान परिषद और संगठन में भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं।उनका चयन BJP के उस मॉडल को मजबूत करता है जिसमें पुराने संगठनात्मक कार्यकर्ताओं को धीरे-धीरे सत्ता के अलग-अलग मंचों पर जगह दी जाती है।पूर्वांचल की राजनीति में दलित और OBC सामाजिक समीकरण बेहद महत्वपूर्ण हैं।इसलिए सोनकर का राज्यसभा पहुंचना पूर्वांचल के सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति को भी मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
गोपीकृष्ण पांडेय: संगठन और ‘पुराने संपर्कों’ की राजनीति
गोपीकृष्ण पांडेय का नाम बीजेपी और संघ के लंबे संगठनात्मक सफर से जुड़ा बताया जाता है।कानपुर में सक्रियता और बलिया से जड़ों का जुड़ाव उन्हें पूर्वांचल और सेंट्रल यूपी के बीच एक राजनीतिक कड़ी देता है।उनके चयन की चर्चा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुराने संगठनात्मक दौर से नजदीकी का भी उल्लेख होता रहा है।यदि पार्टी में लंबे समय तक संगठन के भीतर काम करने वाले लोगों को उच्च सदन भेजने की नीति को देखा जाए तो गोपीकृष्ण पांडेय का चयन उसी लाइन में दिखाई देता है।
BJP का संदेश शायद यही है—संगठन में वर्षों तक काम करने वालों की राजनीतिक सीढ़ी बंद नहीं हुई है।
प्रियंका रावत: महिला और दलित समीकरण का दोहरा संदेश
बाराबंकी की पूर्व सांसद प्रियंका सिंह रावत का राज्यसभा के लिए चयन भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।2014 में लोकसभा पहुंचने के बाद 2019 में उनका टिकट कट गया था। इसके बाद संगठन में उन्हें जिम्मेदारियां दी गईं।अब उच्च सदन की जिम्मेदारी मिलने का अर्थ यह है कि पार्टी ने पुराने राजनीतिक वादे और संगठनात्मक योगदान दोनों को ध्यान में रखा।साथ ही यह महिला + दलित प्रतिनिधित्व का राजनीतिक संदेश भी देता है।
अवध क्षेत्र में लखनऊ, बाराबंकी और आसपास की राजनीति में दलित मतदाताओं का महत्व किसी से छिपा नहीं है।ऐसे में प्रियंका रावत को राज्यसभा भेजना BJP की सामाजिक इंजीनियरिंग का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा सकता है।
श्रुति गंगवार: विरासत, रुहेलखंड और महिला प्रतिनिधित्व
श्रुति गंगवार के नाम के साथ सबसे बड़ा राजनीतिक संदर्भ उनके पिता और वरिष्ठ बीजेपी नेता संतोष गंगवार की विरासत है।रुहेलखंड में संतोष गंगवार लंबे समय तक BJP का प्रमुख चेहरा रहे हैं।अब उनकी बेटी को उच्च सदन भेजना राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के साथ-साथ क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश भी माना जा सकता है।यानी BJP ने एक ही निर्णय में महिला प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय पहचान और पुराने राजनीतिक परिवार से जुड़ी Vidhansabha—तीनों को साधने की कोशिश की है।
रामप्रताप सिंह चौहान: संगठन का चेहरा, सत्ता के उच्च सदन की ओर
आगरा-ब्रज क्षेत्र से आने वाले रामप्रताप सिंह चौहान संगठन में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं।2017 में विधायक बनने के बाद उनका राजनीतिक सफर संगठन की ओर ज्यादा केंद्रित हुआ। प्रदेश महामंत्री और पश्चिम क्षेत्र के प्रभारी जैसी जिम्मेदारियां उनके संगठनात्मक महत्व को दर्शाती हैं।उनका राज्यसभा जाना भी BJP के उसी मॉडल को सामने लाता है जिसमें संगठन में लगातार काम करने वाले नेताओं को सत्ता के उच्च सदन में प्रतिनिधित्व दिया जा रहा है।
असल कहानी चेहरों से ज्यादा ‘भौगोलिक गणित’ में छिपी है
आठ नामों को अगर यूपी के नक्शे पर रखकर देखें तो BJP की रणनीति ज्यादा साफ दिखाई देती है।
रुहेलखंड—धर्मपाल सिंह और श्रुति गंगवार।
कानपुर-बुंदेलखंड—प्रकाश पाल।
पूर्वांचल—विद्यासागर सोनकर और गोपीकृष्ण पांडेय।
अवध—प्रियंका रावत।
प्रयागराज-प्रतापगढ़—राधाकांत ओझा।
आगरा-ब्रज—रामप्रताप सिंह चौहान।
यानी राज्यसभा के आठ टिकटों में पार्टी ने लगभग पूरे उत्तर प्रदेश को राजनीतिक संदेश भेजने की कोशिश की है।
यह संदेश है—‘दिल्ली के सदन में बैठने वाला हर चेहरा यूपी की किसी न किसी सामाजिक या क्षेत्रीय जमीन से जुड़ा है।’-
PDA की काट क्या सिर्फ जातीय समीकरण से निकलेगी?
यहां BJP के सामने असली चुनौती शुरू होती है।PDA का राजनीतिक असर केवल जातीय पहचान की वजह से नहीं है। अखिलेश यादव ने इसे सामाजिक सम्मान, भागीदारी और सत्ता में हिस्सेदारी के सवाल से जोड़ दिया है।यानी BJP यदि सिर्फ अलग-अलग जातियों के नेताओं को पद दे देती है तो क्या उससे PDA की राजनीतिक अपील अपने आप खत्म हो जाएगी? जरूरी नहीं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार किसी सामाजिक समूह को प्रतिनिधित्व देना और उस समूह के भीतर यह विश्वास पैदा करना कि सत्ता में उसकी वास्तविक भागीदारी है। दो अलग चीजें हैं। इसलिए BJP के लिए चुनौती केवल टिकट बांटना नहीं है।
चुनौती है—क्या ये चेहरे अपनी-अपनी सामाजिक जमीन पर BJP के लिए भरोसा भी पैदा कर पाएंगे?
-2027 की असली परीक्षा विधानसभा चुनाव में होगी
राज्यसभा में प्रतिनिधित्व एक राजनीतिक संदेश है, लेकिन 2027 में इसकी परीक्षा बूथ पर होगी।
सपा PDA के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समूहों को एक राजनीतिक छतरी के नीचे लाने की कोशिश करेगी।
कांग्रेस भी ब्राह्मण और दूसरे सामाजिक समूहों में अपना आधार मजबूत करने की कोशिश कर रही है।BJP के सामने चुनौती इसलिए दोहरी है।उसे अपना पारंपरिक सवर्ण आधार बनाए रखना है।साथ ही गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित आधार को भी मजबूती से अपने साथ रखना है।इसके अलावा महिला मतदाता, युवा, लाभार्थी वर्ग और क्षेत्रीय सामाजिक समीकरण भी चुनावी परिणाम को प्रभावित करेंगे।ऐसे में राज्यसभा की यह सूची 2027 के लिए BJP के सामाजिक प्रयोग का पहला संकेत जरूर देती है, लेकिन अंतिम परिणाम नहीं।
–मोदी सरकार में फेरबदल का भी संकेत?
इस सूची का एक राष्ट्रीय असर भी हो सकता है।उत्तर प्रदेश से राज्यसभा का कार्यकाल पूरा करने वाले नेताओं में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा का नाम शामिल है। यदि कोई मंत्री संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं रहता तो संवैधानिक रूप से उसे छह महीने के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना जरूरी होता है।ऐसे में इन दोनों नेताओं के भविष्य को लेकर स्वाभाविक रूप से चर्चा तेज हो सकती है।
दूसरी तरफ यदि धर्मपाल सिंह राज्यसभा पहुंचते हैं तो भविष्य के केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार में उनका नाम चर्चा में आना असंभव नहीं होगा।लेकिन इसे अभी निश्चित राजनीतिक फैसला मानना जल्दबाजी होगी।
BJP की रणनीति का ‘मास्टर स्ट्रोक’ या सिर्फ संगठनात्मक समायोजन?
इस पूरी सूची की सबसे दिलचस्प बात यही है कि BJP ने ज्यादातर ऐसे लोगों को चुना है जिनकी राजनीतिक पहचान पहले से बनी हुई है।
कोई लंबे समय से संगठन में है।
कोई संघ से आया है।
कोई चुनाव लड़ चुका है।
कोई मंत्री रहा है।
किसी का सामाजिक आधार मजबूत है।
किसी का पारिवारिक राजनीतिक प्रभाव है।
यानी पार्टी ने राज्यसभा को ‘राजनीतिक पुनर्वास’ और ‘सामाजिक संदेश’ दोनों का मंच बनाया है।यही BJP की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
NSK विश्लेषण:
8 नाम, लेकिन निशाना 2027
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की राजनीति अक्सर लखनऊ से दिल्ली जाने वाले नेताओं की कहानी लगती है।लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच BJP के इन आठ नामों को सिर्फ आठ सीटों की राजनीति समझना बड़ी भूल होगी।यह सूची बताती है कि BJP ने सामाजिक समीकरण को गंभीरता से लिया है।
वह PDA के जवाब में अपना सामाजिक गठजोड़ मजबूत करना चाहती है।
वह OBC के भीतर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहती है।
दलितों में अपनी पैठ को विस्तार देना चाहती है।
ब्राह्मणों को भरोसा देना चाहती है।
महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बनाए रखना चाहती है।और साथ ही संगठन के पुराने सिपाहियों को यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी में लंबे समय तक काम करने का राजनीतिक पुरस्कार मिलता है।
लेकिन राजनीति का अंतिम फैसला राज्यसभा में नहीं, विधानसभा के बूथ पर होगा।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि BJP ने राज्यसभा में कितने सामाजिक चेहरे उतारे।
असली सवाल यह है—क्या ये आठ चेहरे 2027 में BJP के लिए आठ मजबूत सामाजिक पुल बन पाएंगे?
अगर जवाब ‘हां’ है, तो यह सूची PDA की काट की दिशा में BJP का महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।लेकिन अगर ये चेहरे सिर्फ दिल्ली के उच्च सदन तक सीमित रह गए और अपनी सामाजिक जमीन पर राजनीतिक प्रभाव नहीं बना पाए, तो फिर यह पूरी कवायद महज संगठनात्मक समायोजन बनकर रह जाएगी।
2027 का चुनाव तय करेगा कि BJP ने राज्यसभा में सिर्फ चेहरे बदले थे या उत्तर प्रदेश का सामाजिक राजनीतिक समीकरण भी।
